बैतूल में ‘बुलडोज़र न्याय’: नईम का सपना चकनाचूर! गरीब बच्चों के स्कूल को ‘अफवाह और नफ़रत’ में मदरसा बताकर बुलडोज़र से रौंद दिया गया

बैतूल (मध्य प्रदेश) | बाज मीडिया
देश में नफरत, बदनामी और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोपों के बीच एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है। जम्मू में मेरिट के आधार पर मुस्लिम छात्रों को MBBS में प्रवेश मिलने के बाद एक मेडिकल कॉलेज को बंद किए जाने की खबर अभी थमी भी नहीं थी कि मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से एक और मामला सुर्खियों में आ गया। यहां एक निजी स्कूल को कथित तौर पर केवल इसलिए बुलडोज़र से गिरा दिया गया क्योंकि उसे एक मुस्लिम व्यक्ति ने बनवाया था।
इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही देशभर में सवाल उठने लगे। कई लोग इसे “बुलडोज़र न्याय” का एक और उदाहरण बता रहे हैं, जहां बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाए, एकतरफा कार्रवाई की गई।

आदिवासी और दलित बच्चों के लिए था सपना
स्थानीय निवासी अब्दुल नईम का आरोप है कि उन्होंने ढाबा गांव और आसपास की आदिवासी बस्तियों के बच्चों के लिए नर्सरी से कक्षा 8 तक का स्कूल खोलने का सपना देखा था। इस सपने को साकार करने के लिए नईम ने लगभग 20 लाख रुपये का कर्ज लिया और परिवार की जीवनभर की बचत लगा दी।
नईम बताते हैं कि इन इलाकों में बच्चों को पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। “मैं चाहता था कि मेरे गांव के बच्चे यहीं पढ़ सकें और आगे बढ़ें,” उन्होंने कहा।
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‘अनधिकृत मदरसा’ की अफवाह और कार्रवाई
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्कूल को अफवाहों के आधार पर गलत तरीके से एक “अनधिकृत मदरसा” बताकर बदनाम किया गया। इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए स्कूल के कुछ हिस्सों को गिरा दिया। यह कार्रवाई 13 जनवरी की शाम को की गई, जब भारी पुलिस बल के साथ JCB और अन्य मशीनें निर्माण स्थल पर पहुंचीं।
नईम का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई बिना किसी पूर्व नोटिस और बिना उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिए की गई। “अगर कोई कमी थी, तो मुझे बताया जाता। मैं जुर्माना देने या कागज़ पूरे करने को तैयार था,” उन्होंने कहा।
निजी ज़मीन, फिर भी सवालों में कार्रवाई
नईम के अनुसार, स्कूल उनकी निजी ज़मीन पर बनाया जा रहा था। उन्होंने कमर्शियल भूमि का डायवर्जन कराया था, पंचायत से NOC प्राप्त की थी और 30 दिसंबर को स्कूल शिक्षा विभाग में मान्यता के लिए सभी ज़रूरी दस्तावेज़ों के साथ आवेदन भी जमा किया था।
इसके बावजूद, 11 जनवरी को ग्राम पंचायत ने बिना अनुमति निर्माण का हवाला देते हुए एक नोटिस जारी कर स्वयं ढांचा गिराने का आदेश दे दिया। जब नईम जवाब देने पंचायत कार्यालय पहुंचे, तो उनका आवेदन लेने से इनकार कर दिया गया।
कलेक्टर से मिलने गए, पीछे गिरा दिया गया स्कूल
नईम का आरोप है कि 13 जनवरी को जब वे गांव के कुछ लोगों के साथ जिला कलेक्ट्रेट में कलेक्टर से मिलने गए थे, उसी दौरान प्रशासन ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई शुरू कर दी। शाम तक स्कूल की दीवारें और सामने का शेड मलबे में बदल चुके थे।
प्रशासन का पक्ष
सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट अजीत मरावी ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि ग्राम पंचायत की शिकायत के बाद जांच की गई थी। उनके अनुसार, निर्माण का कुछ हिस्सा अतिक्रमण के दायरे में पाया गया, इसलिए केवल “गैरकानूनी हिस्से” को हटाया गया है, पूरी इमारत को नहीं।
हालांकि, नईम इन दावों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि उनके पास सभी जरूरी अनुमतियां थीं और अगर कोई तकनीकी कमी थी, तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए था।
‘भारत बुलडोज़रों पर नहीं बना’
इस घटना ने एक बार फिर देश में कानून के राज, समान नागरिकता और संवैधानिक मूल्यों पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक की पहचान के आधार पर उसके सपनों को यूं मलबे में बदला जा सकता है?
भारत बुलडोज़रों पर नहीं, बल्कि बहुलवाद, गरिमा और समान अधिकारों के सिद्धांतों पर खड़ा है। बैतूल की यह घटना सिर्फ एक स्कूल के टूटने की नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जो आम नागरिक संविधान और प्रशासन से करता है।



