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न्यूज़क्लिक FIR रद्द — दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा ‘सत्ता का दुरुपयोग’

नई दिल्ली | 11 जून 2026 | BAZ News Network (BNN) | BAZ Desk | Bazmedia.in

News in Short

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यूज़क्लिक के खिलाफ EOW की FIR नंबर 116/2020 और ED की ECIR — दोनों रद्द कर दिए।
  • जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा — जांच ‘मालाफाइड’ थी और यह स्वतंत्र पत्रकारिता पर ‘सत्ता का मनमाना हमला’ था।
  • कोर्ट ने माना कि न्यूज़क्लिक को जब विदेशी निवेश मिला, तब 26% की सीमा लागू ही नहीं थी।

न्यूज़क्लिक FIR रद्द करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा — यह जांच सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर सीधा हमला था। 29 मई 2026 को सुनाए गए फैसले में जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को बड़ी राहत दी।

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न्यूज़क्लिक FIR रद्द — कोर्ट ने क्यों माना ‘सत्ता का दुरुपयोग’?

दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंसेज़ विंग (EOW) ने अगस्त 2020 में FIR नंबर 116/2020 दर्ज की थी। इसमें धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 120B (आपराधिक षड्यंत्र) लगाई गई थीं। आरोप था कि न्यूज़क्लिक ने FDI नियमों का उल्लंघन करते हुए विदेशी फंड लिया, शेयरों की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई और पत्रकारों-कंसल्टेंट्स की तनख्वाह के ज़रिए पैसा बाहर निकाला।

कोर्ट ने इन सभी आरोपों को एक-एक करके खारिज किया। फैसले में कहा गया — “जांच के दौरान भी कुछ ऐसा सामने नहीं आया जिससे पता चले कि कोई व्यक्ति था जो न्यूज़क्लिक से ठगा गया हो।” विदेशी निवेशक ने खुद कभी कोई शिकायत नहीं की। शिकायत करने वाला महज़ एक ‘इनफॉर्मेंट’ था, कोई पीड़ित पक्ष नहीं।

26% की सीमा तो निवेश के डेढ़ साल बाद लागू हुई

न्यूज़क्लिक को अप्रैल 2018 में Worldwide Media Holdings LLC से 15 लाख डॉलर (करीब 12 करोड़ रुपये) का निवेश मिला था। डिजिटल न्यूज़ मीडिया में विदेशी निवेश की 26% की सीमा सितंबर 2019 में लागू हुई — यानी पूरे डेढ़ साल बाद।

इससे पहले दिसंबर 2017 में न्यूज़क्लिक ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय से खुद ही स्पष्टीकरण मांगा था। मंत्रालय ने जनवरी 2018 में जवाब दिया कि ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल प्रिंट मीडिया की श्रेणी में नहीं आते और उस वक्त ऐसे निवेश पर कोई पाबंदी नहीं है। कोर्ट ने कहा — “20 मार्च 2018 का निवेश समझौता किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता।”

शेयरों की कीमत बढ़ाने के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि वैल्यूएशन एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट ने FEMA नियमों के तहत की थी। निवेशक और कंपनी के बीच तय हुई कीमत एक कारोबारी फैसला था — कोई अपराध नहीं।

पत्रकारों और कर्मचारियों को दी गई तनख्वाह और कंसल्टेंसी फीस को ‘फंड की हेराफेरी’ बताने पर कोर्ट ने कहा — “डिजिटल मीडिया कंपनी के लिए इस तरह के खर्च स्वाभाविक हैं। अत्यधिक खर्च भी अपने आप में कोई अपराध नहीं बनता।”

ED की जांच भी खत्म — PMLA केस भी रद्द

चूंकि प्रवर्तन निदेशालय (ED) का मनी लॉन्ड्रिंग केस उसी FIR पर टिका था, इसलिए कोर्ट ने PMLA के तहत दर्ज ECIR भी रद्द कर दी। कोर्ट ने फैसले में लिखा — “आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होता।”

यह फैसला सिर्फ एक मीडिया संस्थान की जीत नहीं है। यह उस सवाल का जवाब है जो पिछले छह सालों से पूछा जा रहा था — क्या सरकारी एजेंसियां पत्रकारिता को दबाने के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं? दिल्ली हाईकोर्ट ने कह दिया — नहीं।

📌 Sources & References

  • Maktoob Media
  • Delhi High Court Judgment (Justice Neena Bansal Krishna
  • 29 May 2026)

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