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Cyber Crime Alert: “आप टेरर केस में दोषी हैं” — भोपाल के शमसुल हसन को आए पुणे फर्जी ATS कॉल ने उड़ाए होश!

बाज़ मीडिया, भोपाल, । डिजिटल युग में जैसे-जैसे तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा बन रही है, वैसे-वैसे साइबर अपराधों के तरीके भी और अधिक चालाक व खतरनाक होते जा रहे हैं। ऐसा ही एक मामला भोपाल में सामने आया, जहाँ एक एडवोकेट को “डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड” का शिकार बनाने की कोशिश की गई।
पुलिस की समय पर कार्रवाई ने न केवल एक बड़ी ठगी को रोक लिया, बल्कि एक नई तरह की साइबर अपराध तकनीक का पर्दाफाश भी किया।


⚖️ मामले का विवरण: वकील को बनाया गया निशाना

पीड़ित एडवोकेट शमसुल हसन, निवासी 165-ए, हाउसिंग बोर्ड, कोहेफिजा, भोपाल, को पुणे एटीएस (Anti-Terrorist Squad) के नाम से फोन आया।
कॉलर ने उन्हें “पहलगाम मामले में आरोपी” बताते हुए परिवार समेत डराने-धमकाने की कोशिश की।
इसके बाद उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर रखा गया, और कहा गया कि वे किसी से बात न करें या कहीं बाहर न जाएँ — यह स्थिति ही “डिजिटल अरेस्ट” कहलाती है।

दरअसल, ठग इस तकनीक में पीड़ित को मानसिक रूप से बंदी बनाकर भय का माहौल बनाते हैं, ताकि वह डर के मारे पैसे ट्रांसफर कर दे या बैंक जानकारी साझा कर दे।

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एडवोकेट हसन लगभग तीन घंटे तक इस डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रहे, लेकिन परिवार ने सूझबूझ से तत्काल थाना कोहेफिजा पुलिस को सूचना दे दी।


🚔 पुलिस की त्वरित कार्रवाई से बचा बड़ा साइबर फ्रॉड

थाना प्रभारी आई.के.जी. शुक्ला सूचना मिलते ही अपनी टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुँचे।
परिवार को सुरक्षा प्रदान की गई और पीड़ित को आश्वस्त किया गया कि यह कॉल फर्जी और साइबर ठगों की साजिश है।
पुलिस ने तुरंत जांच शुरू की, और अज्ञात नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की — लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुआ।
फिलहाल साइबर पुलिस व तकनीकी टीम नंबर के स्रोत और नेटवर्क ट्रेसिंग पर काम कर रही है।

वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले को गंभीर साइबर अपराध श्रेणी में लेते हुए विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।


🔍 क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड?

डिजिटल अरेस्ट एक नई साइबर क्राइम तकनीक है, जो हाल के वर्षों में भारत में तेज़ी से फैल रही है।
इसमें ठग किसी सरकारी एजेंसी (जैसे CBI, NIA, ATS या पुलिस) के नाम से कॉल करते हैं।
वे दावा करते हैं कि पीड़ित किसी अपराध में शामिल है — और फिर उसे “जांच पूरी होने तक” वीडियो कॉल पर बने रहने को कहते हैं।
इस दौरान पीड़ित से कहा जाता है कि वह किसी से बात न करे, न बाहर जाए, और “सुरक्षा कारणों” से अपने पैसे एक “सुरक्षित खाते” में ट्रांसफर करे — जो असल में ठगों का खाता होता है।

यह मनोवैज्ञानिक आतंक और तकनीकी धोखाधड़ी का घातक मिश्रण है, जिसमें डर और भ्रम पैदा करके ठगी की जाती है।


🧠 कैसे बचें डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से

पुलिस और साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूक रहना ही सबसे बड़ा हथियार है।
कुछ अहम सावधानियाँ:

  1. किसी भी व्यक्ति पर बिना प्रमाण विश्वास न करें, चाहे वह खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताए।
  2. वीडियो कॉल पर किसी से व्यक्तिगत या बैंक संबंधी जानकारी साझा न करें।
  3. किसी भी एजेंसी से कॉल आने पर पहले स्थानीय थाने या साइबर हेल्पलाइन (1930) पर सत्यापन करें।
  4. घबराएँ नहीं, ठग हमेशा डराने की रणनीति अपनाते हैं।
  5. किसी भी अज्ञात लिंक, ईमेल या ऐप डाउनलोड से बचें।

🛡️ पुलिस का संदेश

थाना कोहेफिजा पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि किसी भी संदिग्ध कॉल या धमकी भरे संदेश की सूचना तुरंत पुलिस या नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर दें।

“डिजिटल ठग अब डर का हथियार बना रहे हैं। जागरूक नागरिक ही इसका सबसे मजबूत जवाब हैं।” — आई.के.जी. शुक्ला, थाना प्रभारी

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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