JabalpurMadhya PradeshNews

बाज़ मीडिया सीरीज़ : ईदगाह काण्ड का जिम्मेदार कौन—नई कमेटी, पुरानी कमेटी, समाज या सरकार ? मीनारों से उठता सवाल—गुनहगार कौन, निगहबान कौन?

ईदगाह काण्ड दोहराया न जाए, दूसरी मजहबी संस्था में वही पैटर्न रिपीट न हो, समाज की मजहबी विरासतों को चलाने वाले तानाशाही रवैये को छोड़ कर सबको साथ लेकर चलने वाले बनें। इस सबके लिए ज़रूरी है कि मोमिन ईदगाह पर तफ्सील से चर्चा हो। बाज़ मीडिया ने इसी के मद्देनज़र एक सीरीज़ शुरू की है, जिसमें एक के बाद 4 पार्ट आएंगे। यह लेख उस सीरीज़ की प्रस्तावना (इंट्रो पार्ट) है।

ईदगाह काण्ड का जिम्मेदार कौन: पॉडकास्ट में सुनने के लिए नीचे क्लिक करें


जबलपुर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र का सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य जिस सांझी विरासत और सामूहिक चेतना पर टिका रहा है, उसमें गोहलपुर मोमिन ईदगाह की भूमिका एक ऐतिहासिक स्तंभ की तरह रही है। लेकिन 13 अक्टूबर को जो कुछ हुआ, उसने केवल एक धार्मिक परिसर की गरिमा को आघात नहीं पहुँचाया, बल्कि उस सामूहिक विश्वास को भी झकझोर दिया, जो 90 वर्षों से समाज, वक्फ संपत्तियों और सामुदायिक नेतृत्व के बीच एक अदृश्य समझौते के रूप में कायम था।

Advertisement

कहा जाता है कि ‘इतिहास स्वयं को तब तक दोहराता है, जब तक उससे सबक न सीख लिया जाए’।

जबलपुर में 13 अक्टूबर को ईदगाह में घटित घटनाक्रम केवल नई और पुरानी कमेटी के बीच एक विवाद या टकराव नहीं था—यह एक चेतावनी थी। एक ऐसा अलार्म, जिसकी गूँज सही समय पर नहीं सुनी गई, तो आने वाले दिनों में किसी और ऐतिहासिक मजहबी धरोहर के नाम के आगे भी ‘काण्ड’ जैसा शब्द जुड़ सकता है।

ईदगाह काण्ड को समझने के लिए पीछे भी देखना होगा, आज में भी ठहरना होगा और कल का अंदेशा भी पढ़ना होगा।

यह मामला केवल एक कमेटी, एक निर्णय या एक दिन का टकराव नहीं है यह वर्षों की उपेक्षा, छोटी सोच, लीडरशिप संकट और समाज की मौन सहमति का परिणाम है। यह कहानी किसी एक किरदार की नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था, सामूहिक मानसिकता और प्रवृत्ति की है।

अगर यह सवाल पूछा जाए कि “ईदगाह काण्ड का जिम्मेदार कौन?”
तो सच यह है कि इसका जवाब किसी एक नाम, एक गुट या एक तारीख में नहीं लिखा जा सकता।

इस काण्ड के तीन प्रमुख हिस्सेदार हैं—

1. पुरानी कमेटी — इख़लाक़ी तौर पर सबसे बड़ी जिम्मेदार

जिसने शायद आर्थिक भ्रष्टाचार न किया हो, लेकिन जिसकी बंद-दरवाज़ों की कार्यशैली, समाज से दूरी, एक व्यक्ति की तानाशाही, कमेटी पदाधिकारियों की गुलामाना ज़ेहनियत (व्यक्तिवादी) और दूरदर्शिता की कमी ने विरोध की ज़मीन तैयार कर दी। बहुत कुछ गलत नहीं हुआ, लेकिन बहुत कुछ सही भी नहीं हुआ—और कभी-कभी यही सबसे बड़ा अपराध बन जाता है।

2. वर्तमान कमेटी — तकनीकी रूप से सबसे बड़ी जिम्मेदार

वर्तमान कमेटी, जिसने ईदगाह के पिछले नेतृत्व की कमज़ोरियों से उपजे असंतोष का समाधान करने के बजाय उसे हथियार बनाया। बदलाव के नाम पर अनैतिक और सवालों से घिरे रास्ते अपनाए। सोशल मीडिया में झूठ और अधूरे सच को फैलाकर अपने पक्ष में माहौल बनाया। विरोध को समाधान की दिशा देने की बजाय, उसे राजनीतिक समीकरणों और सत्ता-समीपता के ज़ोर से कुचलने की कोशिश की—और यहीं से ईदगाह एक धार्मिक स्थल से हटकर संघर्ष स्थल बन गई।

3. मुस्लिम समाज — सबसे बड़ा और मूल दोषी

समाज पिछली कमेटी की मनमानी के दौर में भी तमाशबीन और खामोश था। वर्तमान कमेटी के सियासी रास्तों से ‘ईदगाह छीनने जैसी प्रक्रिया’ पर भी खामोश है। समाज ने सवाल पूछना छोड़ा, निगरानी रखना छोड़ा, जवाबदेही माँगना छोड़ा। समाज ने नेतृत्व तो चुना, लेकिन नेतृत्व पर नियंत्रण रखना भूल गया। समाज ने “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली मानसिकता को दस्तूर बना लिया।

यह वही समाज है जिसने हर नेतृत्व को ताकत दी, पर कभी निगरानी नहीं रखी—और यही मौन आज सबसे भारी साबित हो रहा है। पुरानी कमेटी भी समाज के बीच की है, नई कमेटी भी समाज के बीच की है। तो फिर दोषी समाज के बाहर कैसे हो सकते हैं?


यह लेख एक शुरुआत है … जवाबदेही की पहली दस्तक

इस मुद्दे को सतही बयान-बाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे तह-दर-तह, साक्ष्यों, घटनाओं, नीतिगत खामियों और सामाजिक व्यवहार के आईने में समझना ज़रूरी है।

इसलिए हम इस विषय को चार भागों में प्रस्तुत करेंगे, हर पार्ट में तफसील से बात होगी—

🔹 पहला भाग : पुरानी कमेटी — नैतिक जिम्मेदारी, नेतृत्व की विफलता
🔹 दूसरा भाग : नई कमेटी — सत्ता, रणनीति और विवादित हस्तक्षेप का सच
🔹 तीसरा भाग : समाज — खामोशी, उदासीनता और सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन

🔹 चौथा भाग : हमें अपने अंदर क्या बदलाव लाने होंगे


क्योंकि सवाल अब केवल ज़िम्मेदार तलाशने का नहीं…
सवाल यह है कि वही गलती दोबारा न दोहराई जाए।

अगर समाज ने इससे भी सबक नहीं लिया, अगर नेतृत्व से जवाबदेही नहीं माँगी गई, अगर वक्फ संपत्तियों को अपने घर की तरह संवारने और सहेजने की इज्तिमाई शऊर नहीं जागा…

तो मुमकिन है कि भविष्य में कोई और ऐतिहासिक स्थल, कोई और नाम, किसी और ‘काण्ड’ की सुर्खी बन जाए।

यह लेख किसी के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि समाजी जागरूकता और इज्तिमाई अहतिसाब (आत्ममंथन) की शुरुआत है।

क्योंकि इतिहास खुद को तब तक दोहराता रहता है, जब तक उससे सबक न लिया जाए।

Shahbaz Rehmani

शहबाज़ रहमानी बाज़ मीडिया कॉर्पोरेशन प्रा. लि. के Founder और CEO हैं। यह एक तेज़ी से बढ़ती डिजिटल न्यूज़ कंपनी है जो मध्य भारत में पत्रकारिता को नया रूप दे रही है। उन्हें रिपोर्टिंग और संपादन का दस साल से ज़्यादा अनुभव है। वे पहले अग्निबाण अख़बार में संपादक रह चुके हैं और फिलहाल एक्सप्रेस मीडिया सर्विस (EMS) में न्यूज़ एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। शहबाज़ रहमानी डिजिटल पत्रकारिता में नई सोच और Innovationके लिए जाने जाते हैं। उनका मकसद है कि जबलपुर और आसपास की पत्रकारिता को सच्ची, भरोसेमंद और असरदार बनाकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया जाए। उनके… More »
Back to top button

You cannot copy content of this page