Jabalpur

रद्दी चौकी का “हुड़दंग” बंद करो! पूरी रात बम और DJ! बढ़ती आवारागर्दी से मुस्लिम समाज चिंतित

जबलपुर। ईद मिलादुन्नबी मुसलमानों के लिए सिर्फ खुशी का दिन नहीं, बल्कि अपने प्यारे नबी हजरत मोहम्मद ﷺ की विलादत, उनकी सीरत और उनकी तालीम को याद करने का दिन है। इस मौके पर दुनिया भर में मुसलमान अपने नबी ﷺ से मोहब्बत का इजहार करते हैं।

जबलपुर में भी ईद मिलादुन्नबी बड़े पैमाने पर अकीदत और धार्मिक उत्साह के साथ मनाई जाती है। शहर में जुलूस-ए-मोहम्मदी निकलता है, मस्जिदों और मदरसों में कार्यक्रम होते हैं, नात-ए-पाक पढ़ी जाती है, कुरआन की तिलावत होती है और उलमा-ए-किराम सीरत-ए-नबी ﷺ बयान करते हैं।

लेकिन इसी बीच रद्दी चौकी चौराहे पर ईद मिलादुन्नबी की रात होने वाले एक खास तरह के जश्न को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं।

स्थानीय लोगों की ओर से सामने आई जानकारी के मुताबिक, रद्दी चौकी चौराहे पर रात करीब 12:01 बजे से नौजवानों का जमा होना शुरू हो जाता है और इसके बाद घंटों तक बमबाजी, तेज आवाज, चीख-पुकार, बड़े-बड़े झंडों और हाई-साउंड डीजे के साथ जश्न चलता रहता है।

स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि यह सिलसिला सुबह करीब 10-11 बजे तक जारी रहता है।

मुस्लिम समाज में जिस तरह की चिंता सामने आ रही है, उसने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या ईद मिलादुन्नबी की खुशी मनाने का यह तरीका सही है?

रद्दी चौकी के आसपास अस्पताल और नर्सिंग होम

इस मामले को गंभीर बनाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि रद्दी चौकी चौराहे के आसपास कई अस्पताल और नर्सिंग होम बताए जाते हैं।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, मुख्य रद्दी चौकी चौराहे से कुछ ही कदम की दूरी पर Sunrise Hospital है। उसके ठीक बाजू में Vidhan Hospital बताया जाता है।

चौराहे की दूसरी तरफ Dr Maksuda Ansari Memorial का Nursing Home है और उसके ठीक बाजू में Aadarsh Nursing Home बताया जाता है, जहां बच्चों की डिलीवरी भी होती है।

वहीं रद्दी चौकी चौराहे की अगली तरफ Saif Nagar की ओर कुछ दूरी पर Dr. Shama Chaudhary का अस्पताल बताया जाता है, जहां भी प्रसव होते हैं।

अब सवाल यह है कि इन अस्पतालों और नर्सिंग होम के आसपास अगर रातभर तेज आवाज में बम फोड़े जाएं, डीजे बजता रहे और शोर-शराबा चलता रहे, तो अंदर भर्ती मरीजों की हालत क्या होती होगी?

सोचिए, अस्पताल के अंदर क्या होता होगा?

किसी अस्पताल में कोई गंभीर मरीज भर्ती हो सकता है।

कोई बुजुर्ग इलाज करा रहा हो सकता है।

किसी मरीज को डॉक्टर ने आराम की सलाह दी हो सकती है।

किसी परिवार का सदस्य अपने मरीज के पास रातभर बैठा हो सकता है।

और उसी समय अस्पताल के बाहर लगातार तेज धमाकों की आवाज आ रही हो।

क्या उस मरीज को सुकून मिल पाएगा?

क्या वह आराम कर पाएगा?

क्या उसके परिवार वाले चैन से बैठ पाएंगे?

यह सवाल सिर्फ किसी एक समुदाय या किसी एक इलाके का नहीं है।

यह इंसानियत का सवाल है।

सबसे संवेदनशील सवाल—नवजात बच्चों और मांओं का

इससे भी ज्यादा गंभीर सवाल उन नर्सिंग होम को लेकर है, जहां महिलाओं की डिलीवरी होती है।

जब कोई महिला प्रसव पीड़ा में होती है, उस वक्त उसे सुकून और देखभाल की जरूरत होती है।

और जब एक बच्चा पैदा होता है, तब वह बच्चा बेहद संवेदनशील अवस्था में होता है।

ऐसे में अगर नर्सिंग होम के बाहर तेज धमाकों और डीजे का शोर हो तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसका क्या असर होता होगा?

एक मां के बारे में सोचिए…

जो अपने बच्चे को जन्म दे रही है।

एक नवजात बच्चे के बारे में सोचिए…

जो अभी-अभी इस दुनिया में आया है।

और ठीक उसी समय बाहर लगातार तेज आवाज हो।

क्या हमारी खुशी में इन मांओं और बच्चों के लिए थोड़ी सी जगह नहीं होनी चाहिए?

जबलपुर में मिलाद का शालीन और खूबसूरत तरीका

जबलपुर की खास बात यह है कि यहां ईद मिलादुन्नबी का जश्न बड़े पैमाने पर बहुत ही शालीन और धार्मिक तरीके से मनाया जाता है।

दोपहर में जोहर की नमाज के बाद हुजूर मुफ्ती-ए-आज़म की कयादत में जुलूस-ए-मोहम्मदी निकलता है।

जुलूस में शामिल लोगों के सिर पर टोपियां होती हैं।

निगाहें नीचे होती हैं।

दरूद-ओ-सलाम पढ़ा जाता है।

नात-ए-पाक पढ़ी जाती है।

और जुलूस शहर के अलग-अलग रास्तों से होता हुआ अंजुमन इस्लामिया पहुंचता है।

वहां जलसा-ए-सीरतुन्नबी आयोजित होता है।

उलमा-ए-किराम हुजूर नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत-ए-मुबारक बयान करते हैं।

लोग सुनते हैं।

नबी ﷺ की जिंदगी को समझते हैं।

उनकी सुन्नत और उनके अखलाक के बारे में सीखते हैं।

यानी यहां जश्न भी है, मोहब्बत भी है, दरूद-ओ-सलाम भी है और दीन की बात भी है।

सिर्फ एक दिन नहीं, पूरे रबीउल अव्वल में कार्यक्रम

जबलपुर में ईद मिलादुन्नबी का माहौल सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रहता।

शहर के अलग-अलग इलाकों में स्थानीय कमेटियों और मदरसों की ओर से रबीउल अव्वल के दिनों में लगातार कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

कई जगह 1 रबीउल अव्वल से 12 रबीउल अव्वल तक कार्यक्रमों का सिलसिला चलता है।

इनमें नात-ए-पाक होती है।

कुरआन की तिलावत होती है।

और उलमा-ए-किराम सीरत-ए-नबी ﷺ पर बयान करते हैं।

युवाओं और बच्चों को नबी ﷺ की जिंदगी के बारे में बताया जाता है।

यानी मिलाद का एक ऐसा रास्ता भी है जिसमें खुशी के साथ इल्म है, दीन है और सीरत है।

फिर रद्दी चौकी में इतना शोर क्यों?

यही सवाल अब मुस्लिम समाज के लोग पूछ रहे हैं।

जब शहर में इतने बड़े पैमाने पर मिलाद शालीनता के साथ मनाया जा सकता है…

जब हजारों लोग दरूद-ओ-सलाम पढ़ते हुए जुलूस निकाल सकते हैं…

जब कई दिनों तक नात और सीरत के कार्यक्रम हो सकते हैं…

तो फिर एक चौराहे पर रातभर बमबाजी और हाई-साउंड डीजे क्यों?

क्या यह तरीका वास्तव में ईद मिलादुन्नबी की खूबसूरती को बढ़ाता है?

या इससे मिलाद के जश्न पर ही सवाल खड़े होते हैं?

हर मकतब-ए-फिक्र के लोगों में चिंता

मुस्लिम समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि रद्दी चौकी में होने वाले इस तरह के हुड़दंग को लेकर किसी एक मकतब-ए-फिक्र के लोग ही नहीं, बल्कि अलग-अलग मकतब-ए-फिक्र के उलमा और धार्मिक लोग भी फिक्रमंद हैं।

क्योंकि मामला किसी एक जमात या संगठन का नहीं है।

मामला यह है कि धार्मिक जश्न के नाम पर ऐसा कुछ न हो जिससे दूसरे इंसान को तकलीफ पहुंचे।

इस्लाम हमें खुशी मनाने से नहीं रोकता।

लेकिन इस्लाम हमें दूसरों को तकलीफ देने की इजाजत भी नहीं देता।

मुफ्ती-ए-आज़म भी कर चुके हैं ऐसी हरकतों से मनाही

जबलपुर के मुफ्ती-ए-आज़म हजरत मौलाना फौशाहिद रजा कादरी भी इस तरह की गतिविधियों पर मनाही फरमा चुके हैं।

बम फोड़ना।

बहुत तेज डीजे बजाना।

चौराहों और रास्तों को लंबे समय तक ब्लॉक करना।

और आम लोगों के लिए परेशानी पैदा करना।

इन सबको लेकर धार्मिक स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं।

तमाम मकतब-ए-फिक्र के उलमा-ए-किराम की ओर से भी यह बात कही जाती रही है कि खुशी के नाम पर किसी इंसान को तकलीफ देना या सार्वजनिक रास्ते को बाधित करना उचित नहीं है।

ऐसे में सवाल है कि जब दीन के जानकार लोग इस तरह की हरकतों से बचने की बात कह चुके हैं, तो फिर यह सिलसिला हर साल क्यों दोहराया जाता है?

सिर्फ रोकना नहीं, नौजवानों को समझाना भी होगा

इस मामले में सिर्फ प्रशासन से कार्रवाई की मांग करना काफी नहीं होगा।

समाज के जिम्मेदार लोगों को भी आगे आना होगा।

मुफ्ती-ए-आज़म।

उलमा-ए-किराम।

मस्जिदों के इमाम।

मदरसों के जिम्मेदार लोग।

मुस्लिम समाज के बुजुर्ग।

और स्थानीय कमेटियां।

सभी को मिलकर नौजवानों से बात करनी होगी।

उन्हें समझाना होगा कि जश्न मनाइए, लेकिन ऐसा जश्न मनाइए जो नबी ﷺ की सीरत के करीब हो।

ऐसा जश्न जिसमें दरूद हो।

नात हो।

सीरत हो।

इल्म हो।

और लोगों के लिए रहमत हो।

प्रशासन के साथ भी बने व्यवस्था

इसके साथ जिला प्रशासन और पुलिस के साथ बैठकर एक स्पष्ट व्यवस्था बनाने की जरूरत है।

जुलूस के रास्ते पहले से तय हों।

समय तय हो।

ध्वनि की सीमा का पालन हो।

अस्पतालों और नर्सिंग होम के आसपास खास सावधानी रखी जाए।

चौराहों को लंबे समय तक बंद न किया जाए।

और ऐसी किसी गतिविधि की इजाजत न हो जिससे मरीजों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों या आम नागरिकों को परेशानी हो।

यह व्यवस्था सिर्फ ईद मिलादुन्नबी के लिए नहीं, बल्कि हर धार्मिक आयोजन के लिए एक अच्छी मिसाल बन सकती है।

सवाल बहुत सीधा है—मिलाद कैसे मनाएं?

मिलाद मनाना है?

बिल्कुल मनाइए।

नबी ﷺ की मोहब्बत में जश्न मनाइए।

नात पढ़िए।

दरूद-ओ-सलाम पढ़िए।

सीरत सुनिए।

अपने बच्चों को नबी ﷺ की जिंदगी के बारे में बताइए।

लेकिन सवाल यह है—

जश्न कैसा हो?

बम की आवाज वाला?

या दरूद-ओ-सलाम की आवाज वाला?

हुड़दंग वाला?

या सीरत वाला?

ऐसा जश्न जिसमें चौराहा घंटों बंद हो?

या ऐसा जश्न जिसमें लोगों के दिल खुलें?

ऐसा जश्न जिसमें मरीज परेशान हों?

या ऐसा जश्न जिसमें मरीजों के लिए भी रहमत हो?

क्योंकि हमारे नबी ﷺ रहमत बनकर आए।

तो हमारी खुशी में भी रहमत नजर आनी चाहिए।

हमारे जश्न में भी अदब नजर आना चाहिए।

हमारे व्यवहार में भी सुन्नत नजर आनी चाहिए।

जश्न ऐसा होना चाहिए जिससे किसी दूसरे इंसान को तकलीफ नहीं, बल्कि सुकून मिले।

रद्दी चौकी का सवाल सिर्फ रद्दी चौकी का सवाल नहीं है।

यह पूरे जबलपुर के मुस्लिम समाज के सामने एक सवाल है—

हम आने वाली नस्लों को मिलाद का कौन सा तरीका सिखाना चाहते हैं?

हुड़दंग का?

या मोहब्बत का?

फैसला हम सबको मिलकर करना है।

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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