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वोट दो, बराबरी मत मांगो — क्या यही कांग्रेस का सेकुलरिज़्म है? जबलपुर में सिहोरा से सदर तक 25 ब्लॉक अध्यक्ष, एक भी मुसलमान नहीं !

जबलपुर | 2 दिन पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने 780 ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्ति की। जिनमें जबलपुर में कांग्रेस ने 25 ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जारी की, तो यह सिर्फ़ एक संगठनात्मक घोषणा नहीं थी—यह एक सियासी संदेश था। और वह संदेश मुस्लिम समाज के लिए बेहद कड़वा, अपमानजनक और तकलीफ़देह है।
पूरे जिले में एक भी मुस्लिम ब्लॉक अध्यक्ष नहीं दिया गया।

सिहोरा से बरगी तक, पूरब से पश्चिम तक, मध्य जबलपुर से लेकर कैंट सदर और रांझी तक—कांग्रेस ने जानबूझकर या अनजाने में, लेकिन पूरी तरह मुस्लिम समाज को संगठन की रीढ़ से काट दिया।
यह अब महज़ “नुमाइंदगी की कमी” नहीं, बल्कि उस समाज के साथ की गई सियासी बेईमानी है जिसने हर दौर में कांग्रेस का झंडा उठाए रखा।

जबलपुर कांग्रेस का संदेश और हिसाब साफ है, विधायक मुस्लिम वोट से बनाओ, नगर निगम सदन में पार्षदों की ‘गिनने लायक’ संख्या मुस्लिम वोट से बनाओ, महापौर मुस्लिम वोट से बनाओ.. लेकिन जब संगठन में बराबरी और सम्मानजनक हिस्सेदारी देने की बात आए तो जबलपुर जिले के 3 लाख मुसलमानों को या तो अल्पसंख्यक कांग्रेस विभाग के गोले में बंद कर दो या जाकिर हुसैन ब्लॉक में एक पद पकड़ा दो। संगठन की मुख्यधारा की राजनीती से इसे दूर रखो.

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जिसने कांग्रेस को ज़िंदा रखा, वही संगठन से गायब

जबलपुर का मुस्लिम समाज कोई “मौसमी वोटर” नहीं है। यह वही समाज है जिसने आपातकाल से लेकर मोदी युग तक, हर कठिन दौर में कांग्रेस का साथ छोड़ा नहीं। सवाल पूछे बिना, शर्तें रखे बिना, हर चुनाव में कांग्रेस के लिए खड़ा रहा।

हमेशा की तरह आज भी उसी समाज को संदेश दिया जा रहा है—
“तुम्हारा वोट चाहिए, लेकिन नेतृत्व नहीं…”

यह सिर्फ़ अनदेखी नहीं, बल्कि राजनीतिक अपमान है

70 साल में एक बार भी भरोसा नहीं

यह पहला मौका नहीं है।
करीब 70 वर्षों में एक बार भी जबलपुर में नगर कांग्रेस अध्यक्ष मुस्लिम समाज से नहीं बनाया गया। पिछली बार जब पहली बार मांग उठी तो उसे मज़ाक में उड़ा दिया गया।
फिर एक बार नगर निगम नेता प्रतिपक्ष मुस्लिम समाज से हो, यह मांग आई—उस पर भी टाल दिया गया।

अब ब्लॉक अध्यक्षों की सूची में पूरे जिले से मुस्लिम समाज को साफ कर दिया गया, यह साफ़ करता है कि समस्या किसी व्यक्ति की नहीं, जबलपुर कांग्रेस की नीति और नियत की है।

मुस्लिम वोट से सत्ता, लेकिन मुस्लिम को सत्ता से दूर

हकीकत यह है कि जबलपुर में कांग्रेस की सियासी सांसें मुस्लिम वोट से चलती हैं।

  • जिले की 8 विधानसभा सीटों में कांग्रेस को जो इकलौती सीट मिली, वह सिर्फ़ मुस्लिम वोट से मिली
  • उसी सीट पर मुसलमानों ने अपनी पहचान की राजनीति करने वाली AIMIM को नकारा, और कांग्रेस को चुना
  • उत्तर मध्य विधानसभा में कांग्रेस की हार भी ऐसी रही कि मुस्लिम वोटों ने हार को अपमान बनने से रोका
  • दशकों बाद जब कांग्रेस का महापौर बना, तो आंकड़े चीख़-चीख़ कर बोले—यह जीत मुस्लिम समाज के आंख बंद भरोसे की देन थी
  • 79 वार्डों वाले जबलपुर शहर में कांग्रेस के 27 पार्षद हैं। इनमें से 8 पार्षद सीधे मुस्लिम वोट की बदौलत जीतकर आए। वही करीब 7 वार्ड अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम वोट की बदौलत आये। इनके दम पर नगर निगम सदन में गिनने लायक और आवाज़ उठाने लायक संख्या कांग्रेस ने सुरक्षित कर पाई.

फिर सवाल उठता है—
जब सत्ता का रास्ता मुस्लिम वोट से होकर जाता है, तो संगठन की मुख्यधारा की राजनीति का दरवाज़ा मुस्लिमों पर क्यों बंद है?

जिले में मुस्लिम आबादी 3 लाख से ज़्यादा है।
फिर भी 25 ब्लॉक अध्यक्षों में शून्य मुस्लिम

यह संयोग नहीं हो सकता। यह चयन है—और वह चयन मुस्लिम समाज के खिलाफ़ है।

‘सबका साथ’ या सिर्फ़ भाषणों की लाइन?

कांग्रेस खुद को सेकुलरिज़्म, सर्वधर्म सद्भाव और समान अवसरों की पार्टी बताती है।
में संगठन की मुख्यधारा से मुस्लिमसमाज को हमेशा दूर रखना इन तमाम नारों को खोखला साबित करती है।

सवाल साफ़ है

जो पार्टी अपने संगठन में बराबरी नहीं दे सकती,
वह देश में इंसाफ़ की बात किस मुंह से करती है?

अल्पसंख्यक विभाग = राजनीतिक गेट्टो?

मुस्लिम नेताओं और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जबलपुर में कांग्रेस ने मुसलमानों को एक राजनीतिक “कोने” में धकेल दिया है—
या तो अल्पसंख्यक कांग्रेस विभाग में बंद कर दो,
या फिर उन्हीं इलाकों में पद दो जहां 95% आबादी मुस्लिम हो।

मुख्यधारा की लीडरशिप?
वह मुसलमानों के लिए नहीं है।

यह चेतावनी है, शिकायत नहीं

यह रिपोर्ट किसी पार्टी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि उस भरोसे की चीख़ है जिसे लगातार कुचला जा रहा है।
अगर कांग्रेस ने इसे “नाराज़गी” समझकर टाल दिया, तो आने वाले चुनावों में यह नाराज़गी फैसला बन सकती है।

मुस्लिम समाज अब सिर्फ़ पूछ नहीं रहा—
हमारा हक़ कहां है?”
वह सोचने लगा है—
क्या हमारा भरोसा ग़लती था?”

जबलपुर में ब्लॉक अध्यक्षों की यह सूची कांग्रेस के लिए सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं,
बल्कि एक आईना है—
और इस आईने में कांग्रेस का सेकुलर चेहरा धुंधला नज़र आ रहा है।

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