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जबलपुर कांग्रेस : नगर अध्यक्ष की नेतृत्व क्षमता पर उठे सवाल दो कार्यकाल, फिर भी नगर कार्यकारिणी नहीं—क्या नेतृत्व विफल हुआ..?

जबलपुर। जबलपुर नगर कांग्रेस में व्याप्त संगठनात्मक ठहराव अब सौरभ शर्मा की नेतृत्व क्षमता पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस संगठन सृजन अभियान के तहत हजारों कार्यकर्ताओं से चर्चा के बाद सौरभ शर्मा को एक बार फिर नगर अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद नगर कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया। यही नहीं, यह स्थिति उनके पिछले कार्यकाल में भी देखने को मिल चुकी है।

यानी लगातार दो कार्यकाल के बावजूद संगठन को मजबूती देने की नगर अध्यक्ष की बुनियादी जिम्मेदारी अधूरी ही बनी हुई है।

दो कार्यकाल, लेकिन टीम शून्य

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी संगठन में अध्यक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी एक मजबूत, सक्रिय और संतुलित टीम खड़ी करना होती है। लेकिन सौरभ शर्मा के नेतृत्व में नगर कांग्रेस दो-दो कार्यकाल में भी कार्यकारिणी विहीन बनी हुई है। इससे यह संदेश जा रहा है कि या तो वे निर्णय लेने में असमर्थ हैं, या फिर संगठन को सामूहिक रूप से चलाने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। या फिर जबलपुर कांग्रेस के बड़े नेता उन्हें काम नहीं करने दे रहे, सबको साधने की कोशिश में कार्यकारिणी नहीं बन रही. वजह जो भी हो तीनों ही परिस्थितियों में सवाल नगर अध्यक्ष से ही होगा.

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नेतृत्व या ‘वन मैन शो’?

नगर कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को देखकर यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि संगठन वन मैन शो’ बनकर रह गया है। संगठन, रणनीति, बयानबाज़ी और संवाद—सब कुछ एक व्यक्ति तक सीमित दिखाई देता है। सवाल यह है कि यदि अध्यक्ष अपने आसपास जिम्मेदार नेतृत्व विकसित नहीं कर पा रहे, तो चुनावी मैदान में कांग्रेस कैसे सामूहिक लड़ाई लड़ेगी?

मीडिया मैनेजमेंट भी नेतृत्व की कमजोरी का संकेत

सौरभ शर्मा की नेतृत्व शैली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि आज नगर कांग्रेस के पास मीडिया प्रभारी और मीडिया सचिव तक नहीं हैं। पार्टी का पक्ष मीडिया तक पहुंचाने के लिए कोई अधिकृत चेहरा मौजूद नहीं है। मुँह से बोलकर टाइप हुआ या Chatgpt से बना चार पंक्तियों का बयान सोशल मीडिया पर डाल देना ही मीडिया मैनेजमेंट मान लिया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति सीधे तौर पर नेतृत्व की विफलता को दर्शाती है, क्योंकि मजबूत नेतृत्व ही प्रभावी संवाद तंत्र खड़ा करता है।

पद खाली, कार्यकर्ता हताश

नगर कांग्रेस में उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव, प्रवक्ता जैसे सभी अहम पद खाली पड़े हैं। इससे बूथ स्तर पर संगठन लगभग निष्क्रिय हो गया है। कई पुराने और समर्पित कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब जिम्मेदारियां तय नहीं होंगी, तो जवाबदेही भी नहीं होगी—और यही आज नगर कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है।

जनता और प्रदेश संगठन से टूटा संपर्क

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक कमजोरी का असर चुनावी नतीजों और घटते जनाधार में साफ दिखाई दे रहा है। जब तक नगर कांग्रेस में जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा नहीं होगा और एक मजबूत, सक्रिय टीम मैदान में नहीं उतरेगी, तब तक जबलपुर में कांग्रेस की वापसी आसान नहीं होगी।

नेतृत्व की कमजोरी का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि कांग्रेस का जनता से रिश्ता कमजोर पड़ता जा रहा है, वहीं नगर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का प्रदेश संगठन से संवाद भी टूटता नजर आ रहा है। जबकि नगर संगठन ही वह अहम कड़ी होता है, जो जनता, कार्यकर्ता और प्रदेश नेतृत्व को जोड़ता है। इस कड़ी के कमजोर होते ही पूरी संगठनात्मक संरचना लड़खड़ा रही है।

नतीजे नेतृत्व पर सवाल बनकर उभरे

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार घटता जनाधार केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं, बल्कि कमजोर नेतृत्व का भी संकेत हैं। जब तक नगर कांग्रेस को निर्णायक, समावेशी और सक्रिय नेतृत्व नहीं मिलेगा, तब तक संगठनात्मक सुधार संभव नहीं है।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या प्रदेश नेतृत्व सौरभ शर्मा की नेतृत्व क्षमता की समीक्षा करेगा?
या फिर जबलपुर कांग्रेस यूं ही बिना टीम, बिना दिशा और बिना प्रभाव के आगे बढ़ती रहेगी।

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