
पटना | 4 जून 2026 | BAZ Media Bhopal Division | BAZ Desk | Bazmedia.in
संक्षिप्त खबर
- मधुबनी के पुलपराश में 25 फरवरी को रोशन खातून को भीड़ ने पीटा था। वह बाद में मर गईं।
- झंझारपुर के कय्यूम को 13 जनवरी को मार दिया गया। उनकी विधवा और चार बच्चों को कोई मुआवजा नहीं मिला।
- सीवान में शहज़ाद अली को गांववासियों ने पेड़ से बांधकर मारा। मुख्य आरोपी फरार हैं।
भीड़ की हिंसा बिहार में तीन भीषण मामलों का खुलासा हुआ है। नागरिक अधिकार संरक्षण संगठन (एपीसीआर) ने मधुबनी और सीवान के पीड़ित परिवारों से मिलकर न्याय और मुआवजे की मांग की है। पुलिस की असफलता और न्यायिक देरी पर एपीसीआर ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है।
मधुबनी में दोहरा हत्याकांड — न्याय अभी दूर
पुलपराश गांव में 25 फरवरी को रोशन खातून को एक भीड़ ने निर्मम तरीके से पीटा। गांव का मुखिया भी इस भीड़ में शामिल था। रोशन रोज़े की हालत में थीं। परिवार का कहना है कि पुलिस ने घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। घायल होने के बाद भी उन्हें समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिली। कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गई।
सबसे बड़ा झटका यह कि मामले में गिरफ्तार एकमात्र आरोपी को लोअर कोर्ट ने जमानत दे दी। पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद बाकी नहीं रही।
झंझारपुर के कय्यूम का मामला और भी दर्दनाक है। वह 13 जनवरी को काम की तलाश में निकले थे। गांव के बाहर ही उन पर हमला हुआ। उनकी हत्या हो गई। अब तक पुलिस ने सिर्फ एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। कय्यूम की विधवा और चार बच्चों को अब तक कोई मदद नहीं। एपीसीआर इस परिवार को कानूनी सहायता दे रहा है।
सीवान में फरार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
सीवान ज़िले में शहज़ाद अली को गांव की एक भीड़ ने अपहरण किया। उन्हें एक पेड़ से बांधकर बेरहमी से पीटा गया। हमला इतना भयानक था कि शहज़ाद की जान चली गई।
शहज़ाद की पत्नी मोबीना खातून ने एफआईआर दर्ज की। मामले में कई मुख्य आरोपी नामजद हैं। लेकिन वे सभी फरार हैं। पुलिस ने अभी तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया।
एपीसीआर के प्रतिनिधिमंडल ने बढ़िया थाने में पहुंचकर एक ज्ञापन सौंपा। इसमें शहज़ाद की हत्या की निष्पक्ष और समय पर जांच की मांग की गई है। सभी आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी और पीड़ित के परिवार व गवाहों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय किए जाने की मांग भी रखी गई।
एपीसीआर ने कहा है कि भीड़ की हिंसा के मामलों में पुलिस की देरी, जमानत की सुविधा और मुआवजे में कटौती आम बात बन गई है। इससे क़ानून के शासन पर लोगों का विश्वास टूटता है। राज्य सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए।
📌 Sources & References
- maktoobmedia.com



