
जबलपुर (BAZ News Network)। बरगी बांध की शांत लहरें उस दिन अचानक चीखों में बदल गईं। जो जगह सैर-सपाटे और हंसी-खुशी के लिए जानी जाती थी, वही कुछ ही पलों में मातम के सन्नाटे में डूब गई। तेज आंधी और तूफानी हवाओं ने ऐसा कहर बरपाया कि एक खुशियों से भरा क्रूज पल भर में मौत का मंजर बन गया।
तीसरे दिन भी रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीदें कमजोर होती जा रही हैं। सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें लगातार पानी को चीरते हुए लापता लोगों को खोज रही हैं, मगर प्रकृति की मार अब भी राहत कार्य में बाधा बन रही है।
मासूम चेहरों की दर्दनाक विदाई
रेस्क्यू के दौरान जब 4 साल के विराज सोनी और 5 साल के श्रीतमिल के छोटे-छोटे निर्जीव शरीर पानी से बाहर निकाले गए, तो वहां मौजूद हर आंख नम हो गई। जिन मासूम हाथों में खिलौने होने चाहिए थे, वे अब हमेशा के लिए खामोश हो चुके थे।

वहीं 45 वर्षीय कामराज और 9 वर्षीय मयूरन अब भी लापता हैं। उनके परिवारों की आंखें हर पल उस उम्मीद में टिकी हैं कि शायद अगला पल कोई चमत्कार लेकर आए। लेकिन हर बीतते वक्त के साथ यह इंतजार और भी दर्दनाक होता जा रहा है।

“बस एक बार मिल जाए…” — परिवारों की टूटती उम्मीद
घटना स्थल पर मौजूद परिजनों की हालत देख कोई भी खुद को संभाल नहीं पा रहा। कोई बेटे का नाम पुकार रहा है, तो कोई अपने पिता की एक झलक के लिए आसमान की तरफ देख रहा है। हर चेहरे पर एक ही सवाल है — “हमारे अपने कहां हैं?”

सिस्टम की बेरुखी ने बढ़ाया दर्द
दर्द सिर्फ हादसे का नहीं है, बल्कि उसके बाद की अव्यवस्था ने भी जख्मों को और गहरा कर दिया। तमिलनाडु के पीड़ित परिवारों को शव ले जाने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पहले कहा गया कि केवल एक ही सदस्य शव के साथ जा सकता है, बाकी को अपने खर्च पर टिकट लेना होगा।
जब विरोध हुआ, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया और चार्टर विमान की व्यवस्था की गई। लेकिन तब तक परिवारों के दिलों में सिस्टम के प्रति अविश्वास गहरा चुका था।
पायलट की आंखों में पछतावा, लेकिन सवाल बाकी
हादसे के बाद बर्खास्त किए गए पायलट महेश पटैल जब कैमरे के सामने आए, तो उनके हाथ जुड़े हुए थे और आंखों में पछतावा साफ झलक रहा था। उन्होंने कहा कि मौसम अचानक बदला, लहरें बेकाबू हो गईं और कुछ ही मिनटों में सब कुछ खत्म हो गया।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कोई आधिकारिक चेतावनी नहीं मिली थी। लेकिन यह सवाल अब भी खड़ा है — अगर चेतावनी नहीं थी, तो क्या सुरक्षा इंतजाम भी नहीं थे?
लापरवाही की परतें एक-एक कर खुल रही हैं
इस हादसे ने कई कड़वे सच सामने ला दिए हैं। मौसम विभाग का अलर्ट होने के बावजूद क्रूज चलाया गया। कई यात्रियों को लाइफ जैकेट तक नहीं पहनाई गई। 40 से ज्यादा लोगों के लिए सिर्फ दो कर्मचारी मौजूद थे।
यानी एक तरफ लोग जिंदगी की सैर पर निकले थे, और दूसरी तरफ उनकी सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई थी।
अब सवाल सिर्फ एक — जिम्मेदार कौन?
बरगी का यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि कई लापरवाहियों का नतीजा बनकर सामने आया है। आज भी लहरों के बीच कुछ परिवार अपने अपनों की तलाश में खड़े हैं, आंखों में आंसू और दिल में एक अधूरी उम्मीद लिए।
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या इन मासूम जिंदगियों की कीमत सिर्फ मुआवजे और जांच तक ही सीमित रह जाएगी, या फिर इस बार सच में कुछ बदलेगा?



