
~ रिपोर्ट, अरशद कादरी, बाज़ मीडिया, जबलपुर। जैसे ही ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की शहादत की खबर फैली, जबलपुर में भी चर्चा और ग़म की एक लहर दौड़ गई। जबलपुर की मस्जिद ज़ाकिर अली में मगरिब की नमाज़ और अफ़्तार के बाद एक श्रद्धांजलि सभा रखी गई। मस्जिद का माहौल खामोश था, आंखें नम थीं और दिल भारी।

मजलिस की शुरुआत तिलावत-ए-क़ुरआन से हुई। उसके बाद जब मरहूम का ज़िक्र आया तो कई लोग अपने जज़्बात रोक न सके। बुज़ुर्गों ने कहा कि उन्होंने एक ऐसा दौर देखा, जब एक शख्स दुनिया की बड़ी ताक़तों के सामने अपने उसूलों पर डटा रहा।
“वो सिर्फ एक लीडर नहीं, एक हौसला थे”
मोहतरम बाबा जैदी ने नम आंखों और भर्राई आवाज़ में कहा कि अगर यह खबर दुरुस्त है, तो यह सिर्फ एक शख्स की मौत नहीं, बल्कि एक फ़िक्र, एक उसूल और एक मुक़ावमत पर हमला है। उन्होंने कहा कि मरहूम हमेशा कहते थे कि परमाणु हथियार इंसानियत के लिए फ़ितना और तबाही का ज़रिया हैं। उनका पैग़ाम जंग नहीं, बल्कि अमन, इंसाफ़ और इंसानी हिफ़ाज़त था।

डॉ. मुज्तबा आब्दी ने अपने बयान में कहा कि इस्लाम की तालीम साफ़ है—ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े हो, मगर इंसाफ़ और हिकमत के साथ। उन्होंने अफ़सोस जताया कि आज भी बड़ी ताक़तें अपनी कुव्वत दिखाने में लगी हैं, जबकि आम इंसान सिर्फ सुकून, अमन और इज़्ज़त के साथ जीना चाहता है। उन्होंने कहा कि दुनिया को ताक़त की ज़ुबान से नहीं, बल्कि बातचीत और अद्ल की राह से चलना चाहिए।
मौलाना हैदर मेहदी ने कहा, “उनकी ज़िंदगी सब्र, इस्तिक़ामत और तवक्कुल अलल्लाह की जीती-जागती मिसाल थी। दबाव, पाबंदियों और मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने अपने दीन और उसूलों से समझौता नहीं किया। आने वाली नस्लें उन्हें एक ऐसे बुज़ुर्ग रहबर के तौर पर याद करेंगी, जिन्होंने आख़िरी दम तक अपने मौक़िफ़ पर क़ायम रहकर उम्मत को हौसला दिया।”
दुआओं में उठा हर हाथ
सभा के आखिर में जब मग़फिरत की दुआ हुई तो मस्जिद में मौजूद हर शख्स ने हाथ उठाए। दुआ की गई कि अल्लाह मरहूम को जन्नतुल फिरदौस अता करे और दुनिया को अमन नसीब करे।
जबलपुर के कई घरों में देर रात तक इसी खबर पर चर्चा होती रही। लोगों ने कहा कि चाहे दुनिया में कैसी भी सियासत हो, हमें अपने मुल्क में अमन, भाईचारा और कानून की हिफाज़त करनी है।
रिपोर्ट: बाज़ मीडिया डेस्क, जबलपुर



