Opinion

Special Report: गाजा — मलबे, मौत और मायूसी: दो साल की जंग ने छीन ली इंसानियत की सांसें

(विशेष रिपोर्ट — बाज मीडिया / संग्रह और ताज़ा आंकड़े ऑनलाइन स्रोतों से)

गाजा की वह तस्वीर जो हमने किताबों में, टीवी पर और सोशल पोस्ट्स में देखी — अब वह तस्वीर जिंदा दर्द बनकर आँखों के सामने है। छोटे-से तटवर्ती भूभाग में बरबस फैली बर्बादी ने न सिर्फ इमारतें तोड़ी हैं, बल्कि वहाँ की ज़िंदगियों के तार भी उखाड़ दिए हैं। जो आँकड़े सामने हैं वे संख्या नहीं, वे हजारों टूटते हुए घरों, अनगिनत शहादत और बचपन जो छीन लिया गया है — सबका दस्तावेज़ हैं।

Gaza transformed into rubble-strewn wasteland after Israeli bombardment | Israel-Palestine conflict News | Al Jazeera

1) मौत का आँकड़ा: हज़ारों खंडित ज़िंदगियाँ

गाजा में 7 अक्तूबर 2023 से चली जंग के दो वर्षों के भीतर स्वास्थ्य मंत्रालय और मानवीय एजेंसियों के मुताबिक़ दर्जनों हज़ार लोगों की जानें गईं — सूत्रों पर आधारित हालिया अपडेट बताते हैं कि लगभग 67,000 के आसपास नागरिक मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएँ शामिल हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं — हर आँकड़ा एक पूरा परिवार, एक टूटती दुनिया है। (OCHA)

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2) विस्थापन: अपनी ही जमीन पर बेघर होने का दर्द

पूर्व की तुलना में अब लगभग 90% आबादी विस्थापित है — मतलब दो-तिहाई से ज्यादा परिवार बार-बार पलायन कर चुके हैं। लाखों लोग टेंटों, अधखड़े बसेरों और खुले मैदानों में जीने को मजबूर हैं — पानी, साफ़-सफाई और दवा के बिना। हर रात की नींद एक नई अनिश्चितता ले आती है। (UN Web TV)


3) शहर कितना तबाह हुआ — उपग्रह और निगरानी रिपोर्ट्स

सैटेलाइट और मानचित्र विश्लेषण बताते हैं कि गाज़ा शहरों और बस्तियों के बड़े हिस्से क्षति-ग्रस्त या नष्ट हो चुके हैं — कई रिपोर्ट्स ने 60% से ऊपर तक संरचनात्मक नुकसान का आकलन किया है; कुछ पैचों में यह प्रतिशत और भी अधिक है। इमारतों के बीच अब जो खाली जगह दिखती है, वह ज़िंदगी की खाली जगह है — दुकानें, स्कूल, खेल के मैदान — सब कुछ धूल और मलबे में समा चुका है। (unosat.org)


4) मलबे का पहाड़ और साफ़ करने की असंभव लागत

वॉर रिसर्चर और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बताती हैं कि गाज़ा में कई करोड़ टन मलबा पड़ा है — आंकड़े 50-60 मिलियन टन के दायरे में बताये जा रहे हैं। इसे हटाने, सफ़ाई और बुनियादी ढाँचा ठीक करने में वर्षों नहीं, दशकों का काम और अरबों-खरबों डॉलर/रुपये लग सकते हैं — विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ मलबा हटाने और बुनियादी पुनर्वास में ही लंबे समय और भारी लागत लगेगी। यह पैसा अगर आए भी, तो लौटकर वहाँ जिंदगी बसी भी होगी या नहीं — यह एक और सवाल है।


5) शिक्षा और अस्पताल — दो स्तम्भ जो ढह गए

गाज़ा के स्कूलों और यूनिवर्सिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जब गिरा तब भारी कर्ज-सा असर हुआ — बहुत से स्कूल पूरी तरह तबाह हो गए; अनगिनत बच्चे कक्षाओं से दूर, भूखे और भयग्रस्त हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र भी टूट चुका है — WHO और स्वास्थ्य क्लस्टर की रिपोर्ट के मुताबिक 36 में से लगभग आधे अस्पतालों को या तो बंद कर दिया गया है या वे पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं; जिनमें से जो खुले हैं, वे भी संयमित संसाधनों से जूझ रहे हैं — बेड, दवाइयाँ और स्टाफ़ की भारी कमी है। मरने वाले और घायलों के बीच डॉक्टर और नर्स अक्सर बिना पर्याप्त सुरक्षा और संसाधनों के काम कर रहे हैं। (World Health Organization)


6) खेत, पानी और भविष्य की खाद्य सुरक्षा — मिट्टी में ज़हर

गाज़ा की खेती — जो कभी परिवारों और बाजारों की रोटी थी — अब नाज़ुक बनी है। FAO और कृषि जाँच रिपोर्ट्स बताती हैं कि 98.5% क्रॉपलैंड उपलब्ध/उपजाऊ नहीं है, और बड़े हिस्से में पहुँचहीनता या विनाश है; सिंचाई स्रोतों की भारी क्षति और मिट्टी में विस्फोटक/रासायनिक अवशेषों ने खेती की उम्मीदें और भी दूर कर दी हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि जमीन को फिर से खेतीयोग्य बनाने में दशकों लग सकते हैं — इसका मतलब है पीढ़ियों तक खाद्य असुरक्षा और निर्भरता। (FAOHome)


7) पीड़ितों की आवाज़

हम जो आँकड़े दे रहे हैं, वे कठोर वास्तविकता हैं — पर उन आँकड़ों के पीछे इंसान हैं। मांएँ जो अपने बच्चों के खिलौनों के साथ रोती हैं, बाप जो खाली रसोई के सामने बैठकर चुप हैं, बच्चे जिन्हें स्कूल के बजाए बम की आवाज़ सुनना पड़ता है — इन छवियों का वजन शब्दों से तौला नहीं जा सकता। एक बुज़ुर्ग कहते हैं — “हमने अपने घरों को हाथों में उठाकर रखा हुआ था; अब हमारे हाथ खाली हैं।’’

धन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वादे और भाषण — सब कुछ महत्त्वपूर्ण हैं, पर सबसे ज़रूरी है — तत्काल मानवीय सहायता, व्यापक और निर्बाध पहुंच और दीर्घकालिक पुनर्निर्माण योजना जो प्रभावितों की आवाज़ को केंद्र में रखे।


8) क्या होगा आगे? — आशा के छोटे-छोटे पल

हाल की राजनयिक पहल और समझौते (जिनका ज़िक्र और शर्तें अलग-अलग रिपोर्ट्स में विस्तार से मिलती हैं) ने थोड़ी राहत दी है, पर शांति तभी टिकेगी जब बने रहने वाले नागरिक ढाँचे, रोज़गार, पानी और शिक्षा तक पहुँच बहाल होगी। बहुराष्ट्रीय और स्थानीय संगठनों की निगाहें अब — बचों के मानसिक और शारीरिक पुनर्वास, खेतों को फिर से उपजाऊ बनाना, और मलबा हटाने जैसी बुनियादी चुनौतियों पर टिकी हैं। (The White House)


स्रोत और नोट्स (महत्वपूर्ण आँकड़ों के लिए)

  • MoH / OCHA — क्लिनिकल और मौत/घायलों के आधिकारिक अपडेट्स। (OCHA)
  • UN / UNRWA / OCHA — विस्थापन, आवास क्षति और संरचनात्मक नुकसान के उपग्रह/मौजूदा आँकड़े। (UNRWA)
  • WHO / Health Cluster (EMRO sitreps) — अस्पतालों की कार्यक्षमता, बेड कैपेसिटी और स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभाव। (World Health Organization)
  • FAO — कृषि क्षेत्र और क्रॉपलैंड की पहुँच/क्षति — 98.5% आँकड़ा। (FAOHome)
  • मीडिया/रिपोर्टिंग (Al Jazeera, Guardian, AP आदि) — उपग्रह चित्र, मलबे के अनुमान और स्थानीय बयान।

संपादकीय टिप्पणी…

गाजा की त्रासदी सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है — यह दबती हुई आवाज़ों, टूटती हुई मुस्कानों और खोई हुई उम्मीदों का मामला है। जो आँकड़े हमने जुटाए हैं, वे सिर्फ संख्या नहीं; वे इंसानों के जिंदा-लाश हैं। हमारी दुआ और मानवता की जिम्मेदारी यही कहती है — मदद पहुंचाओ, सच लोगों तक पहुँचाओ, और भुलाये हुए चेहरों को भूलने मत देना।

Shahbaz Rehmani

शहबाज़ रहमानी बाज़ मीडिया कॉर्पोरेशन प्रा. लि. के Founder और CEO हैं। यह एक तेज़ी से बढ़ती डिजिटल न्यूज़ कंपनी है जो मध्य भारत में पत्रकारिता को नया रूप दे रही है। उन्हें रिपोर्टिंग और संपादन का दस साल से ज़्यादा अनुभव है। वे पहले अग्निबाण अख़बार में संपादक रह चुके हैं और फिलहाल एक्सप्रेस मीडिया सर्विस (EMS) में न्यूज़ एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। शहबाज़ रहमानी डिजिटल पत्रकारिता में नई सोच और Innovationके लिए जाने जाते हैं। उनका मकसद है कि जबलपुर और आसपास की पत्रकारिता को सच्ची, भरोसेमंद और असरदार बनाकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया जाए। उनके… More »
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