( जबलपुर) ख़ानक़ाहे सुलेमानी मस्जिद की तामीर-ए-नौ का अहम मरहला पूरा : 50 साल नहीं होगी जगह की कमी । इल्म, रूहानियत और ख़िदमत-ए-ख़ल्क का बनेगा मरकज़

शनिवार को खानकाह सुलेमानी मस्जिद की तामीर ए नौ का एक अहम मरहला मुकम्मल हो गया. यहां हजरत मुफ्ती ए आजम मुशाहिद रजा कादरी दामत बरकातुहू की सरपरस्ती में खानकाह शरीफ को मेन लेंटर डाला गया. इसी के साथ शहर जबलपुर की इस अजीम खानकाह में नये दौर का आगाज हुआ. तामीर के मुकम्मल होने के बाद यहां नमाजियों के लिये जगह हो जाएगी, वहीं इस्लामी तालीमात के मरकज की भी शुरुआत होगी.
जबलपुर। आज से तक़रीबन सवा सौ साल पहले हज़रत सुलेमान तूसफ़ीं रहमतुल्लाह अलैहे के ख़लीफ़ा, हज़रत सैय्यद बहादुर अली शाह दादा मियां रहमतुल्लाह अलैहे ने जबलपुर की सरज़मीन पर ख़ानक़ाहे सुलेमानी की बुनियाद रखी थी। इसी के साथ पीर-ओ-मुरशिद के नाम पर मस्जिद-ए-सुलेमानी की तामीर भी अमल में आई। यह ख़ानक़ाह बहुत जल्द इल्म-ए-दीन की इशाअत, दावत-ओ-तब्लीग और रूहानी तरबियत का मरकज़ बन गई।
तामीर ए अव्वल से आज तक … करीब सवा सौ साल से ज़्यादा ख़ानक़ाहे सुलेमानी और मस्जिद-ए-सुलेमानी ने अहले-जबलपुर ही नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल में दीन की रोशनी फैलाने में अहम किरदार अदा किया। उलमा, मशाइख़ और अकीदतमंदों की रूहानी रहनुमाई का यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहा और इस ख़ानक़ाह ने इल्म, अमन और अख़लाक़ का पैग़ाम आम किया।


अब क्त की ज़रूरतों को सामने रखते हुए ख़ानक़ाहे सुलेमानी की तामीर-ए-नौ का काम शुरू किया गया है। आने वाले सौ सालों की ज़रूरतों को मद्देनज़र रखते हुए सज्जादानशीन हज़रत आमिर दादा दामत बरकातुहू ने ख़ानक़ाह का मुकम्मल खाका तैयार कराया है। इस तामीर का मक़सद न सिर्फ़ मस्जिद-ए-सुलेमानी में बढ़ती नमाज़ियों की तादाद के लिए वसीअ और मुनज़्ज़म इंतज़ाम करना है, बल्कि ख़ानक़ाह को इल्म-ए-दीन और ख़िदमत-ए-ख़ल्क का एक मज़बूत मरकज़ बनाना भी है।
वीडियो: हज़रत मुफ़्ती ए आज़म ने क्या कहा…
शनिवार को ख़ानक़ाहे सुलेमानी के तामीरी काम का एक अहम मरहला उस वक़्त मुकम्मल हुआ, जब मेन लेंटर (छत) डाला गया। सुबह करीब 9 बजे शुरू हुआ यह काम देर रात तक जारी रहा। पूरा काम हज़रत मुफ़्ती-ए-आज़म मुशाहिद रज़ा क़ादरी की जेरे सरपरस्ती और विशेष मौजूदगी में मुकम्मल हुआ।
इस मौक़े पर शहर क़ाज़ी हज़रत मौलवी रियाज़ आलम, समाजसेवी हाजी क़दीर सोनी, मुतवल्ली जनाब ज़िया उद्दीन साहब (ज़िया भाई), मुन्तज़िम अब्दुस्सलाम मुन्ना चाचा सहित ख़ानक़ाह के अकीदतमंद, मस्जिद-ए-सुलेमानी के मुसल्लियान और बड़ी तादाद में आम लोग मौजूद रहे। दुआओं, सलावतों और शुकराने के साथ यह मरहला पूरा हुआ, जिसने माहौल को रूहानियत से भर दिया।

नमाज़ियों की परेशानी का स्थायी हल …
ग़ौरतलब है कि बीते कई सालों से मस्जिद सुलेमानी में नमाज़ अदा करने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही थी। जुमे, रमज़ान और ख़ास मौक़ों पर जगह की सख़्त कमी महसूस की जा रही थी। ख़ानक़ाह की यह नई तामीर इसी अहम मसले का स्थायी हल मानी जा रही है।
नए और वसीअ स्ट्रक्चर के मुकम्मल होने के बाद—इंशा’अल्लाह—कम से कम अगले 50 सालों तक नमाज़ियों को जगह की कोई दिक्कत नहीं होगी। इबादत सुकून, तवज्जोह और तर्तीब के साथ अदा की जा सकेगी, जो किसी भी इबादतगाह का असल मक़सद होता है।
वीडियो.. अब सड़क पर नहीं होगी नमाज़ : खादिम
इल्म और इंसानियत का नया मरकज़ ….
यह अज़ीम तामीरी काम ख़ानक़ाहे जोबट शरीफ़ के सज्जादानशीन, हज़रत आमिरुल हसन आमिर दादा दामत बरकातुहू की ज़ेरे-सरपरस्ती अंजाम पा रहा है। इस तामीर का मक़सद महज़ एक इमारत खड़ी करना नहीं, बल्कि एक ऐसे अज़ीम मरकज तब की बुनियाद रखना है जहाँ नई नस्ल को दीन और दुनिया—दोनों की तालीम दी जा सके।

यहाँ से ऐसे ज़ेहन तैयार करने का किए जा सके जो जदीद दौर के चैलेंजेस का इस्लामी, अमन-पसंद और इंसानी हल तलाश कर सकें, मुल्क और मिल्लत की कयादत का फरीजा अंजाम दे सकें। हज़रत आमिरुल हसन आमिर दादा के मिशन और विज़न को ज़मीन पर उतारती यह तामीर—इंशा’अल्लाह—महाकौशल ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान में एक मिसाल बनेगी। ख़ानक़ाहे सुलेमानी की यह तामीर पूरे बर्रे-सग़ीर में अहले-जबलपुर की पहचान बनेगी—इल्म, अमन और इंसानियत की पहचान।




