800 टन की क्षमता, सिर्फ 150 टन सप्लाई: 5 बड़ी वजहें जिनसे ठप हो रहा जबलपुर का कचरा प्लांट

जबलपुर। शहर में कचरा प्रबंधन की हकीकत एक अजीब विरोधाभास पेश कर रही है। सड़कों, बाजारों और मोहल्लों में जहां कचरे के ढेर आम दृश्य बन चुके हैं, वहीं शहर का Kathaunda Waste-to-Energy Plant कचरे की कमी से जूझ रहा है। यह स्थिति न केवल नगर निगम की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि करोड़ों की लागत से बने वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है।
जानकारी के अनुसार प्लांट की स्थापित क्षमता प्रतिदिन 800 टन कचरा प्रोसेस करने की है, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है। सामान्य दिनों में भी प्लांट तक करीब 350 टन कचरा ही पहुंच पा रहा है, जबकि हाल ही में एक दिन यह मात्रा घटकर सिर्फ 150 टन रह गई, जिससे प्लांट ट्रिप हो गया और संचालन बाधित हो गया। प्लांट का संचालन कर रही कंपनी Kundan Green Energy का कहना है कि पर्याप्त और नियमित कचरा सप्लाई के बिना प्लांट को लगातार चलाना संभव नहीं है।
“800 टन क्षमता वाले प्लांट को 150 टन पर चलाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है।”
दूसरी ओर, शहर में कचरे की स्थिति बिल्कुल उलट नजर आती है। अनुमानतः करीब 450 टन कचरा रोजाना निकल रहा है, लेकिन यह कचरा व्यवस्थित तरीके से प्लांट तक नहीं पहुंच पा रहा। रविवार को सफाई व्यवस्था प्रभावित रहने के कारण कई इलाकों में कचरा उठाव नहीं हुआ, जिससे गलियों, बाजारों और मुख्य मार्गों पर कचरे के ढेर लग गए। नालियों के आसपास गंदगी फैलने से बदबू और संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या कचरे की कमी नहीं, बल्कि कलेक्शन और ट्रांसपोर्ट सिस्टम की कमजोरी है। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के बावजूद यदि वह प्लांट तक नहीं पहुंच रहा, तो यह स्पष्ट रूप से प्रबंधन की खामी को दर्शाता है। यदि शहर में फैले कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्लांट तक पहुंचाया जाए, तो एक ओर शहर की सफाई व्यवस्था सुधर सकती है और दूसरी ओर ऊर्जा उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है।
“कचरा ही इस प्लांट का ईंधन है, और वही नहीं मिल रहा—तो उत्पादन कैसे होगा?”
5 बड़ी वजहें: क्यों ठप हो रहा प्लांट
1. कचरा कलेक्शन सिस्टम में बड़ी खामी
नगर निगम कचरा उठाव का दावा कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। कई इलाकों में कचरा समय पर नहीं उठ रहा, जिससे ढेर लग रहे हैं और प्लांट तक सप्लाई बाधित हो रही है।
“कागजों में कचरा उठ रहा है, जमीन पर ढेर बढ़ रहे हैं।”
2. ट्रांसपोर्टेशन चेन कमजोर
कचरा उठ भी रहा है तो उसे प्लांट तक पहुंचाने की व्यवस्था प्रभावी नहीं है। पर्याप्त वाहन, रूट प्लानिंग और मॉनिटरिंग के अभाव में कचरा बीच में ही अटक जाता है।
“कचरा उठाने से ज्यादा जरूरी है उसे सही जगह पहुंचाना—यहीं सिस्टम फेल है।”
3. ठेकेदारी सिस्टम में अनियमितता और भ्रष्टाचार
स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि ठेकेदार तय संख्या के अनुसार भुगतान तो लेते हैं, लेकिन जमीन पर उतने कर्मचारी नहीं उतारते। कई जगह आधे से भी कम स्टाफ काम करता है, जिससे सफाई व्यवस्था प्रभावित होती है।
“पूरी पेमेंट हो रही है, लेकिन आधे कर्मचारी भी मैदान में नहीं दिखते।”
4. छुट्टी और मॉनिटरिंग की कमी
रविवार या छुट्टी के दिनों में सफाई व्यवस्था ढीली पड़ जाती है। नियमित निगरानी न होने के कारण कचरा उठाव प्रभावित होता है और स्थिति और बिगड़ जाती है।
5. प्लांट और निगम के बीच समन्वय की कमी
कचरा कितनी मात्रा में और कब पहुंचाना है, इस पर स्पष्ट समन्वय नहीं दिखता। इसका नतीजा यह होता है कि प्लांट को कभी बहुत कम तो कभी अनियमित सप्लाई मिलती है, जिससे संचालन प्रभावित होता है।
डबल नुकसान: शहर भी परेशान, प्लांट भी बेहाल
इस पूरी अव्यवस्था का असर दो स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है—
- शहर में गंदगी, बदबू और स्वास्थ्य खतरे बढ़ रहे हैं
- प्लांट कचरे की कमी से ठप पड़ रहा है और उत्पादन घट रहा है
“यह डबल फेलियर है—शहर गंदा और प्लांट खाली।”
स्थिति साफ है—
👉 जब कचरा शहर से उठेगा नहीं, तो प्लांट तक पहुंचेगा नहीं
👉 और जब प्लांट को “कच्चा माल” नहीं मिलेगा, तो वह अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पाएगा
“जब कचरा उठेगा नहीं, तो प्लांट चलेगा कैसे—यही सबसे बड़ा सवाल है।”
आर्थिक नुकसान और मशीनों पर खतरा
बार-बार ट्रिपिंग और कम सप्लाई के कारण प्लांट को आर्थिक नुकसान हो रहा है। साथ ही मशीनों के खराब होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है, जिससे मेंटेनेंस लागत में वृद्धि हो रही है।
“अनियमित संचालन से मशीनें जल्दी खराब होती हैं और लागत कई गुना बढ़ जाती है।”
जनता की मांग और आगे की राह
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने नगर निगम से कचरा प्रबंधन प्रणाली को दुरुस्त करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो शहर और प्लांट दोनों को नुकसान होता रहेगा।
“सफाई व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना अब जरूरी हो गया है।”
जबलपुर में मौजूदा हालात “शहर में कचरा ज्यादा, प्लांट के लिए कम” जैसी विडंबना को उजागर करते हैं। यदि कलेक्शन, ट्रांसपोर्ट और मॉनिटरिंग सिस्टम को समय रहते मजबूत नहीं किया गया, तो यह समस्या आने वाले समय में और विकराल रूप ले सकती है।
“अगर अभी सुधार नहीं हुआ, तो यह समस्या आने वाले समय में और गंभीर हो जाएगी।”



