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जबलपुर में दावत-ए-इस्लामी का दो रोज़ा सुन्नतों भरा इज्तिमा का इख़्तिताम, नौजवानों की इस्लाह और दीन पर अमल का दिया पैगाम

उलमा-ए-किराम के बयान, जिक्र-ओ-अजकार, तहज्जुद और खुसूसी दुआ के साथ इज्तिमा का इख्तिताम

जबलपुर। दावत-ए-इस्लामी इंडिया की जानिब से 17 और 18 अक्टूबर 2026 को सुब्बाह शाह ग्राउंड जबलपुर में मुनअकिद दो रोज़ा सालाना सुन्नतों भरा इज्तिमा इशा की नमाज़ के बाद खुसूसी खिताब और दुआ के साथ इख्तिताम पज़ीर हुआ। इस रूह-परवर इज्तिमा में जबलपुर और अतराफ के इलाकों से तकरीबन 3,000 शरका ने शिरकत की। दो रोज़ा इज्तिमा के दौरान दीन की तालीम, इस्लाह-ए-आमाल, सुन्नतों पर अमल, नमाज़ की पाबंदी और नौजवानों की दीन की तरफ रगबत जैसे अहम मौज़ुआत पर खास तवज्जो दी गई।

दावत-ए-इस्लामी के मरकजी रहनुमाओं में शुमार हज़रत अल्लामा मौलाना मोहसिन मदनी साहब इस इज्तिमा में खास तौर पर शरीक हुए। इसके अलावा मध्य प्रदेश दावत-ए-इस्लामी के निगरां मोहसिन अत्तारी साहब, शहज़ाद मदनी साहब, मोहम्मद सलीम अत्तारी साहब, सादिक मिज़बाही साहब, हाजी हैदर नूरी साहब, हाफिज इमरान कादरी अत्तारी साहब, हाजी जावेद अत्तारी साहब, हाजी दिलशाद अत्तारी साहब और अनवार अत्तारी साहब समेत दीगर जिम्मेदारान और उलमा-ए-किराम ने भी शिरकत की।

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इस्लाह-ए-आमाल और तरबियते नौजवानान रहा इज्तिमा का अहम मकसद

इज्तिमा का बुनियादी मकसद नौजवानों की इस्लाह, उनके किरदार की तामीर और उन्हें दीन-ए-इस्लाम की तालीमात के मुताबिक जिंदगी गुजारने की तरफ रागिब करना रहा। इस दौरान मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों से तशरीफ लाए उलमा-ए-किराम ने मुख्तलिफ नशिस्तों में ईमान की अहमियत, अल्लाह पाक की इताअत, इश्क-ए-रसूल ﷺ, सहाबा-ए-किराम की सीरत, नमाज़ की पाबंदी और हुस्न-ए-अखलाक जैसे मौज़ुआत पर रहनुमाई की।

उलमा-ए-किराम ने अपनी नशिस्तों के जरिए इस बात की तरफ तवज्जो दिलाई कि नौजवानी इंसान की जिंदगी का एक अहम दौर है। इस उम्र में अगर इंसान को नेक सोहबत, दीन का सही इल्म और सुन्नतों पर अमल की फिक्र नसीब हो जाए तो उसकी जिंदगी बेहतर रुख इख्तियार कर सकती है। नौजवानों को चाहिए कि वे अपने वक्त की हिफाजत करें, वालिदैन के हुकूक अदा करें, बुरी सोहबत से बचें और अपने अखलाक व किरदार को बेहतर बनाने की कोशिश करें।

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इज्तिमा में इस बात पर भी जोर दिया गया कि दीन सिर्फ बयान सुनने और मजलिसों में शिरकत करने तक महदूद नहीं, बल्कि दीन की असल खूबसूरती इंसान के आमाल, किरदार और मामलात में जाहिर होती है। नमाज़ की पाबंदी, सच बोलना, अमानतदारी, वादे की पाबंदी और दूसरों के हुकूक का लिहाज करना एक नेक जिंदगी की अहम बुनियादें हैं।

नमाज़ की पाबंदी और सही तरीके से इबादत करने की तरबियत

इज्तिमा के दौरान नमाज़ के सही तरीके और दीन की बुनियादी तालीमात के बारे में खास तरबियती नशिस्तें और वर्कशॉप मुनअकिद की गईं। इनमें नमाज़ की अहमियत, उसकी पाबंदी और इबादत को सही तरीके से अदा करने की तरफ तवज्जो दिलाई गई।

नमाज़ इस्लाम के अहम फराइज में से है और एक मुसलमान की रोजमर्रा की जिंदगी में इसकी बुनियादी अहमियत है। पांच वक्त की नमाज़ की पाबंदी इंसान को अपने रब की याद से जोड़े रखती है। इज्तिमा में शिरकत करने वाले लोगों को दीन के अहकाम सीखने और उन्हें अपनी जिंदगी में अपनाने की तरफ रागिब किया गया।

नौजवानों को नशे से बचाने का पैगाम

इज्तिमा में नौजवानों को नशे से दूर रहने के मौज़ू पर भी खास तवज्जो दी गई। नशा इंसान की सेहत, अखलाक, घर-परिवार और मुस्तकबिल को नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में नौजवानों को नशे और दूसरी नुकसानदेह आदतों से बचाना और उन्हें नेक रास्ते की तरफ लाना समाज की अहम जरूरत है।

इस्लामी तालीमात इंसान को अपने जिस्म, अक्ल, माल और वक्त की हिफाजत की तालीम देती हैं। नौजवानों के लिए जरूरी है कि वे बुरी सोहबत और नुकसानदेह आदतों से बचें, अपने वालिदैन का एहतराम करें और अपनी सलाहियतों को नेक और फायदेमंद कामों में इस्तेमाल करें।

इज्तिमा में नमाज़ की तरबियत के साथ नशे से दूरी जैसे मौज़ुआत को शामिल करना इस बात की अहमियत को उजागर करता है कि नौजवानों की इस्लाह में दीन की तालीम के साथ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मसाइल पर भी तवज्जो दी जाए।

सीरत-ए-मुस्तफा ﷺ और सहाबा-ए-किराम की तालीमात पर बयान

दो रोज़ा इज्तिमा में जिक्र-ए-रसूल ﷺ, सीरत-ए-मुस्तफा ﷺ और सहाबा-ए-किराम की जिंदगी से जुड़े मौज़ुआत पर भी बयान हुए। उलमा-ए-किराम ने इस्लामी तालीमात की रौशनी में अच्छे अखलाक, सब्र, शुक्र, रहमदिली, सच्चाई और दूसरों के हुकूक अदा करने की अहमियत बयान की।

हुजूर नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत-ए-मुबारका तमाम इंसानों के लिए रहनुमाई का सरचश्मा है। आपकी तालीमात में वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक, पड़ोसियों के हुकूक की अदायगी, जरूरतमंदों की मदद, अमानतदारी और लोगों के साथ नरमी से पेश आने की तालीम मिलती है।

इज्तिमा में जिक्र-ओ-अजकार की खुसूसी महफिलें भी मुनअकिद हुईं, जिनमें शरका ने रूहानी माहौल में वक्त गुजारा। इस दौरान शरका ने तहज्जुद की नमाज़ भी अदा की। इबादत, जिक्र और दुआ से सजे इस माहौल में लोगों को अपनी जिंदगी का जायजा लेने और नेक आमाल की तरफ बढ़ने का मौका मिला।

खुसूसी खिताब और दुआ के साथ इज्तिमा का इख्तिताम

दो रोज़ा इज्तिमा का इख्तिताम 18 अक्टूबर को इशा की नमाज़ के बाद खुसूसी खिताब और दुआ के साथ हुआ। इस मौके पर दीन पर इस्तिकामत, नमाज़ की पाबंदी, सुन्नतों पर अमल और नेक आमाल अपनाने की तरफ तवज्जो दिलाई गई।

जबलपुर में मुनअकिद इस इज्तिमा में तकरीबन 2,000 शरका की शिरकत रही। दो रोज़ा इज्तिमा के जरिए नौजवानों की इस्लाह, दीन की तालीम और इस्लामी अखलाक को आम जिंदगी में अपनाने का पैगाम दिया गया। इज्तिमा का बुनियादी पैगाम यही रहा कि मुसलमान अपनी जिंदगी को कुरआन-ओ-सुन्नत की तालीमात के मुताबिक संवारें, नमाज़ की पाबंदी करें, बुराइयों से बचें और अपने किरदार से इस्लाम की खूबसूरत तालीमात का मुजाहिरा करें।

तलबीना के स्टॉल पर रही खास दिलचस्पी

इज्तिमा के मौके पर परिसर में मुख्तलिफ स्टॉल भी लगाए गए। इनमें जबलपुर के नौजवानों के startup जताफा के मशहूर product जताफा तलबीना का स्टॉल खास तौर पर लोगों की दिलचस्पी का मरकज रहा।

startup के co-founder तनवीर अहमद ने बताया .. जताफा एक Islamic food है। जिसे हुज़ूर नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पसंद किया करते थे। जिसका जिक्र हदीस की रिवायतों में भी मिलता है। इस्लामी रिवायतों में इसका तआरुफ एक ऐसे खाद्य पदार्थ के तौर पर मिलता है, जिसे मरीज और गमजदा शख्स के लिए भी मुफीद बताया गया है। स्टॉल पर आने वाले लोगों ने तलबीना में दिलचस्पी दिखाई।

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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