
जबलपुर की सरज़मीन पर रूहानियत, इल्म और इस्लाही तालीम का बे-मिसाल संगम उस वक़्त देखने को मिला जब हाजी सुब्हानुल्लाह शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह के मैदान में दावते इस्लामी का दो रोज़ा तारीखी इज्तिमा मुकम्मल हुआ। बुधरात को हुई इख़्तितामी दुआ के साथ यह इज्तिमा ख़त्म हुआ, लेकिन इसके असरात और पैग़ाम ने जबलपुर की फिज़ा में नई रूह फूंक दी।

इज्तिमा का आग़ाज़ मंगलवार, 21 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुआ।
मंच पर स्थानीय और बाहरी उलेमाए किराम मौजूद थे। फिज़ा में “सल्लू अलल हबीब ﷺ” की गूंज थी।
इसके बाद नात-ए-पाक पेश की गई, जिसने महफिल को रूहानी कैफियत में डुबो दिया।

दो दिन तक चले इस इज्तिमा में तक़रीबन 23 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने शिरकत की — जिनमें जबलपुर शहर के अलावा सिवनी, मंडला, कटनी, नरसिंहपुर, दमोह, और बालाघाट इलाक़ों से लोग शामिल हुए। मैदान में इस्लामी झंडे, कुरआनी आयातों के बैनर और हर कोने से उठती दरूद-ओ-सलाम की आवाज़ें माहौल को नूरानी बना रही थीं।

🕌 इज्तिमा की शुरुआत: तिलावत और नात की रूहानी महफ़िल
उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस्लामी तालीम की अहमियत, समाज में अमन, अख़लाक़ और तालीम-ए-दीन की ज़रूरत पर तफ़सील से बयान किया।
मौलाना साहब ने कहा —
“आज के नौजवान को मोबाइल और सोशल मीडिया की लहर में नहीं, सुन्नत की रौशनी में चलना है। इल्म और अमल दोनों को साथ लेकर चलना ही असल कामयाबी है।”
🌿 सबसे असरदार प्रोग्राम — “गुड टच और बैड टच” पर वर्कशॉप
पहले दिन का सबसे अहम और असरदार सेशन बच्चों और नौजवानों के लिए था — “गुड टच और बैड टच” पर इस्लामी वर्कशॉप।
इस वर्कशॉप में इस्लामी स्कॉलर्स और मेडिकल एक्सपर्ट्स ने मिलकर बताया कि कैसे इस्लाम ने हया, इज़्ज़त और खुद की हिफ़ाज़त को ईमान का हिस्सा बताया है।

वक्ताओं ने कुरआन-ए-पाक की आयतों और हदीसों के हवाले से समझाया कि जब इंसान अपनी निगाह, ज़बान और दिल को पाक रखता है, तो वो न सिर्फ गुनाह से बचता है बल्कि समाज को भी फसाद से महफूज़ रखता है।
उन्होंने यह भी बताया कि आज की “मॉडर्न सोसाइटी” में किस तरह फ्रीडम के नाम पर क़ौमे लूत का अमल फिर से फैलाया जा रहा है — जिसे इस्लाम ने हमेशा हराम, ममनूअ और फितरत के खिलाफ़ कहा है।
वर्कशॉप में नौजवानों को सिखाया गया कि कैसे सोशल मीडिया, स्कूल और दोस्तों के ग्रुप के ज़रिए यह गंदी सोच उनकी ज़िंदगी में दाख़िल होती है, और किस तरह उन्हें अपनी निगाह और नीयत की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।
साथ ही, मेडिकल दृष्टिकोण से बताया गया कि ऐसे अमल इंसान के मानसिक संतुलन, शारीरिक सेहत और सामाजिक रिश्तों को तबाह कर देते हैं।

वर्कशॉप के आखिर में नौजवानों से दुआ और अहद लिया गया कि —
“हम अपनी नज़र, ज़बान और सोच को इस्लाम की हदों में रखेंगे, और अपनी हया की हिफ़ाज़त करेंगे।”
🕰️ इल्मी और अमली तालीम का संगम

इज्तिमा का दूसरा सेशन “वक़्त की अहमियत” पर था। इसमें उलेमाओं ने बताया कि वक्त की कद्र करना ईमान की निशानी है।
उन्होंने कहा कि जो वक्त को बेकार गंवाता है, वो अपनी ज़िंदगी और आख़िरत दोनों को नुकसान पहुंचाता है।
मौलाना रज़ा हाशमी साहब ने कहा —
“एक मोमिन का हर लम्हा कीमती है। जो वक्त की कद्र करता है, वही दुनिया और दीन दोनों में सरफ़राज़ होता है।”
इसके बाद “फज़ाईल-ए-अहले बैत और सहाबा-ए-किराम” पर बयान हुआ।
उलेमाओं ने बताया कि सहाबा की ज़िंदगी सब्र, अख़लाक़, और सुन्नत की चलती फिरती मिसाल है।
उन्होंने नौजवानों से कहा कि अगर वे अपनी ज़िंदगी को इन आदर्शों पर ढाल लें, तो समाज में हर बुराई खुद-ब-खुद मिट जाएगी।
⚰️ “तदफीन-ए-मय्यत” और डिज़ास्टर मैनेजमेंट वर्कशॉप

दूसरे दिन का अहम हिस्सा “तदफीन-ए-मय्यत” पर अमली वर्कशॉप था।
इसमें बताया गया कि किसी मय्यत को ग़ुस्ल देने, कफ़न लपेटने और दफ़न करने के इस्लामी तौर-तरीक़े क्या हैं।
इमामों और जिम्मेदार भाइयों ने लाइव डेमो के ज़रिए दिखाया कि कैसे हर मुसलमान को इन बातों की इल्मी और अमली जानकारी होनी चाहिए ताकि किसी मौत या डिज़ास्टर की सूरत में वे शरीअत के मुताबिक़ अमल कर सकें।
इसके साथ ही “डिज़ास्टर मैनेजमेंट और सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी” पर भी वर्कशॉप हुआ, जिसमें बताया गया कि किसी हादसे, बाढ़ या आगजनी जैसी स्थिति में मुसलमानों की क्या ज़िम्मेदारी है — और कैसे उन्हें मदद, राहत और इंसाफ़ के लिए संगठित रहना चाहिए।

🌙 रूहानी रात — ज़िक्र, दरूद और तौबा की महफ़िल
रात के सत्र में इज्तिमा का माहौल पूरी तरह रूहानियत में बदल गया।
हज़ारों लोग तस्बीह हाथ में लिए, आँखों में आंसू और दिल में तौबा का जज़्बा लिए बैठे थे।
मंच से सलातो सलाम और दरूद शरीफ़ की आवाज़ें गूंज रहीं थीं — पूरा मैदान “या रसूल अल्लाह ﷺ” की सदाओं से भर गया।
उलेमा ने कहा कि असल कामयाबी उस इंसान की है जो अपने आमाल, अख़लाक़ और नीयत को अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की रज़ा के मुताबिक ढाल ले।
🤲 इख़्तितामी दुआ और मिल्लत की तामीर का अहद

बुधरात को इज्तिमा की इख़्तितामी दुआ हुई।
हज़ारों हाथ उठे — कोई अपनी तौबा के लिए, कोई अपने बच्चों के लिए, कोई उम्मत की बेहतरी के लिए।
दुआ में मुल्क में अमन, मुसलमानों की एकता, और नौजवानों की इस्लाही तालीम के लिए खास इल्तिज़ा की गई।
नौजवानों ने “तामीर-ए-मिल्लत ए इस्लामिया” का अहद किया कि वे समाज में अमन, इल्म और हया का पैग़ाम फैलाएँगे।

🕊️ दावते इस्लामी की तहरीक — दीन और दुनिया का संगम
दावते इस्लामी का यह इज्तिमा सिर्फ़ एक मजलिस नहीं बल्कि एक तहरीक है — जो नौजवानों के दिलों में इस्लामी तालीम, अमन और हया की लौ जला रही है।
इस तहरीक का मक़सद है — “हर मुसलमान तक दीन की तालीम पहुंचाना और उसे अमल की राह पर लगाना।”
स्थानीय जिम्मेदार हाफ़िज़ इमरान अत्तार क़ादरी ने बाज़ मीडिया से कहा —
“हमारा मिशन सिर्फ़ बयानात तक सीमित नहीं। हम नौजवानों को इस्लाम की असल तालीम, हया और सुन्नत के ज़रिए ज़िंदगी का मक़सद समझा रहे हैं। अगर नई नस्ल इस तालीम को अपनाए, तो समाज से फसाद और बुराई खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी।”

यह इज्तिमा दुआ के साथ खत्म हुआ, मगर इसका असर जबलपुर की गलियों और दिलों में देर तक बाकी रहेगा —
हर शख्स के लबों पर एक ही दुआ थी:
“या अल्लाह, हमें अपने दीन की खिदमत की तौफीक दे, और हमें सुन्नत की राह पर कायम रख।”







