जबलपुर में MP UCC विधेयक के खिलाफ राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन, मौलिक अधिकारों की मांग

जबलपुर | BAZ Media Jabalpur Division । मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक 2026 को लेकर जबलपुर में बड़ा विरोध हुआ। एडवोकेट आलमगीर अशरफी, शाकिर कुरैशी सहित 10 सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर विधेयक को वापस लेने की मांग की।
News in Short
- जबलपुर में MP UCC विधेयक 2026 के खिलाफ राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया
- संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 का हवाला देकर मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग
- सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ज्ञापन सौंपा
- विधेयक को वर्तमान स्वरूप में वापस लेने या रोक लगाने की मांग
MP UCC विधेयक पर संवैधानिक सवाल
ज्ञापन में साफ कहा गया कि भारत की सामाजिक और कानूनी व्यवस्था सदियों से धार्मिक, सांस्कृतिक और जनजातीय विविधताओं पर टिकी रही है। विधेयक का मौजूदा स्वरूप इसी विविधता पर सवाल खड़ा करता है। ज्ञापन देने वालों ने संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 और 44 का हवाला दिया। उनका कहना है कि किसी भी समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव से पहले व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
खास तौर पर मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े निकाह, मेहर, इद्दत, बहुविवाह, खुला, मुबारात और वसीयत जैसे अहम मुद्दों को उठाया गया है। ज्ञापन में फर्स्ट कजिन से विवाह को प्रतिबंधित रिश्तों में रखने वाले प्रावधान पर भी तीखी आपत्ति दर्ज की गई। मुस्लिम पर्सनल लॉ में ऐसे निकाह को मान्यता है, इसलिए यह प्रावधान टकराव पैदा कर सकता है।
ज्ञापन सौंपने वालों में एडवोकेट जावेद अंसारी, अशरफ मंसूरी, मुख्तार अली, सोनू खान, महबूब आलम, शोएब खान, पराग, परवेज अंसारी शामिल रहे।
तलाक और उत्तराधिकार पर आपत्ति
ज्ञापन में कहा गया कि विधेयक 2026 में तलाक की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। तलाक-ए-हसन, खुला और मुबारात जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि विवाह विच्छेद के लिए न्यायिक प्रक्रिया अनिवार्य करने से व्यक्तिगत कानून प्रभावित होंगे। उत्तराधिकार और वसीयत के मामले में भी चिंता जताई गई। एक समान उत्तराधिकार व्यवस्था से विभिन्न समुदायों के विशिष्ट प्रावधान खत्म हो सकते हैं।
ज्ञापन में तीन मुख्य मांगें रखी गईं — पहली, MP UCC विधेयक 2026 को वर्तमान स्वरूप में वापस लिया जाए या रोक लगाई जाए। दूसरी, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता जैसे मौलिक अधिकारों की रक्षा की जाए। तीसरी, सभी समुदायों, कानूनी विशेषज्ञों और प्रभावित पक्षों से व्यापक परामर्श हो।
ज्ञापन में आखिर में कहा गया कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में विविधता में एकता बनाए रखना जरूरी है। व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मुद्दों का हल व्यापक सामाजिक संवाद, सुधार और जागरूकता के जरिए निकाला जाना चाहिए — न कि एकतरफा कानून बनाकर।



