
रिपोर्ट : अरशद कादरी, बाज मीडिया जबलपुर। रमज़ान के मुक़द्दस महीने में दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ग़म का दिन बन गया, जब ईरान के रहबर अयातुल्ला सैय्यद अली खामेनेई की मज़लूमाना शहादत की खबर सामने आई। इस खबर ने पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को सदमे में डाल दिया।
इसी सिलसिले में सोमवार 9 मार्च को जबलपुर में शिया और सुन्नी समाज के लोगों ने मिलकर एक एहतिजाजी मार्च निकाला और शहीद रहबर को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। मार्च में बड़ी तादाद में बुजुर्ग, नौजवान, औरतें और बच्चे शामिल हुए। लोगों के हाथों में बैनर और तख्तियां थीं और हर शख्स की आंखों में ग़म और दिलों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

उम्मत के रहनुमा और मज़लूमों की आवाज़
मार्च में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि आयतुल्लाह खामेनेई सिर्फ एक मुल्क के नेता नहीं थे, वो सिर्फ शिया मुस्लिम समाज के नहीं बल्कि पूरी उम्मत ए मुस्लिमा के रहनुमा थे, इंसानियत में यकीन रखने वाले हर इंसान की आवाज थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस बात के लिए वक्फ कर दी कि दुनिया में जहां कहीं भी ज़ुल्म हो, उसके खिलाफ आवाज़ बुलंद की जाए।

वक्ताओं के कहा उनकी शख्सियत एक ऐसे आलिम और रहबर की थी जिसने मुसलमानों को इज़्ज़त, सब्र और मुजाहिदाना हिम्मत के साथ जीने का पैगाम दिया। यही वजह है कि आज उनकी शहादत की खबर ने करोड़ो दिलों को ग़मगीन कर दिया है।
फिलिस्तीन के मज़लूमों के सबसे मज़बूत हिमायती
वक्ताओं ने कहा कि शहीद आयतुल्लाह खामेनेई की पहचान दुनिया में सबसे ज्यादा Palestine के मज़लूमों की हिमायत करने वाले रहबर के रूप में रही।

जब फिलिस्तीन के लोग सालों से ज़ुल्म और कब्ज़े का सामना कर रहे हैं, उस वक्त आयतुल्लाह खामेनेई ने बार-बार दुनिया को याद दिलाया कि यह सिर्फ एक सियासी मसला नहीं बल्कि इंसानियत का मसला है। उन्होंने हमेशा कहा कि फिलिस्तीन के लोगों के साथ इंसाफ होना चाहिए और उनकी जमीन और हक उन्हें वापस मिलना चाहिए।
अमेरिका और इज़रायल की नीतियों पर सख़्त रुख
प्रदर्शन में मौजूद लोगों ने कहा कि मध्य पूर्व में जो हालात बने हुए हैं, उसके पीछे United States और Israel की साम्राज्यवादी सोच वजह हैं। अफ्गानिस्तान, ईराक, लिबिया, लेबनान, फलस्तीन में 45 लाख से ज्यादा इंसानों का कत्ल करने और हस्ते खेलते मुल्कों को कब्रस्तान बनाने के बाद अब इन ताकतों की नजर ईरान पर है. लेकिन कत्ल और खून का यह काफिला ईरान के आगे घुटने टेकेगा।
पश्चिमी मीडिया के प्रोपेगैंडा पर सवाल
इस दौरान वक्ताओं ने पश्चिमी मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पश्चिमी मीडिया आयतुल्लाह खामेनेई की शख्सियत को गलत तरीके से पेश करता रहा, जबकि उनके विचारों और संघर्ष के असली पहलुओं को दुनिया के सामने नहीं आने दिया गया।
वक्ताओं के मुताबिक यह एक तरह का मीडिया प्रोपेगैंडा है, जिसके जरिए उन आवाजों को कमजोर करने की कोशिश की जाती है जो दुनिया में ताकतवर देशों की नीतियों के खिलाफ खड़ी होती हैं।

भारत के प्रति दोस्ताना नजरिया
प्रदर्शन में मौजूद लोगों ने कहा कि आयतुल्लाह खामेनेई भारत के प्रति भी सकारात्मक नजरिया रखने वाले नेताओं में शामिल थे। उनकी रहनुमाई में भारत और ईरान के रिश्तों में कई अहम पहल देखने को मिलीं।
वक्ताओं के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा पाकिस्तान के खिलाफ उन्होंने भारत के साथ सहयोग और दोस्ती का रुख दिखाया. जिसे हर भारतीय सम्मान की नजर से देखते हैं।
वक्ताओं के अनुसार कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में ईरान का रुख भारत के लिए सकारात्मक रहा।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट पाकिस्तान को देने के बजाय भारत को दिया गया, जो भारत-ईरान दोस्ती का मजबूत प्रतीक माना जाता है। इससे भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच मिली, जो दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करने वाला कदम था।
गलगला मस्जिद में एहतिजाजी जलसा
विरोध मार्च से पहले शहर की गलगला मस्जिद में एक एहतिजाजी जलसे का आयोजन किया गया। मस्जिद के ज़ाकिर अली परिसर में नमाज़-ए-मगरिब के बाद इफ्तार और आम जलसा हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
इस मौके पर मुज़फ्फरपुर से तशरीफ लाए मौलाना सैयद उरूस साहब ने अपने खिताब में आयतुल्लाह सैय्यद अली खामेनेई की जिंदगी, उनके इल्मी मुकाम और उम्मत के लिए उनकी खिदमात पर तफसील से रोशनी डाली।
शिया-सुन्नी एकता की मिसाल
जलसे के बाद गलगला क्षेत्र से विरोध मार्च शुरू हुआ, जो शहर के अलग-अलग रास्तों से गुजरते हुए आगे बढ़ा। मार्च की सबसे खास बात यह रही कि इसमें शिया और सुन्नी दोनों समाज के लोग बड़ी तादाद में एक साथ मौजूद थे।
आयोजकों ने कहा कि यह एकता इस बात का पैगाम देती है कि जब मज़लूमों पर ज़ुल्म होता है तो पूरी उम्मत एक साथ खड़ी होती है।
राष्ट्रपति के नाम सौंपा गया ज्ञापन
मार्च के आखिर में भारत के राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें इस घटना पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंसाफ की मांग की गई।
इस मौके पर अफसर हुसैन फीजू, बाबा जैदी, सुजाअत रिजवी सहित बड़ी संख्या में सामाजिक और धार्मिक प्रतिनिधि और आम नागरिक मौजूद रहे।
आयोजकों ने कहा कि शहीद आयतुल्लाह खामेनेई की शहादत सिर्फ एक रहबर की शहादत नहीं है, बल्कि यह उस आवाज़ की शहादत है जो दुनिया में इंसाफ, आज़ादी और मज़लूमों के हक की बात करती रही।



