
आज जबलपुर की सरज़मीं पर सिर्फ़ एक तामीरी काम नहीं हो रहा, बल्कि तारीख़ लिखी जा रही है।
ख़ानक़ाहे सुलेमानी की पाक ज़मीन पर आज रेत और सीमेंट के साथ-साथ आने वाली नस्लों के लिए दीन, अख़लाक़ और कामयाब ज़िंदगी की बुनियाद रखी जा रही है।
यह वो लम्हा है जिसे वक़्त अपने दामन में समेट कर रखेगा—ताकि जब आज से50 साल बाद इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ, तो लिखा मिले कि यहीं से इल्म की एक नई रोशनी उठी थी, जिसने लाखों दिलों को मुनव्वर किया था और बर्रे-सगीर की तारीख़ में एक नया सफ़्हा जोड़ दिया था।
खबर वीडियो में सुनें 👇
दूसरे लैंटर के साथ एक नई मंज़िल की शुरुआत

आज ख़ानक़ाहे सुलेमानी का दूसरा लैंटर डाला जा रहा है। चार हज़ार स्क्वेयर फ़ीट से भी ज़्यादा रक़बे में बन रही इस अज़ीम तामीर में मंडी मदार टेकरी कब्रस्तान की पाक ज़मीन पर आराम फ़रमा रहे हज़रत दादा मियां रह. (जोबट शरीफ़) के अकीदतमंद, सुलेमानी मस्जिद के अतराफ़ में रहने वाले और दूर-दराज़ से आए अहले-दिल लोग पूरे जोश, ईमान और अकीदत के साथ जुटे हुए हैं।
कोई मज़दूरी दे रहा है,
कोई अपनी मेहनत, कोई हस्बे इस्तिताआत माल
कोई अपना मशवरा— कोई अपना समय
हर शख़्स अपनी पूरी क़ुव्वत, ताक़त और सलाहियत इस नेक काम में लगा रहा है।
यह सिर्फ़ एक तामीर नहीं,
यह तारीख़ का मोड़ है।
यह सिर्फ़ इमारत नहीं,
यह ज़िम्मेदारी है—जिसे हर आशिक़-ए-औलिया अदा कर रहा है।
नमाज़ियों की बढ़ती तादाद और एक बड़ी ज़रूरत

गौरतलब है कि पिछले कई सालों से मस्जिद सुलेमानी में नमाज़ अदा करने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही थी, जिसकी वजह से जुमे, रमज़ान और खास मौक़ों पर जगह की सख़्त कमी महसूस की जा रही थी।
ख़ानक़ाह की यह तामीर उस अहम समस्या का स्थायी हल है।
इस नए और वसीअ स्ट्रक्चर के मुकम्मल होने के बाद—इंशा’अल्लाह—कम से कम अगले 50 सालों तक नमाज़ियों को जगह की परेशानी नहीं होगी, और इबादत सुकून, तवज्जोह और तर्तीब के साथ अदा की जा सकेगी।
एक इमारत नहीं, एक नया दौर की बुनियाद
यह अज़ीम काम ख़ानक़ाहे जोबट शरीफ़ के सज्जादानशीन, हज़रत आमिरुल हसन आमिर दादा की ज़ेरे-सरपरस्ती अंजाम पा रहा है।
इस तामीर का मक़सद महज़ एक ढांचा खड़ा करना नहीं, बल्कि एक ऐसे अज़ीम मक़तब की बुनियाद रखना है जहाँ से नई नस्ल को दीन और दुनिया—दोनों की तालीम दी जाएगी, और जहाँ जदीद चैलेंजेस का इस्लामी हल तलाशने वाले ज़ेहन तैयार किए जाएंगे।
ख़ानक़ाहे सुलेमानी : एक सदी से समाज की रूह
एक सदी से ज़्यादा अरसे से ख़ानक़ाहे सुलेमानी जबलपुर के मुस्लिम समाज की रूह रही है।
यहीं दिलों का इलाज हुआ,
यहीं टूटे हुए इंसान जुड़े,
यहीं नफ़रत के अंधेरों में मोहब्बत का चिराग़ जला।
आज हो रही यह तामीर भी उसी रौशन सिलसिले की एक अहम कड़ी है।
मिशन, विज़न और बर्रे-सगीर तक असर
हज़रत आमिरुल हसन दामत बरकातुहू के मिशन और विज़न को ज़मीन पर उतारती यह अज़ीम तामीर—
इंशा’अल्लाह—महाकौशल ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान में एक मिसाल बनेगी।
यह तामीर पूरे बर्रे-सगीर में अहले-जबलपुर की पहचान बनेगी—
इल्म, अमन और इंसानियत की पहचान।
हर मुसलमान के लिए दावत
आज जबलपुर के हर मुसलमान को दावत है कि वह इस तारीखी काम का हिस्सा बने।
यह मौक़ा बार-बार नहीं आता।
जो हाथ ईंट उठाएगा,
जो दिल दुआ करेगा,
जो माल से ताआवुन करेगा—
उसके हिस्से में सदक़ा-ए-जारिया लिखा जाएगा।
जब आने वाली नस्लें यहाँ इल्म हासिल करेंगी,
जब किसी टूटे दिल को सहारा मिलेगा,
जब किसी भूखे को रोटी मिलेगी—
तो उन तमाम नेक कोशिशों में आपका नाम भी दर्ज होगा।
आइए, आगे बढ़िए।
इस तारीखी तामीर में अपना नाम लिखिए।
ख़ानक़ाहे सुलेमानी की इस अज़ीम तामीर में शरीक होकर
दीन से जुड़ने,
दीन को जोड़ने
और अपनी आख़िरत सँवारने का वसीला बनिए।
इंशा’अल्लाह, यह क़दम कभी ज़ाया नहीं जाएगा।



