
Baz News Network । बांग्लादेश के हालिया आम चुनावों में सबसे बड़ी और अहम खबर रही Jamaat-e-Islami की मजबूत वापसी। जिस पार्टी को कुछ साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina की सरकार ने बैन कर दिया था, वही पार्टी अब 68 सीटें जीतकर संसद में सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बन गई है।

यह चुनाव 2024 के छात्र आंदोलन के बाद हुआ, जिसने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था।
बांग्लादेश में 2026 के आम चुनावों का नतीजा न सिर्फ़ सत्ता का परिवर्तन है, बल्कि एक दरदभरी वापसी की कहानी भी है। फ़ँसी की सज़ाओं के दौर से गुजरकर, Jamaat-e-Islami ने 68 सीटें जीतकर संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में अपनी जगह बनाई है।
यह वही पार्टी है जिसे पिछले 15 वर्षों तक राजनीतिक रूप से दबाया गया, चुनौतियों के बीच उसका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया और उसके कई वरिष्ठ नेताओं को क़ानूनी लड़ाइयों के बाद फ़ाँसी के फाँदों तक पहुँचा दिया गया। आज का यह चुनावी परिणाम उसके सब्र, संघर्ष और सियासी ज़िन्दगी की जीत की दास्तान है।
बांग्लादेश जमात इस्लामी के मौलाना मोतिउर्रहमान जिन्हे कुछ साल पहले फांसी दी गई

यह कहानी सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि समाज की सोच, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उस उम्मीद की भी कहानी है जो हारते-हारते फिर से जाग उठी है।
संसद की तस्वीर: कौन कहाँ खड़ा?
दक्षिण एशिया के अहम देश बांग्लादेश में हुए ऐतिहासिक आम चुनावों में तारिक रहमान की अगुवाई वाली Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने दो-तिहाई बहुमत हासिल कर नई राजनीतिक इबारत लिख दी है। 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद यह पहला आम चुनाव था, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री Sheikh Hasina को सत्ता से बेदखल कर दिया था।
चुनाव आयोग (EC) द्वारा जारी ताज़ा नतीजों के अनुसार, घोषित 297 सीटों में से BNP ने 209 सीटों पर जीत दर्ज की है। यह जीत न केवल एक राजनीतिक वापसी मानी जा रही है, बल्कि 15 वर्षों से चले आ रहे अवामी लीग शासन के अंत का औपचारिक संकेत भी है।
संसद की तस्वीर: कौन कहाँ खड़ा?
350 सदस्यों वाली में प्रमुख दलों की स्थिति इस प्रकार है:
- BNP – 209 सीटें
- Jamaat-e-Islami – 68 सीटें
- National Citizen Party (NCP) – 6 सीटें
- अन्य दल – 7 सीटें
- निर्दलीय उम्मीदवार – 7 सीटें
जमात-ए-इस्लामी, जिसे पूर्व सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था, ने इस चुनाव में उल्लेखनीय वापसी की है और मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है।
वहीं, छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने भी छह सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। पार्टी के युवा नेता नाहिद इस्लाम अपनी सीट जीतकर संसद के सबसे कम उम्र के सांसदों में शामिल हो गए हैं। NCP ने जमात के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था।
बैन से लेकर बहुमत वाली संसद तक

बांग्लादेश की मौजूदा राजनीति को समझना हो तो पिछले 20 साल के ज़ख़्मों को याद करना पड़ेगा। Jamaat-e-Islami की आज की 68 सीटों वाली वापसी सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं है — यह उन सालों की कहानी है जब पार्टी पर बैन लगा, नेताओं को जेल हुई, और कुछ को फाँसी के फंदे तक पहुँचा दिया गया।
उन नामों में सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा
Abdul Quader Mollah।

2009 के बाद: मुक़दमे, सज़ाएँ और फाँसी
जब Sheikh Hasina के नेतृत्व में Awami League की सरकार 2009 में सत्ता में आई, तब 1971 के मुक्ति युद्ध से जुड़े मामलों को लेकर इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल बनाया गया।
इसी ट्रिब्यूनल के तहत जमात-ए-इस्लामी के कई वरिष्ठ नेताओं पर मुक़दमे चले।
2013 में अब्दुल क़ादिर मुल्ला को पहले उम्रकैद की सज़ा दी गई। लेकिन देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और सज़ा बढ़ाकर मौत कर दी गई।
12 दिसंबर 2013 को उन्हें फाँसी दे दी गई।
उनके बाद पार्टी के और भी बड़े नेताओं को मौत की सज़ा दी गई।
सरकार ने इसे 1971 के “इंसाफ़” के रूप में पेश किया।
जबकि जमात और उसके समर्थकों ने इसे “सियासी कार्रवाई” बताया।
जमात का सबसे मुश्किल दौर
2013 से 2023 तक का समय जमात-ए-इस्लामी के लिए सबसे कठिन माना जाता है:
- पार्टी का चुनावी रजिस्ट्रेशन रद्द
- सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक
- बड़े नेताओं की फाँसी या जेल
- संगठन पर प्रशासनिक दबाव
अब्दुल क़ादिर मुल्ला की फाँसी ने पार्टी के समर्थकों में गहरा भावनात्मक असर छोड़ा।
उनके परिवार और समर्थकों के लिए वह एक “सब्र और यक़ीन” की मिसाल बन गए।
लेकिन साथ ही बांग्लादेश के समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें 1971 के आरोपों से जोड़कर देखता रहा। यही वजह है कि उनका नाम आज भी देश में विवाद और भावना दोनों से जुड़ा हुआ है।
2024 का आंदोलन और हालात का बदलना
2024 में छात्र आंदोलन ने बांग्लादेश की राजनीति को हिला दिया। भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उठी आवाज़ धीरे-धीरे सत्ता परिवर्तन तक पहुँची।
इसी बदलते माहौल में जमात-ए-इस्लामी का रजिस्ट्रेशन बहाल हुआ और उसे दोबारा चुनाव लड़ने की इजाज़त मिली।
यह वही पार्टी थी जिसे लगभग एक दशक तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रखा गया था।
2026 का चुनाव: सब्र का सिला?
2026 के आम चुनाव में जमात ने नई रणनीति अपनाई। उसने खुद को सिर्फ धार्मिक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि “इंसाफ़ और सुधार” की आवाज़ के रूप में पेश किया।
नतीजा — 68 सीटें।
संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी।
आज पार्टी के समर्थक कहते हैं कि यह जीत उन लोगों की कुर्बानियों का नतीजा है जिन्हें फाँसी दी गई — जिनमें अब्दुल क़ादिर मुल्ला का नाम सबसे आगे लिया जाता है।
भारतीय मुसलमानों के लिए यह कहानी क्यों अहम?
उत्तर भारत के मुसलमानों के लिए यह पूरी कहानी कई संदेश देती है:
- सियासत लंबी और कठिन होती है
- अदालत, आंदोलन और लोकतंत्र — तीनों की भूमिका अहम होती है
- एक समुदाय का नजरिया दूसरे से अलग हो सकता है
- सब्र और संगठन, दोनों जरूरी हैं
यह सिर्फ बांग्लादेश की पार्टी की कहानी नहीं है।
यह कहानी है — संघर्ष, सब्र, विवाद और वापसी की।
आगे का रास्ता
अब जमात-ए-इस्लामी संसद में विपक्ष की भूमिका निभाएगी।
असली सवाल यह है:
क्या वह अपने अतीत के विवादों से आगे बढ़कर नई राजनीति करेगी?
या फिर पुरानी बहसें ही उसका भविष्य तय करेंगी?
इतिहास ने उसे एक और मौका दिया है।
अब देखना यह है कि यह मौका बांग्लादेश को किस दिशा में ले जाता है।



