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संभल हिंसा: ज़िया-उर-रहमान ने आयोग की रिपोर्ट ख़ारिज की । कहा कि यह साज़िश पुलिस और सरकार की थी, न कि जनता की

संभल | BAZ News Network (BNN) । सांभल हिंसा के मामले में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट पर बवाल। समाजवादी पार्टी के सांसद ज़िया-उर-रहमान बर्क़ ने तीन सदस्यीय आयोग की उस रिपोर्ट को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया, जिसमें उन्हें नवंबर 2024 की सांभल हिंसा का ज़िम्मेदार ठहराया गया है।

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News in Short

  • न्यायिक आयोग ने सपा सांसद ज़िया-उर-रहमान को सांभल हिंसा का साज़िशकर्ता बताया
  • आयोग ने यूपी पुलिस को चार मुसलमान युवकों की मौत से क्लीन चिट दे दी
  • सांसद ज़िया ने आरोप लगाया कि हिंसा पुलिस और सरकार ने पहले से प्लान की थी
  • 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़की थी
  • पुलिस फ़ायरिंग में चार मुसलमान युवकों की मौत हो गई थी

न्यायिक आयोग ने सांसद को बनाया आरोपी

पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सांभल हिंसा “पहले से प्लान की गई साज़िश” थी। आयोग ने सपा सांसद ज़िया-उर-रहमान बर्क़, सपा विधायक इक़बाल महमूद के बेटे सुहेल इक़बाल और शाही जामा मस्जिद इंतेज़ामिया कमेटी के कई सदस्यों को इस साज़िश का हिस्सा बताया।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि 19 नवंबर को पहले सर्वे के दौरान रुकावट डाली गई। 22 नवंबर को जुमे की नमाज़ के बाद सांसद बर्क़ की तक़रीर, व्हाट्सऐप मैसेजों के ज़रिए लोगों को जमा करना और दूसरे सर्वे से एक रात पहले बर्क़ और मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष ज़फ़र अली के बीच फ़ोन पर बातचीत — ये सब साज़िश के सबूत हैं।

आयोग ने इस “साज़िश” की वजह “सियासी महत्वाकांक्षा” और “मस्जिद पर क़ब्ज़ा बनाए रखने की कोशिश” बताई। रिपोर्ट अगस्त में यूपी सरकार को सौंपी गई और बुधवार को विधानसभा में पेश की गई।

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पुलिस फ़ायरिंग से हुई चार मौतें — आयोग ने दी क्लीन चिट

24 नवंबर 2024 को सांभल शहर में तनाव तब चरम पर पहुंचा जब एएसआई की टीम शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने पहुंची। साथ में “जय श्री राम” के नारे लगाती हुई भीड़ भी थी। जब स्थानीय मुसलमानों ने विरोध किया तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया और फ़ायरिंग शुरू कर दी।

पुलिस की कार्रवाई में चार मुसलमान युवकों — नईम, बिलाल, नुमान और एक 19 साल के नौजवान — की मौत हो गई। कई अन्य ज़ख़्मी हुए। लेकिन न्यायिक आयोग ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बैलिस्टिक जांच के आधार पर कहा कि मौतें पुलिस की फ़ायरिंग से नहीं हुईं। आयोग ने दावा किया कि मक़्तूलों को .315 बोर के हथियारों से लगी गोलियां थीं, जबकि तैनात पुलिसकर्मियों के पास ऐसे हथियार नहीं थे।

आयोग ने कहा कि मौतें भीड़ में मौजूद स्थानीय तुर्क और पठान समूहों के सदस्यों की क्रॉस-फ़ायरिंग से हुईं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मक़्तूलों के रिश्तेदारों ने न तो एफ़आईआर में और न ही आयोग के सामने बयान में पुलिस पर आरोप लगाया। हालांकि, यह दावा मीडिया रिपोर्टों से मेल नहीं खाता, जिनमें परिजनों ने साफ़ तौर पर पुलिस फ़ायरिंग का आरोप लगाया था।

सांसद ज़िया ने पलटवार किया — “साज़िश पुलिस और सरकार की”

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट का जवाब देते हुए सपा सांसद ज़िया-उर-रहमान बर्क़ ने कहा कि वह सिर्फ़ एक बात पर आयोग से सहमत हैं — कि हिंसा “पहले से प्लान की गई” थी। लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि यह साज़िश पुलिस और सरकार की थी, न कि जनता की।

“यह जनता ने पहले से प्लान नहीं किया था। यह पुलिस प्रशासन और सरकार की साज़िश थी,” सांसद बर्क़ ने कहा। उन्होंने सवाल उठाया कि सीसीटीवी फ़ुटेज के बावजूद आयोग ने सच्चाई क्यों छिपाई।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हिंसा के दौरान पथराव, आगज़नी, फ़ायरिंग और पुलिस के गोला-बारूद लूटने की घटनाएं हुईं। आयोग ने कहा कि सात पुलिसकर्मी भीड़ की फ़ायरिंग में घायल हुए। जांच में “मेड इन यूएसए” मार्का 12 बोर का शॉटगन शेल भी मिला, जिसे “बाहरी हाथ” की संभावना बताया गया।

आयोग ने सांभल हिंसा को “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा” बताते हुए कहा कि दोषियों को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच्चाई सीसीटीवी फ़ुटेज में क़ैद है, जो अभी तक सामने नहीं आई? और क्या चार मुस्लिम युवकों की मौत की असली जांच कभी होगी?

📌 Sources & References

  • Maktoob Media
  • Judicial Commission Report

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