बुलडोज़र जस्टिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाएं की खारिज

नई दिल्ली | BAZ News Network (BNN) । सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र जस्टिस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की बेंच ने कहा कि नवंबर 2024 के ऐतिहासिक फैसले के कथित उल्लंघन की जांच हाई कोर्ट करेंगी, क्योंकि इसमें तथ्यों की पड़ताल जरूरी है।
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र जस्टिस पर अवमानना याचिकाएं हाई कोर्ट को ट्रांसफर कीं
- सीजेआई सूर्य कांत की बेंच ने कहा तथ्यों की विस्तृत जांच जरूरी
- गुजरात, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ढहाने के मामले शामिल
- नवंबर 2024 के फैसले में बिना नोटिस ढहाने पर रोक लगी थी
- अंतरिम सुरक्षा हाई कोर्ट के फैसले तक जारी रहेगी
हाई कोर्ट करेंगी बुलडोज़र जस्टिस की पड़ताल
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच — चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस वी मोहना — ने गुरुवार को फैसला सुनाया। बेंच ने कहा कि याचिकाओं में ऐसे विवादित तथ्य हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही नहीं हो सकती। अधिकारियों का कहना है कि ढहाने की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के बाद हुई, जबकि याचिकाकर्ता इसे फैसले का उल्लंघन बता रहे हैं।
कोर्ट ने सभी मामले संबंधित हाई कोर्ट को ट्रांसफर कर दिए। हाई कोर्ट रिकॉर्ड मांगेंगी, और जरूरत पड़ने पर जिला अदालतों से सबूत दर्ज करवाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने आरोपों की सच्चाई पर कोई राय नहीं दी है।
नवंबर 2024 का ऐतिहासिक फैसला क्या था
13 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र जस्टिस पर सख्त फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी आरोपी की संपत्ति को सजा के तौर पर ढहाना संविधान का उल्लंघन है। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए देशभर में सुरक्षा उपाय लागू किए गए। इनमें पहले नोटिस देना, सुनवाई का मौका देना और कानूनी प्रक्रिया अपनाना शामिल था। सिर्फ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण या आपातकाल में इसमें छूट थी।
फैसले में चेतावनी दी गई थी कि इन निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही, अनुशासनात्मक कार्रवाई और व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी। लेकिन नागरिक अधिकार समूहों, वकीलों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि खासतौर पर मुस्लिम परिवारों के मकान और संपत्तियां बिना प्रक्रिया के ढहाई जा रही हैं।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलीलें दीं
सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी ने गुजरात के सोमनाथ में मस्जिदों को ढहाने के मामले में पैरवी की। उन्होंने कहा कि हलफनामों से साफ है कि निर्देशों का खुला उल्लंघन हुआ है। सीनियर एडवोकेट चंदर उदय सिंह ने महाराष्ट्र के मामले में बताया कि कई राजनीतिक नेताओं ने बुलडोज़र चलाने की घोषणा पहले से कर दी थी, जो साबित करता है कि यह दंडात्मक कार्रवाई थी।
सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने एक मामले का जिक्र किया जहां फलों के जूस की दुकान को ढहाते समय एक टीवी एंकर बुलडोज़र के ऊपर बैठकर लाइव प्रसारण कर रहा था। हालांकि, सीजेआई सूर्य कांत ने कहा कि नवंबर 2024 के फैसले में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण जैसे अपवाद भी दिए गए थे। जहां अधिकारी इन अपवादों का हवाला दे रहे हैं, वहां तथ्यों की जांच जरूरी है।
जस्टिस बागची ने कहा, “यह फैसला इसलिए आया क्योंकि कोर्ट का विवेक झकझोर गया था। निर्दोष माने जाने के मूल सिद्धांत को नजरअंदाज किया जा रहा था।” उन्होंने साफ किया कि फैसले से अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं मिलता। “बुलडोज़र तब चलना चाहिए जब कानून का राज अधिकारियों और अवैध कब्जाधारियों की मिलीभगत से खत्म हो। लेकिन कानून लागू करने की आड़ में लोगों को चिन्हित नहीं किया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ करता है कि बुलडोज़र जस्टिस के मामलों में तथ्यों की गहरी जांच जरूरी है। अंतरिम सुरक्षा बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट को जिम्मेदारी सौंपना न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान है।
📌 Sources & References
- Live Law
- Maktoob Media



