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एक साल बाद मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में खुली कब्र ने समाज से पूछ लिया सवाल—क्या हमने सच को खुद ही दफना दिया?

इस्लाम में कब्र को खोलना बेहद नाजुक और तकलीफदेह अमल है। यह सिर्फ शरीअत का नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बातों का मामला भी है। जब एक बार जनाज़ा उठ जाए, जब मिट्टी दे दी जाए—तो फिर उस अमन को तोड़ना कितना भारी होता है, यह वही समझ सकता है जिसने यह मंजर देखा हो।

और यही वजह है कि वहां मौजूद हर शख्स के दिल में एक ही बात थी—
“काश… शुरुआत में ही सच्चाई तलाश ली होती।”

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एक साल पहले जिस सच को मिट्टी में दफना दिया गया था, आज वही सच सवाल बनकर समाज के सामने खड़ा है। कब्र खुली तो सिर्फ एक जिस्म नहीं, बल्कि कई अनकहे सवाल बाहर आए—और हर दिल से यही आवाज उठी, क्या हमने जल्दबाज़ी में सच्चाई को खुद ही दफना दिया था?

जबलपुर। मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में बुधवार को जो मंजर सामने आया, उसने सिर्फ एक घर नहीं, पूरे शहर के दिल को हिला दिया। एक साल पहले सुपुर्द-ए-खाक किए गए मरहूम गयासुद्दीन कुरैशी का जिस्म जब कब्र से बाहर निकाला गया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं, दिल भारी था और लबों पर बस एक ही दुआ थी—
“या अल्लाह, ऐसा इम्तिहान किसी को न दे…”

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यह सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं थी… मिट्टी में दफन यादें, दर्द और सवाल—सब एक साथ बाहर आ गए।


जबलपुर में मरहूम गयासुद्दीन कुरैशी की मौत 27 मार्च 2025 को नागपुर में एक कथित सड़क हादसे के बाद हुई थी, जिसे उस समय सामान्य मानते हुए बिना पोस्टमार्टम के सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। बाद में परिवार, खासकर उनके भाई कसीमुद्दीन ने मौत को संदिग्ध बताते हुए सवाल उठाए और हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत के आदेश पर करीब एक साल बाद मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में कब्र खोदकर शव बाहर निकाला गया और पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया, ताकि यह साफ हो सके कि यह हज हादसा था या इसके पीछे कोई और सच्चाई छुपी हुई है।


जागरूकता की कमी या जल्दबाज़ी का फैसला?

मरहूम गयासुद्दीन की मौत के बाद उन्हें दफना दिया गया। उस वक्त शायद हालात ऐसे थे, भावनाएं हावी थीं या जानकारी की कमी थी… लेकिन आज वही फैसला एक बड़ी पीड़ा बनकर सामने आया।

आज समाज को खुद से सवाल पूछना होगा—

  • क्या हर संदिग्ध या हादसे में पोस्टमार्टम को जरूरी नहीं समझना चाहिए?
  • क्या हम अपने कानूनी अधिकारों और प्रक्रियाओं को जानते हैं?
  • क्या हम दुख और जल्दबाजी में ऐसे फैसले ले लेते हैं, जिनका पछतावा बाद में होता है?

इस्लाम क्या सिखाता है?

इस्लाम सिर्फ जनाज़े और दफन की बात नहीं करता, बल्कि इंसाफ और सच्चाई को सबसे ऊपर रखता है। अगर किसी मौत में जरा सा भी शक हो, तो उस सच्चाई को सामने लाना भी एक जिम्मेदारी है—एक अमानत है।

उलमा भी यही नसीहत देते हैं—
“अगर किसी मौत में शक हो, तो उसकी तह तक जाना जरूरी है… क्योंकि इंसाफ में ही सुकून है।


एक आईना… पूरे समाज के लिए

बुधवार का वह मंजर सिर्फ एक घटना नहीं था—वह एक आईना था, जिसमें पूरे समाज को खुद को देखने की जरूरत है।

आज जरूरत है समझने की:

  • हर संदिग्ध मौत में तुरंत कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाए
  • परिवार भावनाओं में आकर जरूरी कदमों को नजरअंदाज न करे
  • समाज सही जानकारी और सलाह के साथ खड़ा रहे

ताकि किसी को दोबारा अपने ही अपनों की कब्र खोलने की नौबत न आए।


आखिरी बात… एक दुआ

आज हर जुबान पर बस एक ही दुआ है—
“अल्लाह मरहूम गयासुद्दीन कुरैशी को जन्नतुल फिरदौस अता फरमाए, उनके परिवार को सब्र-ए-जमील दे… और अगर कोई सच्चाई छुपी है, तो उसे जल्द सामने लाए।”

और साथ ही एक खामोश ख्वाहिश—
“या अल्लाह… ऐसा दिन फिर कभी किसी के हिस्से में न आए।”

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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