
BAZ अंतर्राष्ट्रीय ब्यूरो। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्ज़रलैंड के दावोस में “बोर्ड ऑफ़ पीस” का पहला आधिकारिक चार्टर जारी किया है—जिसे दुनिया भर के संघर्षों को सुलझाने वाला एक नया मंच बताया जा रहा है।
लेकिन इस घोषणा के बाद खासकर मुस्लिम समुदाय में यह चर्चा तेज़ हो गई है कि क्या यह पहल असल में न्याय और इंसाफ़ पर आधारित है, या फिर कुछ और राजनीति?
बोर्ड ऑफ़ पीस: क्या है पूरा मामला?
ट्रम्प के अनुसार यह “बोर्ड ऑफ़ पीस” एक वैश्विक शांति संगठन है, जिसके सदस्य देशों और नेताओं को आमंत्रित किया गया है कि वे मिलकर दुनिया के संघर्षों को खत्म करने में भूमिका निभाएँ।
ट्रम्प ने इसे गाज़ा के पुनर्निर्माण से जोड़ा है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि चार्टर में गाज़ा का ज़िक्र तक नहीं किया गया—वह भी ऐसे समय जब गाज़ा में वर्षों से जारी हिंसा और तबाही की वजह से हज़ारों लोग विस्थापित हैं।
ट्रम्प ने दावोस मंच से कहा—
“एक बार बोर्ड पूरी तरह से बन जाएगा, तो हम लगभग कुछ भी कर सकते हैं जो हम करना चाहते हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य संस्थाओं के साथ काम करेगा।
लेकिन विशेषज्ञों और मुस्लिम समुदाय के लिए यह सवाल अहम है कि—
क्या यह बोर्ड वास्तव में संयुक्त राष्ट्र के काम को सपोर्ट करेगा, या उसका विकल्प बनेगा?
बोर्ड की संरचना — कौन-कौन शामिल है?
बोर्ड के नेतृत्व में ट्रम्प खुद अध्यक्ष होंगे, और शीर्ष पर एक “संस्थापक कार्यकारी परिषद” होगी जिसमें शामिल हैं:
- मार्को रुबियो — अमेरिकी विदेश मंत्री
- टोनी ब्लेयर — ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री
- जेरेड कुशनर — ट्रंप के दामाद
- स्टीव विटकॉफ — अमेरिकी विशेष दूत
- रॉबर्ट गेब्रियल — उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
- अजय बंगा — विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष
- मार्क रोवन — Apollo Global Management के CEO
इन नामों को देखकर बहुत से विश्लेषक कहते हैं कि यह बोर्ड राजनीतिक और वित्तीय नेतृत्व वाली संस्था के तौर पर उभर रहा है, जिसमें मानवाधिकारों और पीड़ितों के हिस्से की आवाज़ कमजोर दिखती है।
कौन-कौन देश जुड़े?
रिपोर्टों के अनुसार लगभग 50–60 देशों को बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है, जिनमें से करीब 25 देशों ने शामिल होने की सहमति दी है।
इनमें शामिल हैं:
- पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन, UAE, इंडोनेशिया, तुर्की, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मोरक्को
- अर्जेंटीना, हंगरी, आर्मेनिया, बहरीन, कजाकिस्तान, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, वियतनाम, बेलारूस आदि
लेकिन कई बड़ी शक्तियों की चुप्पी भी सुनी जा रही है—जैसे:
- भारत
- चीन
- जापान
- कई यूरोपीय देश
ब्रिटेन और कुछ यूरोपीय देशों ने साइन करने से मना कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कई देशों को यह पहल अमेरिकी प्रोजेक्ट के रूप में लग रही है।
$1 अरब की सदस्यता—क्या यह न्याय है?
ट्रम्प ने कहा कि इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए $1 बिलियन का योगदान देना होगा।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ये योगदान स्वैच्छिक होंगे, लेकिन उम्मीद यह जताई जा रही है कि सदस्य देश गाज़ा के पुनर्निर्माण में भी योगदान करेंगे।
यह वही हिस्सा है जहाँ मुस्लिम और अन्य आलोचक यह कहते हैं कि—
“शांति सिर्फ़ पैसों से नहीं आती, जब तक न्याय और बराबरी नहीं होगी।”
गाज़ा के लोग जिन परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं—
- घरों का बर्बाद होना
- रोज़गार का ख़त्म होना
- बच्चों की पढ़ाई रोक जाना
- विस्थापन और हिंसा का भय
ऐसे में सिर्फ़ पुनर्निर्माण की घोषणा उनके वास्तविक दर्द पर पर्याप्त जवाब नहीं देता।
संयुक्त राष्ट्र के साथ या उसके बिना?
ट्रम्प ने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र सहित अन्य के साथ काम करेगा, पर दुनिया भर के विशेषज्ञ और विश्लेषक पूछते हैं कि:
क्या यह बोर्ड वाक़ई संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सपोर्ट करेगा, या उसे खत्म करने की कोशिश करेगा?
बहुत से लोगों को डर है कि अगर यह बोर्ड स्वतंत्र रूप से वैधानिक अधिकार और न्याय की रक्षा करने में असफल रहा, तो वह सिर्फ़ एक राजनीतिक मंच बनकर रह जाएगा, न कि एक खिलाड़ी जो सच में दुनिया में शांति और न्याय स्थापित करे।
भारतीय मुस्लिम समुदाय की सोच
भारतीय मुस्लिम समुदाय में इस पहल को लेकर कई तरह की भावनाएँ हैं:
✔️ एक सकारात्मक पहल
कुछ लोग मानते हैं कि
अगर इस बोर्ड में गाज़ा जैसे मुस्लिम क्षेत्रों की आवाज़ को सम्मान और हिस्सेदारी मिले, तो यह शांति की ओर पहला कदम हो सकता है।
❌ एक चिंताजनक मंच
दूसरे लोग कहते हैं कि
जब गाज़ा का नाम चार्टर में तक़ शामिल नहीं, तो यह योजना सिर्फ दिखावा है—जिसे राजनीतिक लाभ के लिए पेश किया गया है।
बहुतों का मानना है कि न्याय और इंसाफ़ को प्राथमिकता नहीं दी जा रही, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक हितों को पहले रखा जा रहा है।
नतीजा — शांति तभी सही, जब न्याय हो
ट्रम्प का “बोर्ड ऑफ़ पीस” एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच बनकर उभर रहा है, लेकिन मुस्लिम दृष्टिकोण में शांति तभी संभव है जब:
✔️ गाज़ा जैसे संकटग्रस्त इलाक़ों की आवाज़ को सच्ची भागीदारी मिले
✔️ पुनर्निर्माण से पहले न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित हो
✔️ प्रशासन और सदस्यों में बराबरी और निष्पक्षता हो
वरना “शांति” सिर्फ़ एक नाम रह जाएगी—जिसके पीछे राजनीति और शक्ति उपयोग का खेल छुपा होगा।



