
नई दिल्ली। किसी घर में एक बेटी पैदा होती है तो उसके साथ सपने भी जन्म लेते हैं। मां-बाप उसे पढ़ाते हैं, उसके भविष्य के लिए मेहनत करते हैं, उसके लिए दुआएं करते हैं और एक दिन खुशियों के साथ उसे विदा करते हैं। लेकिन सोचिए, अगर वही बेटी शादी के कुछ महीनों या वर्षों बाद संदिग्ध परिस्थितियों में दुनिया छोड़ दे, तो उसके परिवार पर क्या गुजरती होगी?
देश में दहेज से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर समाज को आईना दिखाया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की Crime in India 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में देशभर में 5,737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि औसतन हर दिन लगभग 16 महिलाओं की जान गई, यानी लगभग हर 90 मिनट में एक बेटी की जिंदगी खत्म हो गई।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये उन घरों की खामोशी हैं जहां कभी बेटी की हंसी गूंजती थी। ये उन मां-बाप के टूटे हुए सपने हैं जिन्होंने अपनी बेटियों को खुशहाल जिंदगी का सपना दिखाकर विदा किया था।

एक दशक में कमी आई, लेकिन सवाल अभी भी जिंदा हैं
NCRB के आंकड़ों के मुताबिक:
- 2015: 7,634 दहेज मौतें
- 2024: 5,737 दहेज मौतें
आंकड़ों में कमी जरूर दिखाई देती है, लेकिन हर एक संख्या के पीछे एक इंसानी जिंदगी है। सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ आंकड़ों में कमी देखकर संतुष्ट हो सकते हैं?
दहेज प्रताड़ना के मामलों में बढ़ोतरी
रिपोर्ट में दहेज से जुड़े उत्पीड़न के मामलों में बढ़ोतरी भी सामने आई है।
- 2022: 13,479 मामले
- 2023: 15,489 मामले
- लगभग 14 प्रतिशत वृद्धि
इसके अलावा 2024 में पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1.20 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए।
यह बताता है कि समस्या केवल मौत तक सीमित नहीं है। हजारों महिलाएं रोज मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक प्रताड़ना से गुजर रही हैं।
उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर, मध्य प्रदेश भी सूची में
राज्यों के आंकड़ों में:
- उत्तर प्रदेश: 2,038 मामले
- बिहार: 1,078 मामले
- मध्य प्रदेश: 450 मामले
- राजस्थान: 386 मामले
- पश्चिम बंगाल: 337 मामले
हाल के मामलों ने फिर बढ़ाई चिंता
हाल के दिनों में ट्विशा शर्मा और दीपिका नगर जैसे मामलों ने दहेज और वैवाहिक प्रताड़ना को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को फिर तेज कर दिया है। परिवारों ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उन्हें लगातार मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
इसी वर्ष एक महिला SWAT कमांडो की कथित दहेज मांग को लेकर हत्या का मामला भी सामने आया, जिसने कई लोगों को झकझोर दिया।
सवाल सिर्फ कानून का नहीं, समाज की सोच का भी है
भारत में दहेज लेना और देना दोनों कानूनन अपराध हैं। कानून मौजूद हैं, सजा का प्रावधान भी है, लेकिन फिर भी सवाल बाकी है — क्या हमारी सोच बदली है?
जब शादी रिश्तों से ज्यादा लेन-देन बनने लगे, जब बेटी की खुशियों से ज्यादा दहेज की सूची महत्वपूर्ण हो जाए, तब समस्या कानून से आगे समाज तक पहुंच जाती है।
हर बेटी अपने साथ सिर्फ सामान नहीं, बल्कि उम्मीदें लेकर ससुराल जाती है। उसे सम्मान चाहिए, प्यार चाहिए, अपनापन चाहिए — कीमत नहीं।
क्योंकि किसी घर की बेटी, किसी की जिम्मेदारी नहीं… किसी की पूरी दुनिया होती है।
(रिपोर्ट: Baz Media Desk)



