
जबलपुर, 15 जून। शहर के रानीताल क्षेत्र स्थित लगभग 150 वर्ष पुराना ऐतिहासिक यहूदी कब्रिस्तान इन दिनों स्वामित्व विवाद के कारण चर्चा में है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का एकमात्र यहूदी कब्रिस्तान माने जाने वाले इस विरासत स्थल की बाउंड्री वॉल तोड़े जाने और गेट हटाए जाने की घटना ने इतिहास प्रेमियों, विरासत संरक्षण कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है।
बताया जा रहा है कि संबंधित भूमि पर केवट समाज द्वारा स्वामित्व का दावा न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि विवाद अभी न्यायिक प्रक्रिया में है, लेकिन इस बीच कब्रिस्तान परिसर की संरचना को नुकसान पहुंचने के आरोपों ने इस ऐतिहासिक धरोहर के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जबलपुर की बहुसांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
इतिहासकारों के अनुसार रानीताल का यह कब्रिस्तान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जबलपुर की बहुसांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहां मौजूद कब्रें उस यहूदी समुदाय की याद दिलाती हैं, जिसने कभी शहर के सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपनी भूमिका निभाई थी। माना जाता है कि यह कब्रिस्तान ब्रिटिश काल से अस्तित्व में है और प्रदेश में यहूदी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
विरासत को नुकसान पहुंचने की आशंका
स्थानीय नागरिकों और विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण के कदम नहीं उठाए गए तो प्रदेश की एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंच सकता है। उनका मानना है कि स्वामित्व विवाद अपनी जगह है, लेकिन जब तक मामला न्यायालय में विचाराधीन है तब तक स्थल की मूल संरचना और ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
प्रशासन से संरक्षण की मांग
विभिन्न सामाजिक संगठनों और इतिहास प्रेमियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि कब्रिस्तान की वर्तमान स्थिति का सर्वे कराया जाए तथा इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए संरक्षण के विशेष उपाय किए जाएं। उनका कहना है कि यह केवल एक समुदाय का नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की साझा विरासत का हिस्सा है।
प्रदेश का इकलौता यहूदी कब्रिस्तान
विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह अपनी तरह का एकमात्र यहूदी कब्रिस्तान है। ऐसे में इसकी सुरक्षा और संरक्षण केवल स्थानीय नहीं बल्कि राज्य स्तरीय महत्व का विषय है। उनका मानना है कि राजस्व अभिलेखों, पुराने नक्शों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर विवाद का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी भी स्थिति में इस ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
फिलहाल मामला न्यायालय और प्रशासन के समक्ष है, लेकिन विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं स्वामित्व विवाद की भेंट प्रदेश के इकलौते यहूदी कब्रिस्तान की ऐतिहासिक पहचान न चढ़ जाए।



