Baz Special Report : एक नाम, दो पहचान! कैसे अमित चतुर्वेदी ने खम्परिया बनकर पुलिस, राजनीति और खनन माफिया की दुनिया में मचा दी थी हलचल

रात के सन्नाटे में नागपुर की एक तंग गली में पुलिस की कदमों की आहट बढ़ती जा रही थी। एक दरवाज़े के पीछे, उम्र से पहले बूढ़ा हुआ एक आदमी सांस रोके बैठा था—वही आदमी, जिसने कभी दो जिलों की पुलिस को चुनौती दी थी। कभी चतुर्वेदी, फिर खम्परिया बनकर पहचान बदलता यह चिटलर तीन साल तक कानून की आंखों में धूल झोंकता रहा। मगर इस रात, उसकी किस्मत ने जवाब दे दिया। दरवाज़ा टूटा, हथकड़ी झनझनाई… और वह शातिर, जिसकी तलाश में पुलिस फाइलें पीली हो गई थीं, आखिरकार पकड़ लिया गया। उसकी गिरफ़्तारी के साथ ही अपराध, राजनीति और फर्जी नामों की भूलभुलैया अब खुलने को तैयार थी।
जांच एजेंसियों को बरसों चकमा देकर फरार चल रहा कुख्यात खनन माफिया और बड़े पैमाने पर टोल-धोखाधड़ी का मास्टरमाइंड अमित खम्परिया आखिरकार नागपुर में पुलिस के हत्थे चढ़ गया। डेढ़ लाख के इनामी इस अपराधी की गिरफ्तारी ने अपराध जगत की परतें ऐसे खुलीं कि पुलिस भी दंग है।
कहानी की शुरुआत—अनिरुद्ध चतुर्वेदी का बेटा, पर नाम बना ‘खम्परिया’
सतना और उमरिया में कई संगीन मामलों में फंसने के बाद अमित अपने असली नाम अमित चतुर्वेदी को छोड़कर जबलपुर में छुप गया।
यहां उसने खुद को नया जन्म देते हुए मामा प्रकाश खम्परिया का सरनेम अपनाया और बन गया—अमित खम्परिया।
वोटर आईडी, पैन, आधार… सब कुछ नए नाम पर!
धीरे-धीरे उसकी असली पहचान पीछे छूट गई और नया नाम शहर में फैल गया—खम्परिया… चिटलर खम्परिया!
अपराध की दुनिया में खुला खेल
उमरिया–सतना की पुलिस को चकमा देकर जब वह जबलपुर पहुंचा, तो यहां भी ‘काम’ बंद नहीं किया।
2010 में भेड़ाघाट क्षेत्र में मारपीट और हमले के बाद उस पर हत्या के प्रयास और बलवा जैसे गंभीर मामले दर्ज हुए।
लेकिन खम्परिया की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

कान्हा नेशनल पार्क के टोल पर ‘दादागिरी’
अपने मामा की तरह खनन और टोल कारोबार में घुसते ही अमित ने 2010-11 में मंडला जिले के इंद्री गांव के पास कन्हार नदी वाले टोल का ठेका पकड़ लिया।
पर ठेका मिला था वैध काम का… और शुरू हुई अवैध कमाई!
- बैंक गारंटी में फर्जीवाड़ा
- दस्तावेजों में हेराफेरी
- और सबसे बड़ा खेल—पर्यटकों से तय राशि का 3-4 गुना टोल वसूलना!
टोल पर उसके गुर्गों का ऐसा दबदबा था कि पर्यटक कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं करते थे।
आखिर शिकायतें हुईं और 31 मई व 7 जून 2011 को उसके खिलाफ धोखाधड़ी के मामले दर्ज हुए।

कोर्ट ने सुनाई कठोर सजा — और फिर… अचानक गायब!
सालों चली सुनवाई के बाद 22 सितंबर 2021 को कोर्ट ने अमित और उसके साथियों को
- 5-5 साल की कठोर कैद
- 1-1 हजार रुपए जुर्माना
की सजा सुनाई।
2022 में मंडला पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया, लेकिन बीमारी का बहाना बनाकर अस्पताल गया, हाई कोर्ट से जमानत ली… और फिर गायब!
पूरा तीन साल पुलिस को चकमा देता रहा।
नागपुर में नई पहचान, नया ठिकाना
फरारी के दौरान वह अपने पिता अनिरुद्ध चतुर्वेदी के साथ नागपुर के एक किराए के अपार्टमेंट में छिपा था।
यहीं से वह मुंबई के एक बड़े अस्पताल में सर्वाइकल का इलाज भी करवा चुका था।
सुविधा भी, सुरक्षा भी… और पुलिस को खबर तक नहीं!
लेकिन अपराध का सफर आखिर कभी न कभी खत्म होता है।
5 दिसंबर 2025 की रात पुलिस ने घेराबंदी कर उसे धर दबोचा।
अब शुरू हुई ‘सच’ की खुलती किताब
अमित को कोर्ट में पेश कर पुलिस ने तीन दिन की रिमांड हासिल की है।
अफसरों का कहना है कि यह मामला अब और बड़ा खुल सकता है—
- खनन के बड़े नेटवर्क,
- फर्जी पहचान बनाने की पूरी चेन,
- और कई जिलों में किए गए गोरखधंधे
सबके सामने आने की संभावना है।
अपराध की गलियों से राजनीति की राह पकड़ने वाले इस शातिर की गिरफ्तारी ने पुलिस को एक बड़ा सिरा दे दिया है।
अब देखना यह है कि खम्परिया की कहानी का अगला पन्ना कितना चौंकाने वाला साबित होता है।



