BAZ World: यमन की जंग बेकाबू! सऊदी बॉर्डर पर ज़मीनी युद्ध शुरू — तेल, सरहद और सत्ता के लिए कत्लेआम, खाड़ी देशों में खुली दरार

पूर्वी यमन में नई ज़मीनी जंग: सऊदी सीमा पर भिड़े पुराने सहयोगी, खाड़ी देशों की दरार खुलकर सामने
सना/अल-मुकल्ला। यमन की लंबे समय से जारी जंग में एक और खतरनाक मोड़ आ गया है। सऊदी अरब से सटी पूर्वी सीमा पर अचानक भड़की ज़मीनी लड़ाई ने न सिर्फ यमन के हालात को और विस्फोटक बना दिया है, बल्कि खाड़ी देशों के भीतर बढ़ती खींचतान को भी बेनकाब कर दिया है। इस नए फ्रंट पर सऊदी समर्थित सरकारी बलों और यूएई-समर्थित दक्षिणी अलगाववादी आमने-सामने हैं, जिससे युद्ध के जल्द थमने की उम्मीद और कमजोर पड़ती नजर आ रही है।
ज़मीनी जंग: कहां और कैसे भड़की लड़ाई
लड़ाई का केंद्र यमन के पूर्वी प्रांत हदरमौत और अल-मह्रा बन गए हैं। ये दोनों सूबे सऊदी अरब के साथ लंबी रेगिस्तानी सीमा साझा करते हैं और यमन के कुल भूभाग का लगभग आधा हिस्सा यहीं फैला हुआ है। बीते कुछ दिनों में सऊदी समर्थित नेशनल शील्ड और सरकारी इकाइयों की तैनाती रमाह, थमूद और अन्य सीमावर्ती सेक्टरों में तेज़ी से बढ़ी है।
इन इलाकों में उनका सीधा सामना यूएई समर्थित साउदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल (STC) और हदरमी एलीट फोर्सेस से हो रहा है। दोनों पक्षों ने सामरिक ठिकानों, सैन्य शिविरों और सरहदी मार्गों पर नियंत्रण के लिए मोर्चेबंदी कर ली है, जिससे किसी भी समय बड़े पैमाने पर टकराव का खतरा बना हुआ है।
तेल, सरहद और सत्ता की जंग
पूर्वी यमन सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम है। यहां तेल और गैस संसाधन हैं, सीमा पार व्यापार के रास्ते हैं और ऐसे सैन्य कैंप मौजूद हैं, जो पूरे यमन के पावर बैलेंस को प्रभावित करते हैं।
सऊदी अरब इन इलाकों में अपने वफादार बलों की पकड़ मजबूत करना चाहता है, ताकि तेल-समृद्ध क्षेत्रों और सरहदी रास्तों पर उसका नियंत्रण रहे। वहीं दूसरी ओर, STC इन क्षेत्रों को अपनी प्रस्तावित ‘दक्षिणी राज्य’ परियोजना का अहम हिस्सा मानता है और इन्हें किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहा।
सऊदी-यूएई तनातनी और हवाई हमले
रियाद और अबूधाबी के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। सऊदी अरब का दावा है कि यूएई, STC को हथियारों और वाहनों की सप्लाई कर सीमा के पास तनाव बढ़ा रहा है। इसी बीच सऊदी लड़ाकू विमानों द्वारा कुछ ऐसे ठिकानों पर हवाई हमले भी किए गए हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे STC से जुड़े थे या संदिग्ध हथियार खेप के लिए इस्तेमाल हो रहे थे।
यूएई ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह यमन में किसी नई जंग को बढ़ावा नहीं दे रहा। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि दोनों के समर्थित गुट आमने-सामने खड़े हैं और गोलियां चल रही हैं।
तुर्की की निगाहें और क्षेत्रीय राजनीति
तुर्की इस संघर्ष में सीधे तौर पर लड़ाई का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसका कूटनीतिक रोल अहम माना जा रहा है। अंकारा सऊदी और अमीराती नेतृत्व से लगातार संपर्क में है और रेड सी व हॉर्न ऑफ अफ्रीका कॉरिडोर में अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि तुर्की, खाड़ी देशों के भीतर उभरती दरारों पर करीबी नजर रखे हुए है, क्योंकि इसका असर पूरे क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा और व्यापार मार्गों पर पड़ सकता है।
इंसानी तबाही का बढ़ता खतरा
यमन की जंग पहले ही दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बन चुकी है। सालों से जारी लड़ाई, भुखमरी, बीमारियों और स्वास्थ्य ढांचे के टूटने से लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। लाखों यमनी अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं और करोड़ों आज भी मानवीय मदद पर निर्भर हैं।
अब अगर हदरमौत और अल-मह्रा जैसे अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले इलाकों में लड़ाई फैलती है, तो नए विस्थापन, स्कूलों और घरों की तबाही, और बुनियादी सेवाओं के पूरी तरह ठप होने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। स्थानीय लोगों में डर है कि यह इलाका भी जल्द ही बमबारी और संघर्ष की चपेट में आ सकता है।
GCC के भीतर गहरी होती दरार
पूर्वी यमन में खुला यह नया मोर्चा इस बात का साफ संकेत है कि हूती विरोधी खेमे के भीतर एकता बिखर चुकी है। सऊदी अरब और यूएई अब एक साझा दुश्मन के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को बचाने और बढ़ाने के लिए प्रतिद्वंद्वी बनते दिख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह जंग लंबी और खून-खराबे वाली साबित हुई, तो इसका असर सिर्फ यमन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खाड़ी सहयोग परिषद के भीतर सऊदी-यूएई तनाव खुलकर सामने आ सकता है और रेड सी व अरब सागर के अहम व्यापारिक रास्तों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
कुल मिलाकर, पूर्वी यमन में भड़की यह नई ज़मीनी जंग एक बार फिर साबित कर रही है कि यमन की लड़ाई अब सिर्फ आंतरिक संघर्ष नहीं रही। यह क्षेत्रीय शक्तियों के हितों, आपसी प्रतिस्पर्धा और बदलते गठबंधनों की जंग बन चुकी है—जिसकी सबसे बड़ी कीमत आज भी आम यमनी जनता चुका रही है।



