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एक कहानी गाजा की : माँ ने दाँत देखकर कहा — यह मेरा बेटा नहीं, तीन महीने बाद जिंदा मिला

गाजा | BAZ News Network (BNN) । एक माँ ने लाश को देखा और कहा — ये दाँत मेरे बेटे के नहीं हैं। सबने समझाया — कपड़े उसके हैं, घर की चाबी उसकी है। लेकिन माँ ने जनाजे से पहले भी, जनाजे के बाद भी, एक ही बात दोहराई — ये मेरा बेटा नहीं। तीन महीने बाद रेड क्रॉस का फोन आया — आपका बेटा जिंदा है, इजरायली जेल में बंद है।

News in Short

  • गाजा में एक नौजवान लकड़ी लेने गया, इजरायली फायरिंग में गायब हो गया
  • दो हफ्ते बाद मिली लाश के पास उसके कपड़े और घर की चाबी थी
  • माँ ने लाश के दाँत देखे और साफ इनकार किया — यह मेरा बेटा नहीं
  • परिवार ने जनाजा पढ़ा, ताजियत हुई, लेकिन माँ चुप रही
  • तीन महीने बाद पता चला — बेटा इजरायली जेल में जिंदा है

गाजा की माँ ने दाँत देखकर क्या कहा

अब्दुल्लाह माजिद अबू वरदा ने अपनी आँखों देखा वाकया सुनाया। गाजा में खाने का सामान खत्म हो चुका था। आटा नहीं, गैस नहीं। लोग लकड़ी इकट्ठा करने निकलते — ड्रोन सिर पर मंडराते रहते। एक दोपहर पड़ोसी का बेटा कुछ दोस्तों के साथ लकड़ी लेने गया। इलाका इजरायली फौज के करीब था। खतरनाक था। लेकिन मजबूरी और भी बड़ी थी।

अचानक गोलियों की आवाज आई। लड़के भागे — घबराए हुए, हांफते हुए। लेकिन एक लड़का वापस नहीं आया। वह पड़ोसी का बेटा था। दो हफ्ते तक फौज वहीं डटी रही। कोई खोज नहीं सका। कोई जा नहीं सका। सिर्फ सवाल रह गए — मर गया? गिरफ्तार हुआ? किसी को कुछ पता नहीं।

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चाबी और कपड़े मिले, लेकिन माँ ने नहीं माना

जब फौज हटी तो कुछ पड़ोसी मिलकर उस इलाके में गए। झाड़ियों के पास एक सड़ी हुई लाश मिली। पास में कपड़े पड़े थे। जेब में घर की चाबी थी। सबने सोचा — यही है। लाश पहचान से बाहर थी। सिर्फ दाँत बचे थे।

माँ को बुलाया गया। उसने लाश देखी। फिर दाँत देखे। फिर धीरे से सिर हिलाया — “ये मेरे बेटे के दाँत नहीं हैं।” लोगों ने समझाया — देखो, जैकेट उसकी है, चाबी उसकी है। बीवी ने कहा — यही है। भाइयों ने कहा — यही है। लेकिन माँ चुप रही। सिर्फ एक बात — “ये दाँत उसके नहीं हैं।”

जनाजा पढ़ा गया। शोक का तंबू लगा। लोग ताजियत देने आए। लेकिन माँ दूर बैठी रही — खामोश। बस एक लाइन दोहराती रही — “ये उसके दाँत नहीं हैं।”

तीन महीने बाद रेड क्रॉस का फोन आया

तीन महीने बाद फोन की घंटी बजी। रेड क्रॉस था। आवाज साफ थी — “आपका बेटा जिंदा है। इजरायली जेल में बंद है।” घर जो कभी सोग में डूबा था, अब खुशी से गूंज उठा। माँ घुटनों के बल बैठ गई। भगवान का शुक्र अदा किया।

बाद में पता चला — फौज ने उसे गिरफ्तार किया था। ले जाने से पहले, उसे कपड़े उतारने पर मजबूर किया। फिर कपड़े किसी और की लाश के पास रख दिए। चाबी की वजह से सबने सोचा — मर गया। लेकिन माँ की फितरत और दाँत — इन दोनों ने सच को पकड़े रखा।

अब्दुल्लाह माजिद अबू वरदा कहते हैं — “यह सिर्फ कहानी नहीं, यह मेरी जिंदगी का हिस्सा है। आज भी मुझे याद है — हमारे मोहल्ले पर छाई खामोशी, माँ की आँखों में आँसू, और वो सदमा जो खुशी में बदल गया। मैंने यह वाकया इसलिए शेयर किया क्योंकि यह बताता है — अंधेरे वक्त में भी, एक माँ का शक सच की रोशनी बन सकता है।” उसका बेटा जिंदा था। उसकी फितरत सच्ची थी। लेकिन गाजा में — सच होने से दर्द खत्म नहीं होता, खोया हुआ वक्त वापस नहीं आता।

📌 Sources & References

  • Quds News Network
  • Abdullah Majed Abu Warda (eyewitness account)

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