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संभल मस्जिद गोलीकांड: 5 मुसलमानों की मौत के मामले में अदालत ने ’12 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज’ करने के आदेश दिए – बड़े अधिकारी भी नामजद!

संभल (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के पास हुई हिंसा और कथित पुलिस फायरिंग के मामले में बड़ा न्यायिक घटनाक्रम सामने आया है। संभल की एक अदालत ने इस मामले में सीनियर अधिकारियों समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कई अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

यह आदेश चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर ने खग्गू सराय अंजुमन क्षेत्र के निवासी यामीन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया। अदालत ने 9 जनवरी को सुनवाई के बाद सभी नामजद और अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने का निर्देश दिया।

सीनियर पुलिस अधिकारी भी घेरे में

जिन पुलिस अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, उनमें अनुज चौधरी शामिल हैं, जो नवंबर 2024 में संभल के सर्कल ऑफिसर (सीओ) थे और वर्तमान में फिरोजाबाद में एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (ग्रामीण) के पद पर तैनात हैं। इसके अलावा अनुज तोमर, जो उस समय संभल कोतवाली चंदौसी के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) थे, उनका नाम भी आदेश में शामिल है। अदालत ने इनके साथ अन्य अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी केस दर्ज करने को कहा है।

अनुज चौधरी इससे पहले भी सुर्खियों में रह चुके हैं। वे होली सेलिब्रेशन के दौरान मुस्लिम विरोधी टिप्पणी को लेकर विवादों में आए थे, जिसके बाद संभल हिंसा के संदर्भ में उनके खिलाफ आरोप और तेज़ हो गए।

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News Source : The Hindu : Sambhal court orders FIR against former CO Anuj Chaudhary

यामीन का आरोप: बेटे को पुलिस ने मारी गोली

याचिकाकर्ता यामीन ने अदालत को बताया कि 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद इलाके में पुलिस फायरिंग के बाद फैली अशांति के दौरान उनके बेटे आलम को गोली लगी थी। याचिका के अनुसार, आलम रोज़गार के लिए रस्क और बिस्किट बेचने घर से निकला था, लेकिन हिंसा के बीच फंस गया और उसे गोली मार दी गई।

यामीन ने यह भी आरोप लगाया कि भय के माहौल के कारण उनके बेटे ने छिपकर इलाज कराया। बाद में परिवार ने हिम्मत जुटाकर कथित दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की।

हिंसा में पांच मुसलमानों की मौत का दावा

चश्मदीदों और पीड़ित परिवारों के अनुसार, इस हिंसा में कम से कम पांच मुसलमानों की मौत हुई थी। आरोप है कि इनमें से अधिकांश मौतें पुलिस फायरिंग के कारण हुईं। हालांकि पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया था और हिंसा के लिए भीड़ को ज़िम्मेदार ठहराया था।

मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की थी हिंसा

संभल में यह हिंसा उस समय भड़की थी, जब शाही जामा मस्जिद का एक सर्वे अदालत के आदेश पर किया जा रहा था। एक सिविल सूट में दावा किया गया था कि मस्जिद मूल रूप से एक मंदिर थी। इस दावे के आधार पर सर्वे दो चरणों में—19 नवंबर और 24 नवंबर 2024—को कराया गया था। सर्वे के दौरान बड़ी संख्या में लोग एकत्र हो गए और विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गया, जो बाद में हिंसा में बदल गया।

12 केस, 2,200 से अधिक लोग नामजद

हिंसा के बाद पुलिस ने संभल कोतवाली और नखासा थानों में कुल 12 मामले दर्ज किए थे। इनमें समाजवादी पार्टी के विधायक जियाउर रहमान बर्क और सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल सहित कई लोगों के नाम शामिल किए गए थे। पुलिस के अनुसार, इन मामलों में 2,200 से अधिक लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए गए हैं।

अब तक पुलिस ने शाही जामा मस्जिद के अध्यक्ष और वकील ज़फर अली समेत 134 आरोपियों को जेल भेजा है। गिरफ्तार किए गए लोगों में तीन महिलाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा फरार गैंगस्टर शारिक साठा के तीन कथित सहयोगियों—मुल्ला अफरोज, वारिस और गुलाम—को भी इस मामले में जेल भेजा गया है।

ज़फर अली को मिल चुकी है जमानत

ज़फर अली को अगस्त 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद मुरादाबाद जेल से रिहा कर दिया गया था। वे मार्च 2024 से हिरासत में थे और करीब 131 दिन जेल में बिता चुके थे।

APCR ने फैसले का किया स्वागत

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने हिंसा के दौरान कथित पुलिस फायरिंग के लिए जवाबदेही तय कराने की कानूनी लड़ाई में पीड़ित परिवारों की मदद की है। APCR के नदीम खान ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि संगठन पुलिस हिंसा के मामलों में न्याय दिलाने और अन्य पीड़ित परिवारों को सामने आने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस आदेश को संभल हिंसा मामले में एक अहम मोड़ माना जा रहा है, जिससे पहली बार पुलिस की भूमिका पर सीधे आपराधिक जांच का रास्ता खुला है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और पीड़ित परिवारों को न्याय मिल पाता है या नहीं।

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