
दादरी की वह काली रात देश भूल नहीं पाया—जब मोहम्मद अख़लाक ने भीड़ की लातों और डंडों के नीचे अपनी आख़िरी सांसें लीं। दस साल बाद, यूपी सरकार ने उन्हीं आरोपियों पर से केस वापस लेने की मांग कर दी है। “सद्भाव” के नाम पर लिया गया यह फैसला एक बार फिर उसी सवाल को जगा रहा है—क्या इंसाफ़ की कीमत अब भीड़ की हिंसा से कम है?
नई दिल्ली / लखनऊ। जब असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले की आलोचना की, जिसमें 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या किए गए आरोपियों के खिलाफ केस वापस लेने की मांग की गई है, तो उनकी तक़लीफ़ सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं थी — यह एक जनांदोलन जैसा दर्द भरा आह्वान था। ओवैसी ने कहा कि यह कदम सिर्फ न्याय को नज़रअंदाज़ करना नहीं है, बल्कि “उनकी ज़िंदगी में वह गहरी दरार है जो शायद कभी भर न सके।”
दादरी की गलियों में गूंजती घोर यादें
28 सितंबर 2015 की वह रात हमेशा के लिए अखलाक के परिवार की ज़िंदगी बदल गई।
बिसाड़ा गांव (दादरी, यूपी) में, गाँव के लोग इन्हें घर से बाहर घसीट लाए। भीड़ ने स्टिक, ईंटें और चप्पलें उठाईं। अखलाक और उनका बेटा दानिश बेहोश हो गए, घरवालों के हताश प्रयासों के बावजूद। उसी रात, अखलाक की मौत हो गई, जबकि दानिश गंभीर रूप से घायल हुए थे। (Wikipedia)
उनकी हत्या ने पूरे देश को हिला दिया था — “नॉट इन माई नेम” जैसे नारे गूंजने लगे, और सांप्रदायिक हिस्सेदारी, भीड़ हिंसा, गाय-गोमांस विवाद ने एक बार फिर लोगों की संवेदनशीलता को छेड़ दिया। (The New Indian Express)
लॉ सिस्टम की धीमी चाल और न्याय का लंबा इंतज़ार
- FIR और आरोप: हत्या के तुरंत बाद दर्ज़ एफआईआर में आईपीसी की गंभीर धाराओं में आरोप लगाए गए थे — 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 147, 148, 149 (उपद्रव), 458 (घर में अनधिकृत प्रवेश), 504 (बेइज्जती)। (TheQuint)
- चार्जशीट: पुलिस ने दिसंबर 2015 में 15 लोगों के नाम चार्जशीट में दिए, जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता के बेटे का भी नाम था। (www.ndtv.com)
- जमानत: दो साल बाद तक लगभग सभी आरोपियों को जमानत मिल गई थी। (IAMC)
- मुकदमा की धीमी प्रगति: Scroll की रिपोर्ट के अनुसार, तेज़-ट्रैक कोर्ट में कई सुनवाइयाँ हुईं लेकिन चार्जिंग तक पूरी तरह नहीं हुई। (Scroll.in)
- प्रत्यारोप-तर्क: UP सरकार ने हालिया आवेदन में कहा है कि अखलाक परिवार की “बयानबाज़ी बदलती रही,” कोई वैर नहीं था, और “तीर और चाकू नहीं मिले” — सिर्फ छड़, ईंट (sticks, rods, bricks) पकड़े गए थे। (The Indian Express)
परीवार की पीड़ा: सदमा, डर और न्याय का अहसास
ओवैसी ने कहा कि अखलाक का परिवार अभी तक उस रात के सदमे से नहीं उबरा है। उन्होंने कहा:
“उनकी आंखों ने वह दृश्य देखा — अपने पिता को ज़िंदा-जिंदा पीटा जाना, उनकी आवाज़ दबकर छुपा दी गई। उनकी पीड़ा सिर्फ आज की राजनीति का विषय नहीं है, वह हर रोज़ उनकी ज़िंदगी में ताज़ा होती है।”
कुटुंब को न सिर्फ शारीरिक चोटें मिली थीं, बल्कि मानसिक घाव भी गहरे हैं। उनकी बेटी शाइस्ता, बेटा दानिश—उनके बचपन, उनकी ज़िंदगियाँ, सब एक डर और दर्द के साए में बदल गए।
ओवैसी का कटाक्ष और आरोप
ओवैसी ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर तीखी आलोचना की:
- ईमानदारी की कमी: “अगर आप कानून-व्यवस्था की बात करते हो, तो उससे पहले अपने सिस्टम को ईमानदारी से चलाना सीखो,” उन्होंने कहा।
- राजनीतिक प्राथमिकताएँ: उन्होंने आरोप लगाया कि BJP का “असल चेहरा” यही है — वह पब्लिक बयानबाज़ी के बावजूद दोषियों के साथ खड़ी रहेगी।
- न्याय के लिए लड़ाई जारी: ओवैसी ने कहां कि सिर्फ बयान देने से काम नहीं चलेगा, परिवार को न्याय चाहिए — और अगर केस वापस लिया गया तो यह अन्याय को कानूनी वैधता देने जैसा होगा।
सरकारी दलीलें: ‘सामाजिक सद्भाव’ और बढ़ते सवाल
UP सरकार का कहना है कि आरोप वापस लेने का कदम ‘सामाजिक सद्भाव’ की बेहतरी के लिए है। (The Indian Express)
लेकिन यह दलील कई सवाल खड़े करती है:
- क्या “सद्भाव” अन्याय की नींव पर टिक सकता है?
- क्या यह दायित्वपूर्ण राजनीति है या दोषियों को छूट देने की रणनीति?
- आखिर वह पीड़ित परिवार, जिसने हमेशा वित्तीय, भावनात्मक और कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, उसकी आवाज़ को क्यों दबाया जा रहा है?
ओवैसी ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रियाओं से ही पूरा हो सकता है; एकतरफा रियायत और “राजनीतिक समझौता” पीड़ियों पर मरहम नहीं लगाता।
राष्ट्रीय प्रतिध्वनि: देश में मानवाधिकार और भीड़ हिंसा पर सवाल
इस मामले ने सिर्फ दादरी को नहीं झिंझोड़ दिया था — यह पूरे देश में भीड़-हिंसा, धार्मिक मतदान और मानवाधिकारों पर एक बड़ा उद्घोष बन गया था।
Human Rights Watch की रिपोर्ट में भी इस घटना की भयावहता और सिस्टम की कमजोरी पर गहरा प्रकाश डाला गया। (Human Rights Watch)
न्याय की राह: क्या आगे हो सकता है?
- कानूनी लड़ाई अभी जारी है: अखलाक का परिवार और उसके वकील यह कह रहे हैं कि वे कोर्ट में लड़ाई जारी रखेंगे, चाहे केस वापस लेने का आवेदन किया गया हो।
- जन-सुरजी निगरानी: जैसे-जैसे यह मामला बढ़ेगा, मानवाधिकारवादी, मीडिया और सिविल सोसाइटी की नज़रें और ज़ोरदार होंगी।
- राजनीतिक असर: यह सिर्फ एक मुक़द्दर की लड़ाई नहीं है — यह पूरे देश के लिए यह सवाल है कि हिंसा और न्याय के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।



