
अगर 2025 को जबलपुर के मुस्लिम समाज के नज़रिये से सिर्फ़ एक लाइन में समेटा जाए, तो वह यही होगी—
पूरा साल मुसलमानों से परेशान रहा मुसलमान।
2025 जबलपुर मुस्लिम समाज के इतिहास में एक बेचैन, शर्मनाक और चेतावनी देने वाला साल बनकर दर्ज होगा।
साल 2025 जबलपुर के मुस्लिम समाज के लिए किसी एक घटना की वजह से नहीं, बल्कि घटनाओं की एक ऐसी श्रृंखला की वजह से याद रखा जाएगा, जिसने समाज को बाहर से नहीं और अंदर झकझोर दिया।
मस्जिदों पर ताले लगना, 95 साल पुरानी ईदगाह परंपरा का टूटना, जुमे की छुट्टी का खत्म होना—ये घटनाएं प्रशासनिक या सियासी फैसले नहीं थीं, बल्कि वे आईना थीं उस अंदरूनी बिखराव का, जिससे समाज साल भर जूझता रहा।
2025 में जबलपुर मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहा कि बाहर से क्या हुआ, बल्कि यह रहा कि अंदर ऐसा क्यों होने दिया गया।
पढ़िए! साल की आख़िरी ख़बर…
2025 में जबलपुर मुस्लिम समाज की 9 सबसे बड़ी घटनाएं।”
यह साल भर की 9 ऐसी घटना है,
जो जबलपुर के मुस्लिम समाज को अंदर से तोड़ती चली गईं।
1️⃣ अंसार नगर नमाज़गाह सील कांड
मस्जिद पर ताला, समाज पर तमाचा
साल 2025 की सबसे बड़ी, सबसे शर्मनाक और सबसे डरावनी घटना—
अंसार नगर नमाज़गाह अहले सुन्नत का सील होना।

इमामत को लेकर उठा आपसी विवाद इतना बढ़ा कि प्रशासन को मस्जिद पर ताला लगाना पड़ा।
जुमा, असर, मगरिब और ईशा तक की नमाज़ें बंद रहीं।
यह पहला मौका था जब मुस्लिम समाज की आपसी ज़िद
अल्लाह के घर को प्रशासनिक ताले तक ले गई।
समझौते के बाद मस्जिद खुली, नमाज़ शुरू हुई—
लेकिन सवाल हमेशा के लिए रह गया:
क्या किसी भी हाल में मस्जिद पर ताला लगना चाहिए था?
2️⃣ मोमिन ईदगाह, गोहलपुर कांड
95 साल पुरानी परंपरा का अंत
13 अक्टूबर 2025 — जबलपुर मुस्लिम इतिहास का एक निर्णायक दिन।
चार थानों की पुलिस, ताले तोड़ने की कार्रवाई,
18 से ज़्यादा गिरफ्तारियां
और वक्फ़ बोर्ड की नई कमेटी द्वारा
ताक़त के दम पर ‘चार्ज छीनने’ की कार्रवाई।

अंसार समाज की लगभग 95 साल पुरानी ईदगाह प्रबंधन परंपरा खत्म कर दी गई।
यह सिर्फ़ कमेटी बदलने का मामला नहीं था, बल्कि—
“अब जिसकी सत्ता, उसकी ईदगाह”
जैसी खतरनाक परंपरा की शुरुआत।
Read More: भारी पुलिस बल की मौजूदगी में ताला तोड़कर दिलाया गया चार्ज
3️⃣ अंजुमन इस्लामिया – जुमे की छुट्टी खत्म
जो दल नहीं कर पाया, वो एक मुस्लिम लड़के ने कर दिखाया
एक सदी से चली आ रही जबलपुर के मुस्लिम स्कूलों में जुमे की साप्ताहिक छुट्टी
अंजुमन इस्लामिया के 5 स्कूलों समेत दर्जनों मुस्लिम संस्थानों में खत्म कर दी गई।
रविवार को साप्ताहिक छुट्टी लागू कर दी गई।

पूरा मामला
एक मुस्लिम भाजपा कार्यकर्ता के अंजुमन अध्यक्ष से की निजी बदले की साजिश
और मेनस्ट्रीम मीडिया में गढ़े गए साम्प्रदायिक नैरेटिव का नतीजा था।
नतीजा यह हुआ कि
शिक्षा विभाग के दबाव में
मुस्लिम बहुल इलाकों के लगभग सभी स्कूलों में जुमे की साप्ताहिक छुट्टी बंद करवा दी गई।
एक लड़के ने हजारों मुस्लिम परिवारों का जुमा डिस्टर्ब कर दिया।
4️⃣ मड़ई मस्जिद विवाद
अफवाह बनाम हक़ीक़त
सोशल मीडिया पर आंदोलन,
मंदिर–मस्जिद का नैरेटिव
और तनाव का माहौल।
पहली प्रशासनिक जांच में साफ़ हुआ कि
मड़ई मस्जिद पूरी तरह वैध है
और किसी मंदिर की ज़मीन पर नहीं बनी।
हालांकि कुछ घंटों बाद
जांच रिपोर्ट खारिज कर
नई जांच शुरू कर दी गई।
नये साल में उम्मीद और दुआ है की यह मामला अमन और मोहब्बत के साथ समाप्त हो जाएगा।
5️⃣ घुमक्कड़ मुस्लिम जातियों पर “बांग्लादेशी” आरोप
पहचान बचाने की जंग
पीढ़ियों से जबलपुर में रह रही
घुमक्कड़ मुस्लिम जातियों को
रोहिंग्या और बांग्लादेशी बताकर
जिला स्तरीय आंदोलन खड़ा किया गया।

कबीले के लोग कलेक्टर कार्यालय पहुँचे—
उनका सवाल साफ़ था:
हमारे बुज़ुर्गों की कब्रें यहीं हैं,
दस्तावेज़ यहीं के हैं—
फिर हम बाहरी कैसे?
Read More: रोहिंग्या होने के आरोपों से आहत घुमक्कड़ जाति ने मांगा इंसाफ । प्रशासन को सौंपा पीढ़ियों का रिकॉर्ड
6️⃣ शाबान मंसूरी विवाद
एक फेसबुक कमेंट, जेल तक का सफ़र
कांग्रेस के पूर्व पार्षद शाबान मंसूरी
को सोशल मीडिया टिप्पणी के चलते गिरफ्तार किया गया।
कोर्ट परिसर में मारपीट,
राजनीतिक दबाव के आरोप,
बाद में जमानत।
आरोप यह भी लगे की शाबान पर FIR के लिए छेत्र के ही एक मुस्लिम भाजपा नेता ने पहल की थी
लेकिन सवाल अब भी कायम है—
कोर्ट परिसर में मारपीट करने वालों पर कभी कार्यवाही होगी। क्या कानून सबके लिए बराबर है?
Read More: शाबान मंसूरी को मिली जमानत
7️⃣ घनी मुस्लिम आबादी में पहली बड़ी चोरी
50 साल बाद टूटी ‘सुरक्षा की दीवार’
हनुमानताल के सुलेमानी–बरियातले इलाके में
7 लाख की चोरी।

यह इलाका दशकों से चोरी-डकैती से अछूता रहा था।
इस घटना ने यह भ्रम तोड़ दिया कि—
घनी आबादी और सामाजिक एकता सुरक्षा की गारंटी है।
Read More : मौलाना आज़ाद वार्ड में पेशेवर चोरों की एंट्री
8️⃣ कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष सूची से मुसलमान गायब
वोट चाहिए, नेतृत्व नहीं
जबलपुर में कांग्रेस ने
25 ब्लॉक अध्यक्ष घोषित किए—
एक भी मुस्लिम नहीं।
3 लाख की आबादी,
चुनावी जीत में निर्णायक भूमिका—
लेकिन संगठन में शून्य प्रतिनिधित्व।
यह सिर्फ़ अनदेखी नहीं थी,
यह खुला सियासी अपमान था।
Read More : जबलपुर में सिहोरा से सदर तक 25 ब्लॉक अध्यक्ष, एक भी मुसलमान नहीं !
साल का निष्कर्ष : मुसलमान बनाम मुसलमान
2025 की सबसे बड़ी सच्चाई यही रही—
जबलपुर मुस्लिम समाज को चोट बाहर से नहीं, अंदर से लगी।
मस्जिदें ताले तक पहुँचीं,
वक्फ़ हाथों से निकलती दिखी,
और सियासत (Congress) ने समाज को इस्तेमाल कर छोड़ दिया।
✍️ अंतिम सवाल
अगर अब भी सबक नहीं लिया गया,
तो आने वाला साल और ज़्यादा भारी होगा।
मस्जिदें ताले के लिए नहीं, सजदों के लिए होती हैं।
वक्फ़ सत्ता के लिए नहीं, उम्मत की अमानत होती है।
और समाज—आपसी लड़ाई के लिए नहीं, इत्तेहाद के लिए होता है।



