सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र धर्म परिवर्तन कानून को चुनौती

मुंबई | BAZ Media Bhopal Division । महाराष्ट्र का धर्म परिवर्तन कानून अब सुप्रीम कोर्ट में। Association for Protection of Civil Rights (APCR) ने Maharashtra Freedom of Religion Act, 2026 को संविधान के खिलाफ बताते हुए जनहित याचिका दायर की। 14 अक्टूबर को दाखिल इस PIL में कहा गया कि यह कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है।
News in Short
- APCR ने महाराष्ट्र धर्म परिवर्तन कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी
- PIL में धार्मिक स्वतंत्रता और निजी स्वतंत्रता का हनन बताया गया
- कानून के तहत धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले नोटिस देना जरूरी
- 30 जुलाई को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून लागू हुआ था
- बॉम्बे हाईकोर्ट में भी इस कानून के खिलाफ याचिका दायर है
महाराष्ट्र धर्म परिवर्तन कानून पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
APCR के महाराष्ट्र सचिव शाकिर शेख के जरिए दायर इस PIL में कहा गया है कि नया कानून धार्मिक विवेक की आजादी, धर्म को मानने और प्रचार करने के अधिकार, निजी स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को प्रभावित करता है। संगठन का कहना है कि राज्य की ओर से व्यक्तिगत स्वायत्तता में दखल और स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन पर लगाई गई पाबंदियां न्यायिक जांच की मांग करती हैं।
कानून के मुताबिक, जो भी व्यक्ति एक धर्म से दूसरे धर्म में जाना चाहता है, उसे प्रस्तावित धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले सक्षम अधिकारी को नोटिस देना होगा। यही प्रावधान उन संस्थाओं पर भी लागू होता है जो धर्म परिवर्तन समारोह आयोजित करती हैं। सरकार का दावा है कि यह कानून “प्रलोभन, गलत बयानी, बल, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती या किसी अन्य धोखाधड़ी के जरिए धर्म परिवर्तन रोकने” के लिए लागू किया गया है।
नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की आपत्ति
नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और अधिकार समूहों ने इस कानून की आलोचना करते हुए कहा है कि यह लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। बॉम्बे हाईकोर्ट में भी एक अलग याचिका दायर की गई है, जिसमें कानून की धारा 2(a), 3, 6, 7 और 9 को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान संविधान के भाग III के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
APCR ने सुप्रीम कोर्ट से उचित घोषणाएं, निर्देश और अन्य राहत की मांग की है। इसमें चुनौती दिए गए प्रावधानों पर अंतरिम सुरक्षा या स्टे की मांग भी शामिल है। संगठन चाहता है कि न्यायपालिका इस कानून की संवैधानिक गारंटियों के खिलाफ जांच करे।
30 जुलाई 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद महाराष्ट्र सरकार की गजट में यह कानून प्रकाशित हुआ था। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या फैसला देता है और क्या यह कानून संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है।
📌 Sources & References
- Maktoob Media



