JabalpurNationalNews

पहला दिन : दावते इस्लामी इज्तिमा : गुड टच – बैड टच से लेकर मय्यत के गुस्ल और डिज़ास्टर मैनेजमेंट तक — असल कामयाबी तक पहुंचाने वाला अनोखा इज्तिमा जबलपुर में जारी

बाज़ मीडिया, रज़ा चौक डिवीज़न, जबलपुर। जबलपुर की सरज़मीन पर रूहानियत और इल्म का संगम देखने को मिला, जब हाजी सुब्हानुल्लाह शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह के मैदान में दावते इस्लामी का दो दिवसीय इज्तिमा बड़े एहतमाम और सुकून के माहौल में जारी है।

यह इज्तिमा मंगलवार, 21 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे कुरआन की तिलावत और नात-ए-पाक से शुरू हुआ। फजाईल-ए-दरूद, तौबा इस्तिग़फार और सलातो सलाम की महक में पूरा मैदान रौशन हो उठा। इज्तिमा आज रात बुधवार की रात 10 बजे तक जारी रहेगा।

🌿 पहले दिन का सबसे अहम प्रोग्राम: गुड टच और बैड टच पर वर्कशॉप

Advertisement

इज्तिमा के पहले दिन का सबसे असरदार प्रोग्राम “गुड टच और बैड टच” पर वर्कशॉप रहा, जिसमें नौजवानों को इस्लाम की हया, इज़्ज़त और पाकदामनी की तालीम दी गई।
वक्ताओं ने कुरआन-ए-पाक और हदीस-ए-मुबारक के हवाले से बताया कि हया ईमान का हिस्सा है, और जब हया खत्म हो जाती है तो इंसान हर गुनाह में मुरतकिब हो सकता है।

इस वर्कशॉप में बताया गया कि आज का समाज किस तरह क़ौमे लूत की गंदगी में फंसता जा रहा है — जो गुनाह अल्लाह तआला की नज़रों में इतना संगीन था कि जिस कौम ने उसे अपनाया, उस पर आसमान से अज़ाब बरसा दिया गया।
वक्ताओं ने कहा कि आज वही गुनाह आधुनिकता और “फ्रीडम” के नाम पर स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया के ज़रिये फिर से फैलाया जा रहा है।

नौजवानों को बताया गया कि इस्लाम ने जिस लानती अमल (होमो सेक्शुअलिटी, गे रिलेशन आदि) को हराम और फितरत के खिलाफ़ बताया है, उसे अब “नॉर्मल” कहकर पेश किया जा रहा है — जो नई नस्ल के ईमान और अज़मत के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है।

इस मौके पर इस्लामी स्कॉलर्स ने जदीद साइंस रिसर्च के हवाले से भी बताया कि ऐसे अमल इंसान की सेहत, मानसिक स्थिति और सामाजिक ज़िंदगी के लिए कितने नुकसानदेह साबित होते हैं।
वर्कशॉप के आख़िर में नौजवानों को इस्लामी नज़रिया-ए-हया, निगाह की हिफ़ाज़त, और बुराई से बचने के अमली तरीक़े बताए गए।
उलेमा ए किराम ने कहा —

“जो अपनी निगाहों, ज़बान और दिल को पाक रखता है, वही अल्लाह की नज़रों में इज़्ज़त और कामयाबी पाता है।”

🌙 पहले दिन के इल्मी और अमली सेशन्स ..

इज्तिमा का पहला सेशनवक़्त की अहमियत पर था, जिसमें यह बताया गया कि वक्त की कद्र करना मोमिन की पहचान है। वक्त को बेकार गंवाना ज़िंदगी और आख़िरत दोनों का नुकसान है।
दूसरा सेशन जुहर के बाद हुआ, जिसमें फज़ाईल-ए-अहले बैत और सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम पर बयान हुआ।
उलेमाए किराम ने बताया कि सहाबा और अहले बैत की ज़िंदगियां सब्र, अख़लाक़ और सुन्नत की चलती फिरती तालीम हैं।

इसके बाद तदफीन-ए-मय्यतपर अमली वर्कशॉप हुआ, जिसमें बताया गया कि किसी मय्यत को गुस्ल, कफ़न और दफ़न करने के इस्लामी तरीक़े क्या हैं, और कैसे हर मुसलमान को इन बातों की इल्मी जानकारी होनी चाहिए।

असर की नमाज़ के बाद गुड टच और बैड टच पर इंटरैक्टिव सेशन हुआ, जबकि मगरिब की नमाज़ के बादअक़ाइद-ए-अहले बैत” पर असरदार खिताब हुए।
रात के सत्र में ज़िक्र, दुआ और इस्तिग़फार की महफिलों से माहौल रूहानियत से भर उठा।

🕌 इज्तिमा का मक़सद…

दावते इस्लामी का यह इज्तिमा ज़िंदगी बदलने का पैग़ाम है।
उलेमाए किराम अपने बयानात में बता रहे हैं कि असल कामयाबी उसी की है जो अपने आमाल, अख़लाक़ और तालीम को सहाबा और औलिया की मिसाली ज़िंदगियों के मुताबिक ढाल ले।
इज्तिमा में चल रहे प्रैक्टिकल सेशनों में मय्यत को ग़ुस्ल देने, डिज़ास्टर मैनेजमेंट, और सामाजिक मसाइल पर भी तालीम दी जा रही है।

मैदान में हर तरफ़ इल्म, ज़िक्र और दुआ की रौनक है — बच्चे, नौजवान, बुज़ुर्ग और खवातीन सभी तालीम-ए-दीन में मशग़ूल हैं।
हर सेशन के बाद सलातो सलाम और दरूद शरीफ़ की आवाज़ों से माहौल गूंज उठता है।

इज्तिमा में शिरकत की दावत

दावते इस्लामी के स्थानीय जिम्मेदार हाफ़िज़ इमरान अत्तार क़ादरी ने बाज़ मीडिया से बातचीत में कहा:

“हमारा मक़सद समाज में दीन की तालीम, हया और सुन्नत की फ़रोग़ देना है। नौजवान अगर इस्लामी सोच को अपनाएँ तो समाज से हर बुराई, फितना और फसाद खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा।”

उन्होंने शहर के तमाम मुसलमान भाइयों और बहनों से इस मुबारक इज्तिमा में शिरकत करने की ख़ास दावत दी।

📍 मक़ाम: दरगाह हाजी सुब्हानुल्लाह शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह, जबलपुर
📅 मुद्दत: 21 से 22 अक्टूबर 2025
🕰️ समापन: बुधवार रात 10 बजे

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
Back to top button

You cannot copy content of this page