Jabalpur

मोमिन ईदगाह कांड की पहली बरसी: जब ताकत के ज़ोर पर ईदगाह में लागू की गई अंजुमन मढ़ाताल की व्यवस्था

BAZ Media Jabalpur Division: ठीक एक साल पहले आज ही के दिन 13 अक्टूबर 2025 को गोहलपुर की मोमिन ईदगाह में ऐसा विवाद हुआ, जिसने पूरे प्रदेश और देश का ध्यान खींचा। मुस्लिम भाजपा कार्यकर्ताओं और अंसारी समाज के नेताओं के बीच महीनों से चली आ रही ईदगाह कमेटी और उसके संचालन पर कब्जे की जंग ने बड़ा रूप ले लिया। ईदगाह पुलिस छावनी बन गई, एक दर्जन से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए और मुस्लिम युवकों ने ईदगाह के ताले तोड़ दिए। देश और प्रदेश की मीडिया में ईदगाह को लेकर नकारात्मक खबरें चलीं। इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ शहर, बल्कि मुस्लिम समाज के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए। अंत में जीत भाजपा कार्यकर्ताओं की हुई, चूंकि सत्ता उनके साथ थी।

13 अक्टूबर 2025 सिर्फ मोमिन ईदगाह गोहलपुर में कमेटी परिवर्तन का दिन नहीं था। यह दिन करीब 1930 से चली आ रही व्यवस्था के परिवर्तन का दिन था। जिसके बाद ईदगाह गोहलपुर में अंजुमन मढ़ाताल वाली व्यवस्था लागू होती दिखी।

अब हर कोई मानता है कि ईदगाह की अगली कमेटी समाज तय नहीं करेगा, राजनीतिक दल तय करेंगे। अंजुमन की तरह प्रदेश में जिसकी सरकार होगी, उसके कार्यकर्ताओं की कमेटी आ जाएगी। जिसकी सरकार जाएगी, उसके कार्यकर्ताओं की कमेटी चली जाएगी।

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13 अक्टूबर 2025 एक दुखद दिन था.. जब तारीखी ईदगाह की इज्जत मुसलमानों की आपसी लड़ाई में दागदार हो गई।

कहते हैं, इतिहास अपने आपको तब तक दोहराता है, जब तक उससे सबक हासिल न किया जाए। ईदगाह कांड से मुस्लिम समाज ने सबक सीखना तो दूर, यह भी मानने से इनकार कर दिया है कि जो हुआ, जिस तरह हुआ, वह गलत था। इसीलिए यह डर बरकरार है कि फिर किसी बड़ी वक्फ संपत्ति में यह पैटर्न रिपीट होगा। वह pattern है, पुरानी व्यवस्था की कमियों को ढाल बनाओ और किसी ताकतवर नेता का संरक्षण लेकर पूरी committee पलटाकर वक्फ संस्था का संचालन अपने हाथ में ले लो।

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गोहलपुर ईदगाह कांड का जिम्मेदार सिर्फ कोई एक चेहरा नहीं है, कई लोग हैं और शायद पूरा समाज है।

  • ईदगाह कांड ‘नई कमेटी’ की सत्ता के दम पर किसी भी वक्फ का संचालन छीन लेना अपना हक समझने की नीति का नतीजा है।
  • ईदगाह कांड, पुरानी कमेटी और उसके एक बुजुर्ग की अक्खड़ नीतियों और उनकी दसियों साल चली बंद कमरे की कार्यशैली का नतीजा है।
  • ईदगाह कांड तब हुआ, जब ईदगाह पर मुसीबत आई और ईदगाह की पुरानी कमेटी पीठ दिखाकर भाग गई। जिसके नतीजे में ईदगाह की व्यवस्था बदल गई और ईदगाह समाज के हाथों से निकलकर भाजपा कार्यकर्ताओं के हाथों में चली गई।
  • ईदगाह कांड मौजूदा ‘अंसारी समाजी पंचायत कमेटी और समाज के लाखों अंसारियों के बीच कमजोर होते रिश्ते का नतीजा है। जिसका नतीजा था कि अंसारी समाज की मर्कजी पंचायत के बार-बार बुलाने पर भी आम अंसारी ईदगाह को बचाने में नहीं आया।
  • ईदगाह कांड क्षेत्रीय नेताओं की श्रेयबाजी की राजनीति का नतीजा है, जिसके चलते ईदगाह आंदोलन कुछ नेताओं की जागीर बन गया और समाज ने उससे दूरी बना ली।।

इन सब बातों से मिलकर वो हुआ, जो दर्दनाक याद के तौर पर हम सबके सामने है। समाज की ईदगाह, बुजुर्गों की ईदगाह, उसका सीधा control समाज के हाथों से निकलकर सीधे-सीधे राजनीतिक पार्टियों के हाथों में चला गया।

13 अक्टूबर 2025 को क्या हुआ था…

अंसार समाज के बुजुर्गों ने करीब एक सदी पहले मोमिन ईदगाह बनाई थी। यह ईदगाह समाज की इज्जत, खुद्दारी और पसमांदा आंदोलन की यादों से जुड़ी थी। जब ईदगाह बनी, तब जो संचालन व्यवस्था बनी, वही आगे बढ़ी। नए लोग आते गए, पुराने जाते गए, व्यवस्था अंसारी समाज के हाथों में रही।

जब 90 के दशक में वक्फ कानून में संशोधन के बाद संस्था वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड हुई, उसके बाद भी स्थानीय स्तर पर ही कमेटी बनती और वक्फ बोर्ड में भेज दी जाती थी। पिछली बार भी पुरानी कमेटी का कार्यकाल पूरा होने के बाद नई कमेटी बनाकर अप्रूवल के लिए वक्फ बोर्ड भेजी गई।

लेकिन इस बीच एक भाजपा नेता ने वक्फ बोर्ड में अपनी पैठ का फायदा उठाते हुए एक भाजपा कार्यकर्ता की अध्यक्षता वाली कमेटी को ईदगाह की नई कमेटी बनवा लिया। इस कमेटी में अधिकांश सदस्य भाजपा कार्यकर्ता थे।

नई कमेटी को चार्ज देने के बजाय पुरानी कमेटी ने अंसार समाज सातों की पंचायत को ईदगाह का संचालन के कागज़ और सभी दस्तावेज सौंप दिए। अंसार समाज सातों की कमेटी ने मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी बनाई, जिसके जिम्मे आगे की कार्यवाही सौंपी गई।

मजबूत पॉलिटिकल बैकअप की वजह से भाजपा कार्यकर्ताओं वाली कमेटी को हटाना पूरी मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। इस दौरान कई आंदोलन और प्रदर्शन हुए, जो अंत में विफल रहे।

आखिरकार नई कमेटी ने जिला प्रशासन में गुहार लगाई। चूंकि कानूनी और तकनीकी तौर पर वह सही थी, जिला प्रशासन ने नियम अनुसार कई बार नोटिस भेजे कि पुरानी कमेटी वक्फ बोर्ड द्वारा अधिकृत नई कमेटी को चार्ज दे, लेकिन चार्ज नहीं दिया गया। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को भारी पुलिस बल और प्रशासन की मौजूदगी में चार्ज दिलाने की प्रक्रिया हुई। मोमिन ईदगाह एक्शन कमेटी के सदस्यों ने विरोध किया। प्रदर्शन उग्र होने लगा, जिसके बाद अंसार समाज के अध्यक्ष (सरदार) सहित एक दर्जन से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। फिर एक लड़के ने हथौड़ा लाकर ईदगाह का ताला तोड़ा.. अधिकारियों ने नई कमेटी को चार्ज सौंप दिया गया, जो आज ईदगाह का संचालन देख रही है।

प्रशासन और police का रवैया क्या था?

अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि पिछले साल मोमिन ईदगाह गोहलपुर में जो कुछ हुआ, उसे अंजाम देने वाले, उसमें शामिल रहने वाले, सब कुछ होते हुए देखने वाले और उसका नुकसान झेलने वाले—सभी पक्ष मुसलमान ही थे।

पिछले साल करीब 6 महीने तक चले इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस-प्रशासन का रवैया संयमित और संतुलित रहा। आसान भाषा में कहें तो प्रशासन इस मामले में आखिर समय तक हस्तक्षेप करने से बचना चाहता था। लेकिन जब नियमों की मजबूरी के तहत हस्तक्षेप करना ज़रूरी हो गया, तब भी प्रशासन ने अपना रवैया संयमित और संतुलित बनाए रखा।

ईदगाह कांड के 4 प्रमुख बिंदु…

1. यह कमेटी नहीं, व्यवस्था परिवर्तन था…

पहली और सबसे बुनियादी बात, जो ईदगाह के मामले को ईदगाह कांड (ऐतिहासिक घटना) में बदलती है, वह यह है कि यह कमेटी परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन था। पुरानी व्यवस्था यह थी कि 1930 से चली आ रही परंपरा के अनुसार समाज के बीच से कमेटी बनती थी, जिसे वक्फ बोर्ड भेजकर अप्रूव कराया जाता था। नई व्यवस्था यह है कि अब अंजुमन की तर्ज पर जिसकी सरकार, उसकी कमेटी का सिद्धांत चलेगा। जिसकी सरकार होगी, उसके कार्यकर्ता सीधे वक्फ बोर्ड से कमेटी बनाकर लाएंगे। वे भोपाल को जवाबदेह होंगे, समाज की कोई भूमिका अब नहीं रहेगी। यही सबसे दर्दनाक नुकसान है, जो आज तक समाज को समझ में नहीं आया, लेकिन इसके नुकसान धीरे-धीरे खुलेंगे और सामने आएंगे।

2. पुरानी कमेटी की बेशर्म खामोशी

पुरानी कमेटी की सबसे बड़ी कमी यही रही कि पिछले 3–4 साल से गोहलपुर के कुछ लड़के ईदगाह में गबन के आरोप लगा रहे थे। किराये की रकम को लेकर सवाल उठ रहे थे और रजिस्ट्री में नाम को लेकर भी विवाद था। लेकिन पुरानी कमेटी ने कभी समाज को इन सवालों का जवाब नहीं दिया।

धीरे-धीरे मामला बढ़ता गया। ईदगाह को लेकर अखबारों में खबरें छपने लगीं और पूरे जिले व प्रदेश में ईदगाह की बदनामी होने लगी। लेकिन पुरानी committee खामोश बैठी रही। समाज में सामने आकर जवाब देना या ईदगाह का पक्ष रखना जरूरी नहीं समझा। जिसका लाज़मन नतीजा था समाज के बीच यह राय बनने लगी कि ईदगाह में कुछ गड़बड़ जरूर है। लेकिन पुरानी कमेटी ने न तो खुलकर अपना पक्ष रखा और न ही आरोपों पर कोई स्पष्ट जवाब दिया।

हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा ईदगाह विवाद हो गया, गिरफ्तारियां हुईं, ताले टूटे और मामला देश-प्रदेश की मीडिया तक पहुंच गया, लेकिन आज तक पुरानी कमेटी ने सामने आकर समाज के सामने अपना पक्ष रखना जरूरी नहीं समझा। जिन आरोपों के बीच यह पूरा घटनाक्रम खड़ा हुआ, उन पर समाज को आज भी स्पष्ट जवाब का इंतजार है।

3. पुरानी कमेटी का भाग खड़े होना

आधिकारिक तौर पर इस पूरे मामले में पुरानी कमेटी ही मुख्य पक्ष थी। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने बड़े नेताओं से संपर्क और सियासी जोड़तोड़ के जरिए कमेटी ताकत के दम पर छीन ली, तब पुरानी कमेटी ने समाज और मीडिया के सामने आकर अपना पक्ष रखने के बजाय खामोशी ओढ़ ली।

एक तरफ नई कमेटी के जिम्मेदार लोग सामने आकर अपनी बात रख रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पुरानी कमेटी के पदाधिकारी सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने से बचते नजर आए। ईदगाह के दस्तावेज अंसार समाज की सात सदस्यीय कमेटी को सौंपकर पुरानी कमेटी के पदाधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

इस पूरे घटनाक्रम में पुरानी कमेटी की यही चुप्पी एक बड़ी वजह बनी कि समाज के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति संदेह बना रहा। जब एक पक्ष लगातार सामने आकर अपनी बात रख रहा हो और दूसरा पक्ष खामोश रहे, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसी पूरे घटनाक्रम का नतीजा था कि 13 अक्टूबर 2025 का वह दिन आया, जिसे मुस्लिम समाज के इतिहास में एक दुखद दिन के रूप में याद किया जाएगा।

4. पूरे विरोध का राजनीतिकरण होना

मोमिन ईदगाह की पुरानी कमेटी ने ईदगाह से जुड़े दस्तावेज अंसार समाज की मरकज़ी पंचायत और समाज के सरदार को सौंप दिए। इसके बाद मरकज़ी पंचायत और समाज के प्रमुख लोगों की बैठक हुई, जिसमें एक ईदगाह एक्शन कमेटी बनाई गई।

इस एक्शन कमेटी के सामने तीन बड़ी जिम्मेदारियां थीं—ईदगाह की पुरानी व्यवस्था को बचाए रखने की कोशिश करना, समाज को एकजुट करना और ईदगाह के मामले में पुरानी व्यवस्था व अंसार समाज के सरदारों का पक्ष समाज तक पहुंचाना। लोगों को बताना था कि पूरा मामला क्या है, पुरानी व्यवस्था के पक्ष में क्या तर्क हैं और उठाए जा रहे सवालों पर उनका क्या जवाब है।

लेकिन इस पूरे आंदोलन का राजनीतिकरण हो गया।

यहीं से आंदोलन की दिशा बदलने लगी। यह मूल रूप से समाजी मसला था, इसलिए इसकी अगुवाई समाज के जिम्मेदार लोगों को करनी चाहिए थी। समाजी चेहरों को सवालों के जवाब देने चाहिए थे और समाज को भरोसे में लेना चाहिए था। इससे लोगों को पूरे मामले को समझने का मौका मिलता, लोग समझते भरोसा करते और आंदोलन को सामाजिक समर्थन मिल सकता था।

इसके बजाय कांग्रेस नेताओं को आगे कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन की पहचान ईदगाह और अंसार समाज के मसले के बजाय कांग्रेस नेताओं के आंदोलन के रूप में बनने लगी। दूर से देखने वाले लोगों को यही लगा कि यह भाजपा बनाम कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई है। समाज के बड़े हिस्से ने इसे सियासी विवाद समझा और आंदोलन से दूरी बना ली।

इसके बाद आंदोलन पर 2 नेताओं का हावी हो गए। इससे स्थिति और बिगड़ी। आंदोलन न तो पूरे मुस्लिम समाज को अपने साथ जोड़ पाया और न ही कांग्रेस के भीतर ही एकजुटता पैदा कर सका। हालत यह हुई कि जब 13 अक्टूबर 2025 को ईदगाह पर बलपूर्वक कब्ज़े की कोशिश हुई और राजनीतिक समर्थन की जरूरत थी, तब शहर कांग्रेस भी एकजुट होकर इसके साथ खड़ी नजर नहीं आई।

जिस मुद्दे पर पूरे समाज को एकजुट होना था, राजनीति और श्रेयबाज़ी में फंसकर रह गया। नतीजा यह हुआ कि समाज को जोड़ने, ईदगाह का पक्ष लोगों तक पहुंचाने और उनका भरोसा जीतने की असली कोशिश पीछे छूट गई। फिर 13 अक्टूबर 2025 को जो कुछ हुआ, वो एक दर्दनाक याद के रूप में सबके सामने है।


आखिरी बात..

13 अक्टूबर 2025 को जो हुआ, वह सिर्फ एक ईदगाह की कमेटी बदलने का मामला नहीं था। यह हमारी आंखें खोलने वाली घटना थी। एक तरफ करीब सौ साल पुरानी ईदगाह थी, दूसरी तरफ उसकी व्यवस्था को लेकर आपसी खींचतान। एक तरफ समाज की एकता का सवाल था, दूसरी तरफ सियासत, गुटबाजी और अपनी-अपनी जिद।

इस पूरे घटनाक्रम में किसी एक पक्ष को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। पुरानी कमेटी ने सवालों के जवाब नहीं दिए, नई कमेटी पर सत्ता के सहारे व्यवस्था हासिल करने के आरोप लगे, आंदोलन करने वाले समाज को एकजुट नहीं कर पाए और हम सब देखते रहे कि हमारी ईदगाह आपसी लड़ाई का मैदान बनती चली गई।

सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ कमेटी का बदलना नहीं था। नुकसान उस भरोसे का हुआ, जो समाज और उसकी संस्थाओं के बीच होना चाहिए। नुकसान उस परंपरा का हुआ, जिसे अगली पीढ़ियों तक पहुंचना था। और नुकसान उस इज्जत का हुआ, जिसे हमारे बुजुर्गों ने अपनी मेहनत से बनाया था।

आज एक साल बाद सवाल यह नहीं है कि कौन जीत गया और कौन हार गया। असली सवाल यह है कि इस लड़ाई में हमारा समाज क्या हार गया? क्या हमने अपनी संस्थाओं को पारदर्शी बनाने का सबक सीखा? क्या हमने अपने मतभेद बातचीत से सुलझाना सीखा? क्या हमने यह समझा कि जब समाज के मामले राजनीतिक ताकत और गुटबाजी के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं, तो फैसले समाज के हाथ से निकल सकते हैं?

अगर एक साल बाद भी हम इन सवालों से बच रहे हैं, तो समझिए कि हमने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा।

मोमिन ईदगाह हमारे बुजुर्गों की विरासत है। यह किसी नेता, किसी कमेटी या किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं होनी चाहिए। इसकी व्यवस्था चाहे जिसके हाथ में हो, समाज को सवाल पूछने, हिसाब मांगने और अपने संस्थानों के भविष्य को लेकर अपनी आवाज उठाने का हक बना रहना चाहिए।

13 अक्टूबर 2025 को जो हुआ, उसे हम बदल नहीं सकते। लेकिन उससे सबक लेकर आने वाले कल को जरूर बदल सकते हैं।

वरना इतिहास खुद को फिर दोहराएगा। जगह कोई दूसरी होगी, संस्था कोई दूसरी होगी, चेहरे भी दूसरे होंगे—लेकिन कहानी वही होगी। पहले सवाल उठेंगे, फिर खामोशी छाएगी, फिर सियासत हावी होगी और आखिर में समाज अपने ही सामने बेबस खड़ा होगा।

ईदगाह कांड की पहली बरसी पर यही सवाल हर मुसलमान को खुद से पूछना चाहिए—क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को ऐसी ही विरासत सौंपना चाहते हैं, या फिर एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जो अपनी संस्थाओं की हिफाजत भी करे, अपने जिम्मेदारों से जवाब भी मांगे और अपने फैसले खुद लेने की ताकत भी रखे?

क्योंकि विरासत सिर्फ इमारतों से नहीं बचती। विरासत बचती है उसूलों से, जवाबदेही से और समाज की एकता से।

Jabalpur Baz

बाज़ मीडिया जबलपुर डेस्क 'जबलपुर बाज़' आपको जबलपुर से जुडी हर ज़रूरी खबर पहुँचाने के लिए समर्पित है.
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