Jabalpur

मोमिन ईदगाह कांड की पहली बरसी: एक कमेटी नहीं, पूरी व्यवस्था बदल गई ।

आज ही के दिन मोमिन ईदगाह, गोहलपुर में मुस्लिम भाजपा कार्यकर्ताओं और अंसारी समाज के नेताओं के बीच छिड़ी जंग में पुलिस ईदगाह में दाखिल हुई, ताले तोड़े गए और ईदगाह पर कानूनी रूप से कब्जा हुआ।

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13 अक्टूबर सिर्फ ईदगाह में कमेटी परिवर्तन का दिन नहीं था। यह दिन 1930 से चली आ रही व्यवस्था के परिवर्तन का दिन था। ईदगाह में अंजुमन मढ़ाताल वाली व्यवस्था लागू हो गई।

अब हर कोई जानता है कि ईदगाह की अगली कमेटी समाज तय नहीं करेगा, ईदगाह की अगली सियासत तय करेगी। अंजुमन की तरह जिसकी सरकार होगी, उसकी कार्यकर्ताओं की कमेटी आ जाएगी। जिसकी सरकार जाएगी, उसके कार्यकर्ताओं की कमेटी चली जाएगी।

13 अक्टूबर एक दुखद दिन था, जब ईदगाह की इज्जत मुसलमानों की आपसी लड़ाई में दागदार हो गई।

कहते हैं, इतिहास अपने आपको तब तक दोहराता है, जब तक उससे सबक हासिल न किया जाए। ईदगाह कांड से मुस्लिम समाज ने सबक सीखना तो दूर, यह भी मानने से इनकार कर दिया है कि जो हुआ, जिस तरह हुआ, वह गलत था। इसीलिए यह डर बरकरार है कि फिर किसी बड़ी वक्फ संपत्ति में यह पैटर्न रिपीट होगा।

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ईदगाह कांड का जिम्मेदार सिर्फ कोई एक चेहरा नहीं है, कई लोग हैं और शायद पूरा समाज है। ईदगाह कांड पुरानी कमेटी और एक व्यक्ति की अक्खड़ नीतियों और बंद कमरे की कार्यशैली का नतीजा है। ईदगाह कांड तब हुआ, जब ईदगाह पर मुसीबत आई और ईदगाह की पुरानी कमेटी पीठ दिखाकर भाग गई। ईदगाह कांड नई कमेटी की सत्ता के दम पर कुछ छीन लेना अपना हक समझने की नीति का नतीजा है। ईदगाह कांड मौजूदा अंसारी समाजी कमेटी की विफलता का नतीजा है। ईदगाह कांड क्षेत्रीय नेताओं की श्रेयबाजी की राजनीति का नतीजा है, जिसके चलते ईदगाह आंदोलन कुछ नेताओं की जागीर बन गया।

13 अक्टूबर 2025 को क्या हुआ था…

अंसार समाज के बुजुर्गों ने मोमिन ईदगाह बनाई थी। यह ईदगाह समाज की इज्जत, खुद्दारी और पसमांदा आंदोलन की यादों से जुड़ी थी। जब ईदगाह बनी, तब जो संचालन व्यवस्था बनी, वही आगे बढ़ी। नए लोग आते गए, पुराने जाते गए, व्यवस्था अंसारी समाज के हाथों में रही।

जब 90 के दशक में वक्फ कानून में संशोधन के बाद संस्था वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड हुई, उसके बाद भी स्थानीय स्तर पर ही कमेटी बनती और वक्फ बोर्ड में भेज दी जाती थी। पुरानी कमेटी का कार्यकाल पूरा होने के बाद नई कमेटी बनाकर अप्रूवल के लिए वक्फ बोर्ड भेजी गई। लेकिन इस बीच एक भाजपा नेता ने वक्फ बोर्ड में अपनी पैठ का फायदा उठाते हुए भाजपा कार्यकर्ता राशिद अंसारी की अध्यक्षता वाली कमेटी को ईदगाह की नई कमेटी बनवा लिया। इस कमेटी में अधिकांश सदस्य कम उम्र के भाजपा कार्यकर्ता थे।

नई कमेटी को चार्ज देने के बजाय पुरानी कमेटी ने अंसार समाज सातों की कमेटी को ईदगाह का संचालन और सभी दस्तावेज सौंप दिए। अंसार समाज सातों की कमेटी ने मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी बनाई, जिसके जिम्मे आगे की कार्यवाही सौंपी गई।

मजबूत पॉलिटिकल बैकअप की वजह से भाजपा कार्यकर्ताओं वाली कमेटी को हटाना पूरी मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। इस दौरान कई आंदोलन और प्रदर्शन हुए, जो अंत में विफल रहे।

आखिरकार पुरानी कमेटी ने जिला प्रशासन में गुहार लगाई। चूंकि तकनीकी तौर पर वह सही थी, जिला प्रशासन ने कई बार नोटिस भेजे कि पुरानी कमेटी वक्फ बोर्ड द्वारा अधिकृत नई कमेटी को चार्ज दे, लेकिन चार्ज नहीं दिया गया। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में चार्ज दिलाने की प्रक्रिया हुई। मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी के सदस्यों ने विरोध किया। अंसार समाज के सरदार सहित एक दर्जन से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। फिर ईदगाह का ताला तोड़कर नई कमेटी को चार्ज सौंप दिया गया, जो आज ईदगाह का संचालन देख रही है।

ईदगाह कांड के 5 प्रमुख बिंदु…

1. यह कमेटी नहीं, व्यवस्था परिवर्तन था…

पहली और सबसे बुनियादी बात, जो ईदगाह के मामले को ईदगाह कांड में बदलती है, वह यह है कि यह कमेटी परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन था। पुरानी व्यवस्था यह थी कि 1930 से चली आ रही परंपरा के अनुसार समाज के बीच से कमेटी बनती थी, जिसे वक्फ बोर्ड भेजकर अप्रूव कराया जाता था। नई व्यवस्था यह है कि अब अंजुमन की तर्ज पर जिसकी सरकार, उसकी कमेटी का सिद्धांत चलेगा। जिसकी सरकार होगी, उसके कार्यकर्ता सीधे वक्फ बोर्ड से कमेटी बनाकर लाएंगे। वे भोपाल को जवाबदेह होंगे, समाज की कोई भूमिका अब नहीं रहेगी।

2. पुरानी कमेटी की बेशर्म खामोशी

पुरानी कमेटी की सबसे बड़ी कमी यह रही कि बीते 3–4 साल से समाज के अंदर कुछ लड़के ईदगाह में गबन के आरोप लगा रहे थे। किराये को लेकर सवाल उठा रहे थे। लेकिन पुरानी कमेटी ने कभी इस मामले में संतोषजनक जवाब समाज के सामने आकर नहीं दिया। बेशर्मों की तरह बैठी रही। नतीजा यह हुआ कि पूरे जिले और प्रदेश में बदनामी हुई। समाज के अंदर यह राय बनने लगी कि यहां भ्रष्टाचार हो रहा है। कुछ भाजपा नेताओं ने इसी को हथियार बनाया और इसी कमी की आड़ में अपनी BACK DOOR ENTRY को जायज ठहरा लिया।

3. पुरानी कमेटी का भाग खड़े होना

पुरानी कमेटी का सबसे चौंकाने वाला फैसला यह था कि जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने बड़े नेताओं से सेटिंग करके कमेटी पलटवाई, तब ईदगाह को बचाने और समाज व मीडिया के सामने अपनी बात रखने के बजाय पुरानी कमेटी भाग खड़ी हुई। जहां नई कमेटी के जिम्मेदार सामने आकर बात कर रहे थे, वहीं पुरानी कमेटी और उसके पूरे पदाधिकारी मुंह छिपा रहे थे। ईदगाह के दस्तावेज अंसार समाज सातों की कमेटी को सौंपकर उन्होंने अपना पल्ला झाड़ लिया। पुराने पदाधिकारियों का मुंह छिपाना और नई कमेटी का दावे के साथ सामने रहना एक बड़ा कारण था कि लोग पुरानी कमेटी के बारे में शक में रहे और खुलकर सामने नहीं आए।

4. पूरे विरोध का राजनीतिकरण होना

मोमिन ईदगाह की पुरानी कमेटी ने पूरा दस्तावेज आदि अंसारी समाज की मरकजी पंचायत और अंसार समाज के सरदार को सौंपा। सातों के सरदार और समाज के सरदारों की बैठक में एक ईदगाह एक्शन कमेटी बनाई गई, जिसके जिम्मे था कि ईदगाह की पुरानी व्यवस्था को बचाए रखने की कोशिश करे और समाज को एकजुट करे।

लेकिन इस पूरे आंदोलन का राजनीतिकरण हो गया। समाजी मसला था, समाजी चेहरों को आगे आना था, पुरानी कमेटी को लीड करना था और अपनी बात रखनी थी, जिससे समाज सुनता और समझता। लेकिन कांग्रेस नेताओं को आगे कर दिया गया या उन्होंने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया। दूर से देखने पर यही लगा कि यह कांग्रेस नेताओं का आंदोलन है। डेढ़ पार्षद पूरे आंदोलन पर हावी दिखे, जिसके नतीजे में यह मुस्लिम कांग्रेस का भी आंदोलन नहीं रहा। नतीजा यह हुआ कि समाज ने इसे कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीति मानकर दूरी बना ली।

5. मुस्लिम समाज: हम खामोश क्यों रहे?

अब आते हैं सबसे जरूरी सवाल पर।

पुरानी कमेटी भी इसी समाज से थी। नई कमेटी भी इसी समाज के लोगों से बनी है। विरोध करने वाले भी इसी समाज के लोग हैं। फिर यह विवाद इतना बड़ा कैसे हो गया?

इसका एक जवाब समाज की खामोशी में भी छिपा हो सकता है।

जब किसी कमेटी के कामकाज पर सवाल उठते हैं, तो समाज को उसी समय सवाल पूछने चाहिए। अगर फैसले बंद कमरे में होते हैं, तो पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए। अगर किसी संस्था का हिसाब नहीं मिलता, तो नियमों के अनुसार हिसाब मांगना चाहिए।

लेकिन अक्सर हम ऐसा नहीं करते। हम किसी एक व्यक्ति या गुट के साथ खड़े हो जाते हैं। जब वही व्यक्ति या गुट गलत फैसला करता है, तब भी हम उसका विरोध नहीं कर पाते।

फिर जब मामला बहुत बढ़ जाता है, तो समाज सड़कों पर उतरता है। उस समय तक विवाद इतना बड़ा हो चुका होता है कि उसे सुलझाना मुश्किल हो जाता है।

समाज की जिम्मेदारी केवल किसी नेता के पीछे चलना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी सही और गलत में फर्क करना भी है।

अगर हम अपने नेताओं से सवाल नहीं पूछेंगे, तो हमारी संस्थाओं को बेहतर कौन बनाएगा?

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बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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