जबलपुर की दीनी व अदबी दुनिया का एक रोशन बाब बंद, मौलवी रियाज़ आलम मुहम्मदी (रियाज़ मौलाना) का इंतक़ाल

जबलपुर, 15 जुलाई 2026 | BAZmedia
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
जबलपुर की दीनी, इल्मी और अदबी फ़िज़ा आज एक अज़ीम शख़्सियत से महरूम हो गई। मशहूर आलिम-ए-दीन, अज़ीमुश्शान मुकर्रिर, उर्दू अदब के कद्रदान, तसव्वुफ़ के रहनुमा और BAZmedia के सरपरस्त मौलवी रियाज़ आलम मुहम्मदी (रियाज़ मौलाना) अपने ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिले। उनके इंतक़ाल की ख़बर फैलते ही शहर के दीनी, इल्मी, अदबी और समाजी हल्क़ों में ग़म की लहर दौड़ गई। हर आँख अश्कबार है और हर ज़बान उनकी मग़फ़िरत की दुआ कर रही है।
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मौलवी रियाज़ आलम मुहम्मदी (रियाज़ मौलाना) .. मरहूम, हाजी खुर्शीद अहमद लाला के फ़र्ज़ंद, मरहूम सरफ़राज़ अहमद और मरहूम इसरार अहमद के भाई, डॉ. इरशाद और अशफ़ाक अहमद के भाई, तथा एजाज़ आलम मुहम्मदी और मिनहाज आलम के वालिद थे। उनके इंतक़ाल से न सिर्फ़ उनका ख़ानदान, बल्कि उनके शागिर्द, अहबाब, मुतअल्लिक़ीन और तमाम चाहने वाले गहरे सदमे में हैं।
मरहूम की मय्यत आज, 15 जुलाई 2026, नमाज़-ए-ईशा के बाद उनके मकान मुहम्मदी चौक, मोमिनपुरा तलैया, गोहलपुर से उठाई जाएगी। नमाज़-ए-जनाज़ा जामा मस्जिद मंडी (मदार टेकरी के सामने) में अदा की जाएगी, जिसके बाद मंडी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।
मौलाना रियाज़ आलम मुहम्मदी उन ख़ुशनसीब अफ़राद में शुमार किए जाते थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन-ए-मुहम्मदी की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी। इल्म उनके किरदार की ज़ीनत था, अख़लाक़ उनकी पहचान और ख़ुलूस उनकी सबसे बड़ी दौलत। उनकी तक़रीरों में कुरआन-ओ-सुन्नत की रोशनी, तसव्वुफ़ की मिठास और इंसानियत का पैग़ाम एक साथ नज़र आता था। वे जहाँ भी ख़िताब फ़रमाते, वहाँ सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि दिलों को बदल देने वाली नसीहतें बिखेरते थे।

मौलाना का इल्मी और रूहानी सफ़र महज़ मिम्बर तक महदूद नहीं था। उन्होंने खानकाही निज़ाम और तसव्वुफ़ की अस्ल रूह को आम लोगों, ख़ास तौर पर नौजवानों तक पहुँचाने को अपनी ज़िम्मेदारी समझा। उनका मानना था कि अगर नई नस्ल अपने अख़लाक़, अपनी तहज़ीब और अपने अस्लाफ़ की विरासत से जुड़ जाए, तो समाज में मोहब्बत, अमन और भाईचारा अपने आप क़ायम हो जाएगा। यही वजह है कि उनकी मजालिस और तक़रीरें हर तबक़े के लोगों में मक़बूल थीं।
उर्दू ज़बान और अदब से उनकी मोहब्बत किसी से पोशीदा नहीं थी। वे उर्दू को महज़ एक ज़बान नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब और शिनाख़्त का अहम हिस्सा क़रार देते थे। उन्होंने अदबी महफ़िलों, दीनी इजलासों और समाजी मंचों के ज़रिए उर्दू की ख़िदमत की और नई नस्ल को इसकी अहमियत से आगाह किया।
BAZmedia के साथ उनका रिश्ता सिर्फ़ सरपरस्ती का नहीं, बल्कि मुहब्बत, रहनुमाई और दुआओं का रिश्ता था। BAZmedia के दफ़्तर का इफ़्तिताह (उद्घाटन) भी उनके मुबारक हाथों से हुआ था। उस मौक़े पर उन्होंने सिर्फ़ एक इदारे की बुनियाद नहीं रखी थी, बल्कि सच्ची सहाफ़त, समाजी ज़िम्मेदारी और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ के उस सफ़र के लिए दुआ की थी, जिस पर आज BAZmedia गामज़न है। उनकी रहनुमाई और हौसला-अफ़ज़ाई इस इदारे का हमेशा क़ीमती सरमाया रहेगी।
BAZmedia अपने सरपरस्त, मुहसिन और रहनुमा को पुरसा-ए-अक़ीदत पेश करता है और बारगाह-ए-इलाही में दुआगो है कि अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान, अहबाब, शागिर्दों और चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।



