
Baz News Network : देश के कई हिस्सों से हाल के हफ्तों में सामने आई हिंसा की घटनाओं ने एक बार फिर हेट क्राइम और सांप्रदायिक तनाव पर बहस को तेज़ कर दिया है। विभिन्न राज्यों से सामने आए मामलों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों की हत्या या उन पर हमले की खबरें सामने आई हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि ये घटनाएँ सिर्फ़ अलग-अलग आपराधिक मामले नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती हैं जिसमें मुसलमानों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है।
बिहार में महिला की कथित पीट-पीटकर हत्या
बिहार के मधुबनी जिले में रोशन खातून नाम की एक मुस्लिम महिला की कथित तौर पर भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। स्थानीय लोगों के अनुसार, वह गांव में चल रहे एक विवाद में मदद मांगने के लिए मुखिया के पास गई थी। आरोप है कि वहां मौजूद कुछ लोगों ने उसे एक खंभे से बांध दिया और बुरी तरह पीटा।
स्थानीय लोगों का दावा है कि हमलावरों ने उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया और जबरन गोमूत्र और शराब पिलाई, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश पैदा कर दिया है।
राजस्थान में ट्रक ड्राइवर की हत्या
राजस्थान के भिवाड़ी में 28 वर्षीय ट्रक ड्राइवर आमिर खान की 2 मार्च की सुबह गोली मारकर हत्या कर दी गई। बताया जा रहा है कि वह दिल्ली फल लेकर जा रहा था और रास्ते में एक मस्जिद के पास अपनी गाड़ी के साथ इंतजार कर रहा था।
परिवार का आरोप है कि तथाकथित गोरक्षक समूह से जुड़े लोगों ने उस पर हमला किया और गोली मार दी। हालांकि इस मामले में पुलिस जांच जारी है।
उत्तर प्रदेश में तनाव और हिंसा की घटनाएँ
उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों से भी सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आई हैं। शाहजहांपुर में होली के दौरान कथित तौर पर मुस्लिम लोगों पर रंग फेंके जाने के बाद विवाद बढ़ गया, जिसके बाद दोनों समुदायों के बीच झड़प और पत्थरबाजी हुई। इस घटना में कई लोग घायल बताए जा रहे हैं।
इसी राज्य की राजधानी लखनऊ में भी एक चौंकाने वाली घटना सामने आई, जहां 13 साल के उनैज खान को रोज़े के दौरान कथित तौर पर गोली मार दी गई। बताया जा रहा है कि गोली चलाने वाला उसका ही एक दोस्त था। आरोपी को एक भाजपा नेता का रिश्तेदार बताया जा रहा है, हालांकि मामले की जांच अभी जारी है।
दरभंगा में बुजुर्ग की हत्या
बिहार के दरभंगा जिले में 65 वर्षीय अब्दुल सलाम की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि उन्होंने कुछ युवकों को इस्लामोफोबिक गालियां देने से रोकने की कोशिश की थी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमलावरों ने उन पर लोहे की रॉड से हमला किया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
एक्टिविस्ट बोले – “यह एक बड़ा ट्रेंड है”
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसी घटनाएं देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और सामाजिक विभाजन को दर्शाती हैं।
सामाजिक संगठन माइल्स2स्माइल के संस्थापक आसिफ मुजतबा का कहना है कि रमज़ान का महीना शांति और आध्यात्मिक चिंतन का समय होता है, लेकिन कई मुसलमानों के लिए यह समय सुरक्षा को लेकर चिंता का कारण बन गया है।
उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से उनका संगठन हेट क्राइम, मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का काम कर रहा है। उनके मुताबिक, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन कई मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाई होती है।
मुजतबा का कहना है कि ऐसी घटनाओं के बावजूद मुस्लिम समुदाय की ओर से बदले की मांग या सामूहिक हिंसा की अपील नहीं की जाती।
“इसके बजाय समाज में एक गहरी खामोशी और निराशा दिखाई देती है,” उन्होंने कहा।
“कानून का राज जरूरी”
नागरिक अधिकार संगठन एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान का कहना है कि मॉब लिंचिंग और हेट क्राइम को अलग-थलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता।
उनके मुताबिक,
“जब समाज में किसी समुदाय को लगातार संदेह या बाहरी व्यक्ति के रूप में पेश किया जाता है, तो ऐसी हिंसा का माहौल बनता है।”
खान ने कहा कि भीड़ के इंसाफ की जगह कानून का राज होना चाहिए।
उनका मानना है कि हेट क्राइम और मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने और नफरत फैलाने वाले भाषणों पर कार्रवाई करने से इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
रमज़ान के दौरान सुरक्षा की मांग
नदीम खान ने यह भी सवाल उठाया कि रमज़ान जैसे पवित्र महीने के दौरान मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन को अतिरिक्त कदम उठाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर त्योहारों के दौरान अन्य समुदायों की धार्मिक जगहों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जा सकते हैं, तो रमज़ान के दौरान भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
फिलहाल देश के अलग-अलग हिस्सों में सामने आई इन घटनाओं ने सांप्रदायिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करना ही समाज में भरोसा बहाल करने का एकमात्र रास्ता है।



