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Jabalpur

42 साल से मोहब्बत और भाईचारे की मिसाल बना लंगर-ए-आम, पप्पू वसीम खान निभा रहे वालिद की विरासत

रिपोर्ट: अरशद क़ादरी, बाज़ मीडिया, जबलपुर। ऐसे दौर में, जब छोटी-छोटी बातों पर समाज को बांटने की कोशिशें देखने को मिलती हैं, वहीं जबलपुर का नया मोहल्ला हर साल एक अलग तस्वीर पेश करता है। यहां मुहर्रम के मौके पर वरिष्ठ समाजसेवी पप्पू वसीम खान द्वारा आयोजित होने वाला जश्ने मौला हुसैन और लंगर-ए-आम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इंसानियत, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीती-जागती मिसाल बन चुका है।

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इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि यहां सिर्फ मुस्लिम समाज ही नहीं, बल्कि हिंदू, सिख और अन्य समुदायों के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचकर लंगर में शिरकत करते हैं। एक ही दस्तरख्वान पर बैठकर भोजन करना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव दिखाना इस आयोजन की पहचान बन गया है।

बाज़ मीडिया जबलपुर की टीम जब नया मोहल्ला स्थित बंद कुआं परिसर पहुंची तो वहां सुबह से ही अकीदतमंदों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। कार्यक्रम का आगाज़ कुरआनख्वानी और नज़र-ओ-नियाज़ से हुआ। इसके बाद हजारों लोगों के लिए लंगर-ए-आम का इंतज़ाम किया गया, जिसमें महिलाओं, बच्चों, बुज़ुर्गों और नौजवानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

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बाज़ मीडिया से बातचीत में वरिष्ठ समाजसेवी पप्पू वसीम खान ने बताया कि इस रिवायत की शुरुआत करीब 42 वर्ष पहले उनके वालिद मरहूम अलीम खान ने की थी। उन्होंने कहा कि परिवार ने इसे केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ाया है। आज भी उसी अकीदत और खिदमत के जज़्बे के साथ यह सिलसिला लगातार जारी है।

पप्पू वसीम खान ने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पैग़ाम इंसाफ़, इंसानियत, सब्र और कुर्बानी का पैग़ाम है। लंगर-ए-आम का मकसद केवल लोगों को भोजन कराना नहीं, बल्कि यह संदेश देना है कि समाज की असली ताकत मोहब्बत, बराबरी और इंसानियत में है।

आयोजन के दौरान बाज़ मीडिया ने देखा कि पूरे परिसर में अमन, एहतराम और भाईचारे का माहौल था। अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठे दिखाई दिए। यह दृश्य उस साझा संस्कृति की याद दिलाता है, जिसके लिए जबलपुर लंबे समय से जाना जाता रहा है।

कार्यक्रम में शहर के जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों और वरिष्ठ नागरिकों का भी फूल-मालाओं से स्वागत किया गया। बड़ी संख्या में लोगों ने आयोजन समिति के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने वाली पहल बताया।

समापन अवसर पर जावेद खान, नजीब खान, इम्तियाज़ पटेल, आमीन भाई और जुनैद खान ने सभी मेहमानों, सहयोगियों और आयोजन को सफल बनाने वाले स्वयंसेवकों का आभार व्यक्त किया।

वरिष्ठ समाजसेवी पप्पू वसीम खान ने कहा कि जब तक यह रिवायत ज़िंदा रहेगी, तब तक मोहब्बत, इंसानियत और गंगा-जमुनी तहज़ीब का यह पैग़ाम भी लोगों तक पहुंचता रहेगा। उनके अनुसार, मुहर्रम केवल ग़म का महीना नहीं, बल्कि इंसाफ़, इंसानियत और एक-दूसरे के दुख-दर्द में साथ खड़े होने का भी संदेश देता है।

जबलपुर में पिछले चार दशकों से लगातार आयोजित हो रहा यह लंगर-ए-आम इस बात की मिसाल है कि समाज को जोड़ने वाले छोटे-छोटे प्रयास भी समय के साथ बड़ी विरासत बन जाते हैं। और इस विरासत को आ

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बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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