खजरी बाईपास के रजा मेटल विस्फोट मामले में शमीम कबाड़ी को बड़ी राहत : हाईकोर्ट ने एफआईआर समेत आपराधिक कार्यवाही की निरस्त !

जबलपुर। थाना अधारताल क्षेत्र के खजरी खिरिया बाईपास स्थित राजा मेटल इंडस्ट्री में हुए विस्फोट के मामले में आरोपी बनाए गए मो. शमीम खान (शमीम कबाड़ी) को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने शमीम खान के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर चल रही समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। अदालत ने मामले के रिकॉर्ड और याचिकाकर्ता की कथित भूमिका का परीक्षण करने के बाद पाया कि विस्फोट की घटना से शमीम खान की प्रत्यक्ष भूमिका को जोड़ने वाली पर्याप्त सामग्री रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है।
मामले में शमीम खान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304, 120-बी और 212 के साथ विस्फोटक अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत कार्रवाई की गई थी। इसके बाद शमीम खान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी।
प्रत्यक्ष भूमिका जोड़ने वाला पर्याप्त साक्ष्य नहीं
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान केस डायरी और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत के समक्ष ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाया गया, जिससे यह प्रथमदृष्टया स्थापित हो कि शमीम खान की विस्फोट की घटना में प्रत्यक्ष भागीदारी थी अथवा उसके किसी कृत्य या आपराधिक लापरवाही के कारण घटना हुई।
अदालत ने मामले में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध सामग्री के बीच संबंध की जांच की। इस दौरान याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत भूमिका को घटना से जोड़ने वाली आवश्यक सामग्री का अभाव पाया गया। अदालत के दृष्टिकोण के अनुसार केवल आरोप लगाए जाने से किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं बन जाता। अभियोजन के लिए ऐसी सामग्री आवश्यक है, जो आरोपी की भूमिका को अपराध से जोड़ती हो।
आपराधिक षड्यंत्र के आरोप को भी नहीं मिला पर्याप्त आधार
शमीम खान पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप भी लगाया गया था। हाईकोर्ट ने इस पहलू की भी जांच की। रिकॉर्ड में ऐसी ठोस सामग्री नहीं मिली, जिससे यह प्रथमदृष्टया साबित हो कि याचिकाकर्ता ने विस्फोट से संबंधित कथित आपराधिक षड्यंत्र में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
अदालत ने आरोप और उनके समर्थन में उपलब्ध सामग्री के बीच आवश्यक कड़ी को भी देखा। सुनवाई के दौरान ऐसी पर्याप्त सामग्री सामने नहीं आई, जिससे शमीम खान की किसी सक्रिय भूमिका अथवा षड्यंत्र में भागीदारी को स्थापित किया जा सके।
किसी आरोपी को शरण देने का आरोप भी साबित नहीं
मामले में शमीम खान के खिलाफ किसी आरोपी को संरक्षण या शरण देने से संबंधित आरोप भी लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने इस पहलू पर भी रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत के सामने ऐसी पर्याप्त सामग्री नहीं आई, जिससे यह प्रथमदृष्टया स्थापित हो कि शमीम खान ने जानबूझकर किसी अपराधी को संरक्षण दिया अथवा उसे पुलिस या कानून की कार्रवाई से बचाने का प्रयास किया।
इस आधार पर धारा 212 के तहत लगाए गए आरोप को भी याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत भूमिका से जोड़ने वाला पर्याप्त आधार रिकॉर्ड पर नहीं पाया गया।
विस्फोटक सामग्री से सीधा संबंध भी स्थापित नहीं
हाईकोर्ट ने विस्फोटक अधिनियम की धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों की भी समीक्षा की। अदालत के सामने ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाया गया, जिससे शमीम खान का विस्फोटक सामग्री के कब्जे, नियंत्रण, भंडारण या उपयोग से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हो सके।
अदालत ने पाया कि अभियोजन की ओर से लगाए गए आरोपों को याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत भूमिका से जोड़ने के लिए आवश्यक सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थी। केवल किसी गंभीर घटना में नाम सामने आना अपने आप में आपराधिक दायित्व स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
अपराध की गंभीरता के साथ साक्ष्य भी जरूरी
हाईकोर्ट ने मामले में यह महत्वपूर्ण पहलू रेखांकित किया कि किसी अपराध की गंभीरता अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आधार नहीं हो सकती। अभियोजन के लिए रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री होना आवश्यक है, जिससे संबंधित व्यक्ति की अपराध में भूमिका प्रथमदृष्टया स्थापित हो सके।
अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को अपराध से जोड़ने वाली आवश्यक सामग्री रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का कारण बन सकता है। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत प्रदान करते हुए उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
एफआईआर और पूरी कार्यवाही निरस्त
मामले के तथ्यों, उपलब्ध रिकॉर्ड और याचिकाकर्ता की भूमिका पर विचार करने के बाद जस्टिस हिमांशु जोशी की सिंगल बेंच ने थाना अधारताल के क्राइम नंबर 513/2024 में मो. शमीम खान के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उक्त एफआईआर के आधार पर शमीम खान के खिलाफ चल रही समस्त आपराधिक कार्यवाही भी समाप्त कर दी गई।
सह-आरोपियों को स्वत: राहत नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश की सीमा भी स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि शमीम खान को दी गई राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित रहेगी। इस आदेश का मामले में शामिल अन्य सह-आरोपियों पर स्वतः कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इसका अर्थ है कि अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच, अभियोजन या ट्रायल की कार्यवाही पर इस आदेश से स्वतः रोक नहीं लगेगी और उनके मामलों में कार्रवाई कानून के अनुसार जारी रह सकती है।


