
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में विचाराधीन हाजी अब्दुल रज्जाक से जुड़े मामले में गुरुवार को अहम घटनाक्रम सामने आया, जिसने पूरे प्रकरण को नई दिशा दे दी है। लंबी और विस्तृत सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने अदालत के समक्ष यह दलील रखी कि यह याचिका वास्तव में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) प्रकृति की है। इस तर्क ने मामले की कानूनी स्थिति को पूरी तरह बदल दिया।
इस पर राज्य की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण से जुड़े मामलों की सुनवाई सामान्यतः मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा की जाती है। इस महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की युगलपीठ ने मामले को मुख्य न्यायाधीश की बेंच को संदर्भित कर दिया।
प्राथमिकता से सुनवाई की सिफारिश
डिवीजन बेंच ने मुख्य न्यायाधीश से यह भी अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जाए। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि अब तक विभिन्न पक्षों द्वारा अलग-अलग कारणों से बार-बार स्थगन (adjournment) लिया जाता रहा है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हो रही है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश की बेंच के समक्ष निर्धारित की गई है।
सीलबंद लिफाफे में दस्तावेज लौटाने का आदेश
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से संबंधित सभी दस्तावेजों को सीलबंद लिफाफे में वापस भेजने का भी निर्देश दिया है, जिससे मामले की संवेदनशीलता और गोपनीयता बनी रहे।
पुलिस अधिकारियों से गहन पूछताछ
इससे पहले, हाईकोर्ट के निर्देश पर सीएसपी ओमती सोनू कुर्मी, टीआई ओमती राजपाल सिंह बघेल सहित अन्य पुलिस अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए। कोर्ट ने अधिकारियों से हाजी अब्दुल रज्जाक के खिलाफ दर्ज विभिन्न मामलों को लेकर विस्तृत पूछताछ की और जांच की स्थिति पर स्पष्टीकरण मांगा।
याचिकाकर्ता की गंभीर आरोप
हाजी अब्दुल रज्जाक की ओर से यह भी दलील दी गई कि उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों में अब तक अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की गई है। आरोप लगाया गया कि जैसे ही एक मामले में उन्हें जमानत मिलती है, उसी समय किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी दिखाकर उन्हें पुनः हिरासत में ले लिया जाता है। याचिकाकर्ता ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के साथ “छलावा” करार दिया और इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
आगे क्या?
अब इस पूरे मामले पर सबकी नजरें मुख्य न्यायाधीश की बेंच पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या वास्तव में यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण की श्रेणी में आता है और क्या याचिकाकर्ता के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। 6 अप्रैल की सुनवाई इस प्रकरण में निर्णायक मोड़ ला सकती है।



