
BAZ News Network : असम के कामरूप ज़िले के अज़ारा इलाके में शनिवार का दिन सैकड़ों गरीब परिवारों के लिए बेहद दर्दनाक साबित हुआ। सुबह जब बुलडोज़र और पुलिस की टीमें इलाके में पहुँचीं, तो देखते ही देखते सैकड़ों घर मिट्टी और मलबे में बदल गए। इन घरों में रहने वाले ज़्यादातर लोग मुस्लिम परिवार थे, जिनके सामने ही उनका सालों का बसाया हुआ आशियाना टूट गया।

सैकड़ों परिवार अचानक बेघर
ज़िला प्रशासन ने इस कार्रवाई में लगभग 737 बीघा (करीब 245 एकड़) ज़मीन को खाली कराया। अधिकारियों के मुताबिक करीब 500 घरों को तोड़ा गया, क्योंकि यह इलाका “ट्राइबल बेल्ट” यानी आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित ज़मीन माना जाता है।
प्रशासन का कहना है कि इस जमीन पर कथित तौर पर अवैध कब्ज़ा किया गया था। इसी वजह से पहले नोटिस जारी किया गया और उसके बाद बुलडोज़र की कार्रवाई की गई।
लेकिन जिन लोगों के घर टूटे, उनके लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि जिंदगी का बड़ा सदमा बन गया।
बाढ़ से उजड़े, अब यहाँ से भी हटाए गए
बस्ती के कई निवासियों का कहना है कि वे लगभग 20 साल से इस इलाके में रह रहे थे। इनमें से अधिकतर बंगाली बोलने वाले मुस्लिम परिवार हैं, जो पहले ही ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ और कटाव के कारण अपने पुराने घर खो चुके थे।
उनका कहना है कि मजबूरी में वे यहाँ आकर बसे थे और धीरे-धीरे बांस और फूस से छोटे-छोटे घर बनाकर जिंदगी फिर से शुरू की थी।
कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि इतने सालों में उन्हें सरकार से कुछ मदद भी मिली थी। इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि शायद उन्हें यहाँ रहने दिया जाएगा या कम से कम उनके लिए कोई दूसरा इंतज़ाम किया जाएगा।
टूटते घरों को देखते रहे बच्चे
सोशल मीडिया पर सामने आए कई वीडियो में दिल को झकझोर देने वाले दृश्य दिखाई दे रहे हैं। बुलडोज़र जब कच्चे घरों को गिरा रहे थे, तब कई महिलाएँ और बच्चे पास खड़े होकर रोते हुए अपने घरों को टूटते देख रहे थे।
कई परिवारों का सामान मलबे में दब गया। लोगों के पास अब न रहने की जगह है और न ही यह साफ है कि वे आगे कहाँ जाएंगे।
सरकार का ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’
सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई राज्य में चल रहे बड़े “अतिक्रमण हटाओ अभियान” का हिस्सा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान का मकसद कथित तौर पर आदिवासी जमीन, जंगलों और वन्यजीव क्षेत्रों को अवैध कब्ज़ों से बचाना बताया जा रहा है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, 2024 से अब तक राज्य भर में ऐसे अभियानों में हजारों ढाँचों को हटाया जा चुका है।
आलोचना और चिंता भी बढ़ी
इस कार्रवाई को लेकर कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाइयों का सबसे ज़्यादा असर उन गरीब और कमजोर परिवारों पर पड़ रहा है जो पहले ही बाढ़ और गरीबी की वजह से परेशान हैं।
कुछ आलोचकों ने इसे “बुलडोज़र की राजनीति” भी कहा है और सवाल उठाया है कि जिन परिवारों के घर तोड़े गए, उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की गई है।
राजनीतिक बयान भी चर्चा में
हाल के महीनों में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कई बार बेदखली अभियानों को लेकर तीखे बयान दिए हैं। उन्होंने कथित “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों” के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है।
रविवार को कामरूप के खानापारा में एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार दोबारा सत्ता में आती है, तो वह “अवैध कब्ज़े वाली हर ज़मीन” को वापस लेने का अभियान जारी रखेंगे।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस तरह की बयानबाज़ी से समाज में तनाव बढ़ सकता है और कमजोर समुदायों के खिलाफ माहौल और मुश्किल हो सकता है।
सवाल अब भी बाकी
अज़ारा की इस बस्ती में अब सिर्फ टूटी दीवारें और मलबा बचा है। जिन लोगों ने यहाँ सालों मेहनत करके घर बनाए थे, वे अब खुले आसमान के नीचे खड़े हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन परिवारों का अगला ठिकाना कहाँ होगा — और क्या उन्हें फिर से नई ज़िंदगी शुरू करने का कोई मौका मिलेगा।



