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खुशी का जश्न या कानून का मज़ाक? जबलपुर जिला न्यायालय परिसर में बम फोड़ने वाले पांच गिरफ्तार, एक पर एनएसए

जबलपुर। जिला न्यायालय जैसे संवेदनशील परिसर में सुतली बम फोड़कर जश्न मनाना अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। क्या साथी के पक्ष में गवाही होने की खुशी में किया गया यह कृत्य न्याय प्रक्रिया का सम्मान है या कानून का खुला मज़ाक? 17 मार्च को हुई इस घटना के मामले में पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। सभी को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया है। एक आरोपी पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत भी कार्रवाई की गई है।

अदालत की कार्यवाही के दौरान धमाका

पुलिस अधिकारियों के अनुसार 17 मार्च की शाम जब जिला न्यायालय में नियमित कार्यवाही चल रही थी, तभी कोर्ट नंबर 2 के बाहर अचानक तेज धमाके की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही वकील और अन्य लोग घबराकर बाहर निकल आए। मौके पर धुआं फैला हुआ था और सुतली बम के अवशेष पड़े मिले। राहत की बात यह रही कि इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ।

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जांच में सामने आया कि आरोपी कोर्ट के गेट नंबर तीन से अंदर दाखिल हुए और बाहर सुतली बम जलाकर फोड़ दिया। पुलिस ने घटनास्थल से बम के अवशेष और माचिस बरामद की।

“खुशी” में किया गया कृत्य

ओमती थाना पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उन्होंने बताया कि उनके साथी मनीष अहरिवार की उसी दिन पेशी थी। केस में गवाही उनके पक्ष में हुई थी। इसी खुशी में उन्होंने पटाखा फोड़ा था।

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हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय परिसर में इस तरह का कृत्य केवल लापरवाही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गरिमा के साथ खिलवाड़ है। अदालत वह स्थान है जहां कानून सर्वोपरि होता है। वहां किसी भी प्रकार का धमाका या अव्यवस्था गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

ये हुए गिरफ्तार

पुलिस ने जिन पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, उनमें 19 वर्षीय तनमय, 18 वर्षीय अनूप, 20 वर्षीय अनुज, 18 वर्षीय परोक्ष उर्फ दक्ष और 28 वर्षीय पंकज राजपूत शामिल हैं। सभी को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया है।

एक आरोपी पर एनएसए

पुलिस के अनुसार पंकज राजपूत का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। उसके खिलाफ पहले से 11 मामले दर्ज हैं, जिनमें अपहरण, अवैध वसूली, मारपीट, आर्म्स एक्ट और आबकारी एक्ट के प्रकरण शामिल हैं। उसकी पृष्ठभूमि को देखते हुए प्रशासन ने उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की है।

गरिमा और जिम्मेदारी का सवाल

घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या न्यायालय परिसर को जश्न मनाने की जगह समझ लिया गया है? विशेषज्ञों का मानना है कि कानून की प्रक्रिया को खेल या प्रतियोगिता की तरह देखना गलत मानसिकता को दर्शाता है।

पुलिस ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय जैसे संवेदनशील स्थान पर किसी भी प्रकार की अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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