
राजधानी डिवीज़न, बाज़ मीडिया। “आई लव मुहम्मद ﷺ” लिखे पोस्टरों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब न्यायपालिका तक पहुँच चुका है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरेली के दो मुस्लिम युवकों — नदीम खान और बबलू खान — को बड़ी राहत देते हुए आदेश दिया है कि आरोपपत्र दाख़िल होने तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक पुलिस जांच पूरी नहीं करती, तब तक दोनों आरोपियों को गिरफ्तार न किया जाए।
⚖️ 26 सितंबर के विरोध से शुरू हुई कहानी
बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र में 26 सितंबर को मुसलमानों ने “आई लव मुहम्मद” पोस्टर हटाने की पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शन किया था। यह आंदोलन मौलाना तौकीर रज़ा खान की अगुवाई में हुआ।
विरोध के बाद प्रशासन ने दर्जनों मुसलमानों पर “अशांति भड़काने” और “साजिश रचने” जैसे गंभीर आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की। नदीम और बबलू खान का नाम भी उसी सूची में शामिल कर दिया गया।
📊 देशभर में 4500 मुसलमानों पर केस
मानवाधिकार संगठन APCR (Association for Protection of Civil Rights) की एक रिपोर्ट के अनुसार,
“आई लव मुहम्मद” पोस्टरों पर पुलिस की कार्रवाई केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही।
7 अक्टूबर तक देशभर में 4,505 मुसलमानों पर मामले दर्ज किए गए, जिनमें से केवल बरेली में 265 मुसलमान गिरफ्तार किए गए।
📢 न्याय के लिए नई उम्मीद
दोनों मुस्लिम भाइयों ने अपनी गिरफ्तारी से पहले ही अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था। उन्होंने कहा कि वे निर्दोष हैं और केवल अपने पैग़म्बर ﷺ के प्रति मोहब्बत जाहिर कर रहे थे।
अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम समाज में राहत और उम्मीद की लहर है।
🧾 जनहित याचिका में बड़ा आरोप
इसी बीच, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव मोहम्मद यूसुफ अंसारी ने भी एक जनहित याचिका (PIL) दाख़िल की है।
इसमें अधिवक्ता सेहर नक़वी और मोहम्मद आरिफ़ के माध्यम से अदालत से माँग की गई है कि 26 सितंबर की पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जांच की जाए।
याचिका में कहा गया है कि—
“बरेली में पुलिस ने केवल एक धार्मिक नारा या पोस्टर को मुद्दा बनाकर मुसलमानों को निशाना बनाया। निर्दोषों पर केस किए गए, दुकानों को सील किया गया और कुछ मकानों पर बुलडोज़र चलाए गए।”
🚨 मुआवज़ा और बुलडोज़र कार्रवाई पर रोक की मांग
याचिका में यह भी माँग की गई है कि—
- बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी भी बुलडोज़र कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
- जिन निर्दोषों के घर या दुकानें तोड़ी गईं, उन्हें मुआवज़ा दिया जाए।
- जिन दुकानों को सील किया गया है, उनकी सीलिंग हटाई जाए।
अदालत ने सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
💬 मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया
स्थानीय मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह फैसला “सच्चाई की पहली जीत” है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा —
“पैग़म्बर ﷺ से मोहब्बत जताना कोई अपराध नहीं है। अगर यही आवाज़ दबा दी जाएगी, तो इंसाफ़ और लोकतंत्र दोनों खो जाएंगे।”
🕊️ बाज मीडिया का दृष्टिकोण
यह मामला केवल बरेली या दो युवकों का नहीं है — यह सवाल है कि क्या भारत में किसी को अपने नबी से मोहब्बत जताने की आज़ादी है या नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह कदम उम्मीद की पहली किरण है, लेकिन इंसाफ़ की असली मंज़िल अभी बाकी है।



