
भोपाल/महू। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महू के मुकेरी मोहल्ला स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जवाद सिद्दीकी के पुश्तैनी घर को गिराने की प्रस्तावित कार्रवाई पर 15 दिन की अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश जस्टिस प्रणय वर्मा ने शुक्रवार को दिया।
30 साल पुराने नोटिस पर कार्रवाई—कोर्ट ने कहा, ‘सही प्रक्रिया जरूरी’
जस्टिस प्रणय वर्मा ने सुनवाई के दौरान कहा कि डेमोलिशन की कार्रवाई 1996-97 में जारी नोटिसों पर आधारित है। इस मामले में लगभग 30 वर्षों की देरी को देखते हुए विभाग को उचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा—
“यदि लगभग 30 वर्ष बाद कोई कार्रवाई की जानी थी, तो पिटीशनर को सुनवाई का पूरा मौका मिलना चाहिए था।”
इस आदेश के बाद महू कैंटोनमेंट बोर्ड को निर्देश दिया गया है कि अगली सुनवाई तक न तो डेमोलिशन किया जाए और न ही कोई स्ट्रक्चरल कार्रवाई।
कैंटोनमेंट बोर्ड का आरोप: ‘गैर-कानूनी निर्माण’
महू कैंटोनमेंट बोर्ड ने हाल ही में मुकेरी मोहल्ला स्थित इस चार मंज़िला इमारत पर “अनधिकृत निर्माण” का आरोप लगाते हुए अंतिम नोटिस जारी किया था। नोटिस में निवासियों और कानूनी वारिसों को 3 दिन में “बिना अनुमति” बने हिस्सों को हटाने का निर्देश दिया गया था।
बोर्ड द्वारा लगाया गया नोटिस कहता है कि—
- भवन का कुछ हिस्सा कई साल पहले बिना इजाज़त बनाया गया
- यदि उल्लंघन दूर नहीं किया गया तो
बिल्डिंग मालिक के खर्चे पर ध्वस्त की जाएगी
पुराने रिकॉर्ड और लगातार नोटिस—1996 से चल रहा विवाद
ऑफिशियल रिकॉर्ड के अनुसार, यह विवाद लगभग तीन दशक पुराना है।
कैंटोनमेंट बोर्ड ने पहले—
- 23 अक्टूबर 1996 – पहला नोटिस
- 2 नवंबर 1996 – सेक्शन 185, कैंटोनमेंट्स एक्ट
- 27 मार्च 1997 – सेक्शन 256 के तहत नोटिस
जारी किया था। लेकिन वर्षों तक कोई कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी।
मौलाना बिल्डिंग—महू की पहचान
स्थानीय लोग इस चार मंजिला घर को “मौलाना बिल्डिंग” के नाम से जानते हैं।
यह 1990 के दशक में बना एक बड़ा आवास है, जिसमें—
- 25 से अधिक खिड़कियाँ
- विशाल बेसमेंट
- और चौड़ी फ्रंट फेसिंग
बताई जाती है। यह संपत्ति जवाद सिद्दीकी के पिता स्वर्गीय मोहम्मद हम्माद सिद्दीकी की मानी जाती थी।
बाद में इसे उनके बेटे जवाद सिद्दीकी के नाम ट्रांसफर किया गया, और फिर अब्दुल मजीद को गिफ्ट डीड के तहत सौंप दिया गया। वर्तमान में अब्दुल मजीद इसकी कानूनी ओनरशिप का दावा करते हैं।
पिटीशनर का पक्ष: ‘नोटिस में स्पष्ट नहीं कि कौन सा हिस्सा अवैध’
मामले में पिटीशनर अब्दुल मजीद की ओर से कहा गया कि—
- नोटिस में यह स्पष्ट नहीं है कि बिल्डिंग का कौन सा हिस्सा अनधिकृत माना गया है
- बोर्ड 2025 की सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइंस के विपरीत सिर्फ 3 दिन का जवाब समय दे रहा है
- 30 साल पुराने नोटिसों के आधार पर आज कार्रवाई करना तकनीकी रूप से गलत है
उनके वकील, एड. अजय बागड़िया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार:
“किसी भी डेमोलिशन कार्रवाई से पहले कम से कम 15 दिन की नोटिस अवधि अनिवार्य है।”
सिद्दीकी परिवार के खिलाफ नई जांचें चालू
नया नोटिस उस समय आया है जब सिद्दीकी परिवार कई पुराने वित्तीय मामलों में फिर से जांच के घेरे में है।
यह जांच तब तेज हुई जब फरीदाबाद के अल-फलाह मेडिकल कॉलेज के दो डॉक्टर एक कथित टेरर मॉड्यूल के शक में पकड़े गए, जो लाल किले के पास हुए 10 नवंबर के ब्लास्ट के मामले से जुड़ा बताया जा रहा है।
परिवार पर पुराने वित्तीय फ्रॉड के आरोप
- इसी सप्ताह जवाद सिद्दीकी के छोटे भाई हामूद अहमद सिद्दीकी को हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया
- उन पर 2000 से कई इन्वेस्टमेंट फ्रॉड केस दर्ज हैं
- आरोप है कि आर्मी और MES के रिटायर्ड कर्मियों को फर्जी निवेश योजना में ठगा गया
ईडी (ED) ने दिल्ली और फरीदाबाद में 25 लोकेशनों पर छापे भी मारे हैं, जिनमें अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े स्थान शामिल हैं।
कहां से शुरू हुई कहानी?
महू पुलिस की रिपोर्ट बताती है कि—
- सिद्दीकी परिवार ने 1990 के दशक में महू में “अल-फलाह इन्वेस्टमेंट कंपनी” चलाई
- 2001 में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया
- बाद में अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट और फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी अस्तित्व में आई



