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तबाही के मलबे में ज़िंदगी तलाशती इंसानियत — ग़ाज़ा में तुर्की ने शुरू किया मलबा हटाने का मानवीय अभियान

ग़ाज़ा, (बाज़ मीडिया)। राख और मलबे में तब्दील हो चुके ग़ाज़ा के बीच आज इंसानियत ने फिर सिर उठाया है। तुर्की की मानवीय संस्था IHH ने शनिवार से एक नई परियोजना शुरू की है — जिसका मकसद सिर्फ मलबा हटाना नहीं, बल्कि उम्मीद को फिर से ज़िंदा करना है।

ग़ाज़ा के उत्तरी हिस्से, जहाँ अब भी हवा में धूल और दर्द तैर रहा है, वहाँ IHH की टीमों ने भारी मशीनों और मानवीय जज़्बे के साथ काम शुरू किया है। सड़कों से मलबा हटाया जा रहा है, ताकि बच्चों के स्कूल, लोगों के घर और राहत के रास्ते फिर खुल सकें।

कई जगहों पर जहाँ महीनों से सिर्फ खामोशी थी, अब मशीनों की आवाज़ें आ रही हैं — जो इस बात का इशारा हैं कि ज़िंदगी अभी पूरी तरह हारी नहीं है।

IHH ने कहा कि यह काम सिर्फ ईंटों और पत्थरों को साफ़ करने का नहीं, बल्कि लोगों के दिलों से डर और बेबसी हटाने का प्रयास है। ग़ाज़ा के जिन रास्तों पर अब तक खून और आंसू बहे, वहाँ अब राहत के काफ़िले गुजरेंगे, दवाइयाँ और रोटी पहुँचेगी।

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कई फ़िलिस्तीनी परिवारों ने कहा कि इस पहल ने उन्हें सालों बाद कोई उम्मीद दी है।
एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा —

“जब मैंने देखा कि रास्ता खुल रहा है, तो लगा जैसे मेरे बेटे की कब्र पर फूल खिल गए हों।”

IHH कई वर्षों से ग़ाज़ा में काम कर रही है — भोजन, दवाइयाँ, आश्रय और मनोसामाजिक सहायता देती रही है। लेकिन इस बार का अभियान अलग है, क्योंकि यह मलबे से जीवन निकालने की जद्दोजहद है।

इस परियोजना के ज़रिए संस्था का उद्देश्य है कि ग़ाज़ा के टूटे शहरों में फिर से रौशनी जले, बच्चे फिर खेलें, और लोग अपने घरों की ओर लौटें।

“हम सिर्फ दीवारें नहीं, ज़िंदगी फिर से खड़ी कर रहे हैं,” — IHH प्रवक्ता ने कहा।

ग़ाज़ा के दिल में, तबाही की राख के बीच, यह अभियान अब आशा की पहली किरण बन गया है — reminding the world that इंसानियत अब भी ज़िंदा है।

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