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BAZ Media Analysis : “दोनों पक्षों” की आड़ में कौन बच निकला? क्या ‘सिहोरा’ को राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया जा रहा है?

सिहोरा। Sihora में हिंसा की उस रात को कई दिन बीत चुके हैं। बाजार खुल गए हैं। सड़कों पर फिर वही चहल-पहल है। प्रशासन ने कह दिया है—हालात पूरी तरह सामान्य हैं। लेकिन जानकार कहते हैं सामान्यता तभी स्थायी होती है जब— घटना की निष्पक्ष जांच होगी, जवाबदेही तय होगी, और भविष्य के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे.

सिहोरा की गलियों में एक धीमी, मगर लगातार चलती बहस है। वह बहस पूछती है—उस रात क्या हुआ था? किसने किया? और सबसे बढ़कर, जवाबदेही किसकी तय होगी?

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क्या सामान्यता सिर्फ बाजार खुल जाने से लौट आती है? क्या शांति का अर्थ सिर्फ यह है कि पत्थर अब नहीं चल रहे? गलियों में भीड़ तांडव नही कर रही?

पुलिस की सक्रियता, गश्त, गिरफ्तारियां—इन सबने तत्काल स्थिति को नियंत्रित किया। यह जरूरी भी था।

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सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो हर ऐसी घटना के बाद उठता है—जिन लोगों ने पत्थरबाजी की शुरुआत की, वे कहाँ हैं? वे चेहरे, जो पत्थरबाजी की आड़ में सिहोरा की गलियों में आतंक फैला रहे थे, भीड़ में कैसे खो गए? क्या वे पहचान से बाहर हैं, या पहचानने की इच्छा अधूरी है?


नमाजी या बलवाई… !!

घटना के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई दोनों पक्षों की शिकायतों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की गई है।

लेकिन समाज के भीतर एक बेचैनी है। कहा जा रहा है कि कार्रवाई में संतुलन का अभाव था।

सबसे अधिक चर्चा उस रात मस्जिद से हुई गिरफ्तारियों की है। यह प्रश्न बार-बार उठता है—मस्जिद से जो लोग गिरफ्तार किए गए, क्या वे बाहर बलवा कर अंदर आकर छिपे लोग थे? या वे तरावीह की नमाज पढ़ने आए लोग थे, जो उपद्रव शुरु होने के बाद बाहर नहीं निकल सके और उपद्रव शांत होने पर उपद्रवी बताकर गिरफ्तार कर लिये गये?

स्थानीय लोगों को कहना है की घटना की रात मस्जिद से करीब तीन दर्जन लोग—जिनमें बुजुर्ग, उम्रदराज और छात्र बताए जाते हैं—गिरफ्तार किए गए। जो बलवाई नहीं बलवे में फंसे लोग थे, जो अगली सफो में तरावीह की नमाज पढ़ रहे थे और बाहर नहीं निकल पाए।

एक पक्ष कहता है कि मस्जिद के बाहर खड़े होकर पत्थर फेंकने वाले लड़के भाग गए, और पुलिस ने अपनी नकामी छिपाने के लिये अंदर नमाज पढ़ रहे लोगों को पकड़ लिया।

यह आरोप है। सच्चाई जांच पूरी होने बाद सामने आएगा।

पुलिस का अपना पक्ष है। लेकिन असली सवाल आरोप और सफाई से बड़ा है।

वह यह है—क्या सिहोरा में कार्रवाई न्याय के संतुलन पर खड़ी थी?

विशेषज्ञ कहते हैं कि दंगों में त्वरित कार्रवाई आवश्यक है। पर उससे भी अधिक आवश्यक है पारदर्शिता। यदि समुदायों को यह भरोसा न हो कि जांच निष्पक्ष है, तो शांति केवल सतह पर रहेगी। भीतर अविश्वास जमा होता जाएगा।

जवाबदेही तय करना क्यों जरूरी है?

सिहोरा की घटना की स्थानीय प्रशासनिक और सामाजिक जवाबदेही किस पर तय होगी?

क्या यह दो तरफ के आवारा लड़कों की झड़प थी, जो अचानक सामुदायिक रंग ले बैठी?
या इसके पीछे संगठित उकसावे और असामाजिक तत्वों की भूमिका थी?

यदि पत्थरबाजी केवल उन्माद नहीं, बल्कि सुनियोजित थी, तो उसकी योजना किसने बनाई?

यदि पत्थरबाजी की आड़ में कुछ तत्वों ने पूरे सिहोरा में आतंक का माहौल रचा, तो उनकी पहचान और गिरफ्तारी अनिवार्य है।

अन्यथा एक खतरनाक परंपरा जन्म लेती है—हर घटना के बाद निर्दोषों की गिरफ्तारी और असली दोषियों का बच निकलना। यह परंपरा केवल कानून को नहीं, समाज को भी कमजोर करती है।


पुलिस चौकी और नाइट विजन कैमरों की मांग

पूरे घटनाक्रम में दो बातें उभर कर आईं हैं।

पहली—हर सिहोरावासी अमन और मोहब्बत के साथ खड़ा है।
दूसरी—ऐसी घटनाएं यह चेतावनी भी देती हैं कि साम्प्रदायिक तत्व सिहोरा को अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के अवसर की तरह देखते हैं, या देख सकते हैं।

ऐसे में यह संदेश जाना जरूरी है कि स्थानीय थाना और स्थानीय प्रशासन भले ही आंख बंद कर ले.. लेकिन जिला प्रशासन और जिला पुलिस मुख्यालय सबको देख रहा है।

  • मांग उठी है कि आजाद चौक में स्थायी पुलिस चौकी बनाई जाए।
  • आजाद चौक और आसपास हाईटेक नाइट विजन कैमरे लगाए जाएं, जिनकी मॉनिटरिंग सीधे जिला मुख्यालय और पुलिस कंट्रोल रूम से हो।

यह मांग केवल निगरानी की नहीं है, यह विश्वास की मांग है।


शांति की राह संवाद से

विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल पुलिस बल की तैनाती से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं रुकती।

जरूरत है—
सामुदायिक संवाद की,
धार्मिक आयोजनों के समय स्पष्ट प्रोटोकॉल की,
सोशल मीडिया मॉनिटरिंग की,
और अफवाह नियंत्रण की ठोस व्यवस्था की।

यदि इन सवालों पर गंभीर मंथन नहीं हुआ, तो सिहोरा भले आज शांत दिखे, भीतर की चिंगारियां बुझी नहीं होंगी। असमाजिक तत्व कल फिर किसी छोटे विवाद को बड़ा करने की साजिश करेंगे.

सामाजिक विश्वास की बहाली ही स्थायी शांति की कुंजी है।


सिहोरा की पहचान आपसी सद्भाव

सिहोरा की पहचान हमेशा आपसी सद्भाव और मेलजोल की रही है।

ऐसे में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व को साझा मंच पर आकर संवाद स्थापित करना होगा।

आज हालात सामान्य हैं—यह कहा जा रहा है।
लेकिन यह सामान्यता तभी स्थायी होगी जब—
घटना की निष्पक्ष जांच होगी,
जवाबदेही तय होगी,
और भविष्य के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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