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जबलपुर हड्डी गोदाम में बुलडोजर: रास्ता खुला या दिल बंद हुए?

सैफ मंसूरी, रजा चौक डिवीज़न, बाज़ मीडिया। सोमवार दोपहर प्रशासन ने हाई कोर्ट के आदेश के बाद तीन दुकानों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। आदेश में 45 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने को कहा गया था। कागज़ों में यह एक सामान्य “अतिक्रमण हटाओ” कार्रवाई दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है।

यह मामला 2022 से जुड़ा है, जब हड्डी गोदाम मैदान को अतिक्रमण मुक्त कर वक़्फ़ मंडी जामा मस्जिद के सुपुर्द किया गया। इसके बाद मैदान के चारों ओर बाउंड्री वॉल बनी। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाउंड्री बनने के बाद पीछे के इलाके की आवाजाही प्रभावित हुई और कुछ दुकानें रास्ते में बाधा बन गईं। शिकायतें सीएम हेल्पलाइन और नगर निगम तक पहुंचीं, और अंततः मामला अदालत तक गया।

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कानूनी स्थिति बनाम जमीनी सच

प्रशासन का पक्ष साफ है—निर्माण अवैध थे, इसलिए कार्रवाई हुई।
लेकिन स्थानीय चर्चा यह भी कहती है कि तीन में से दो दुकानें पैसे देकर खरीदी गई थीं। समस्या यह रही कि खरीद-फरोख्त की लिखापढ़ी तय नियमों के मुताबिक नहीं हुई। नतीजा—दुकानदार अपना दावा साबित नहीं कर पाए और मामला प्रशासन के पक्ष में चला गया।

यहां एक बड़ी सीख निकलती है:

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  • संपत्ति की खरीद-फरोख्त में कानूनी कागज़ात पूरे हों
  • नक्शा, रजिस्ट्रेशन, म्यूटेशन आदि नियमों के तहत हों
    वरना सालों की कमाई एक आदेश में चली जाती है।

क्या बातचीत से हल निकल सकता था?

स्थानीय लोगों की शिकायत में दम था कि आवाजाही में दिक्कत हो रही थी। लेकिन कई लोगों का कहना है कि तीन में से एक दुकान ही रास्ते के बीच में थी। अगर समय रहते दोनों पक्ष बैठकर रास्ता चौड़ा करने या आंशिक संशोधन का रास्ता निकालते, तो शायद रोज़ी-रोटी भी बचती और रास्ता भी खुलता।

यहीं से मामला “अतिक्रमण” से आगे बढ़कर “आपसी टकराव” का रूप लेता दिखा। आरोप-प्रत्यारोप, गुटबाज़ी और एक-दूसरे पर भारी पड़ने की कोशिश ने समाधान की गुंजाइश कम कर दी।

आज जहां देश भर में मुसलमान के मकानों और दुकानों को गैर निशाना बना रहे है वहीं ये काम जबलपुर के एक मुस्लिम इलाके में खुद मुसलमान कर रहे है। वो भी सिर्फ इस लिए की वो खुद को एक दूसरे पर ताकतवर दिखा सके। ये सबसे अधिक चिंता की बात है। सामाजिक राजनीतिक लोगों को आगे आकर इस विवाद का हल निकालना चाहिए ताकि इसके बाद कोई बेघर न हो किसी से उसका रोजगार न छीन।।


क्या विवाद यहीं थमेगा?

आम तौर पर बुलडोजर चलने के बाद मामला शांत मान लिया जाता है। लेकिन क्षेत्र में चर्चा है कि अब दूसरे पक्ष द्वारा गली के अस्थायी कब्जों, पार्किंग और जमीन की सीमाओं की भी जांच कराई जा सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह सिलसिला आगे बढ़ सकता है।

यह स्थिति किसी के लिए भी अच्छी नहीं—

  • छोटे दुकानदारों की रोजी पर असर
  • परिवारों के बेघर होने का खतरा
  • मोहल्ले में तनाव का माहौल

समाज के लिए क्या संदेश?

सबसे चिंताजनक बात यह है कि एक मुस्लिम बहुल इलाके में आपसी खींचतान के चलते हालात यहां तक पहुंचे। जब देश के अलग-अलग हिस्सों में मुसलमानों के घर-दुकानों पर कार्रवाई की खबरें आती हैं, ऐसे समय में अपने ही इलाके में आपसी विवाद से नुकसान होना समुदाय के लिए आत्ममंथन का विषय है।

ताकत दिखाने की राजनीति से ज्यादा जरूरी है—

  • आपसी मशविरा (सलाह-मशविरा)
  • बुजुर्गों और जिम्मेदार लोगों की मध्यस्थता
  • कानूनी और सामाजिक समाधान

आगे क्या?

अब जिम्मेदारी सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व की है कि वे दोनों पक्षों को साथ बैठाकर स्थायी हल निकालें।
अगर समय रहते पहल नहीं हुई तो यह विवाद और गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

मोहल्ले की अमन-चैन, लोगों की रोजी-रोटी और आपसी भाईचारा—इन तीनों की हिफाज़त सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
क्योंकि अंत में नुकसान किसी एक गुट का नहीं, पूरे समाज का होता है।

Saif Mansoori

सैफ मंसूरी जबलपुर के युवा पत्रकार हैं। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पत्रकारिता में शोधकर्ता हैं। वर्तमान में बाज़ मीडिया में डेस्क रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रुचि है।
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