
बेंगलुरु | 18 जुलाई 2025 | BAZ News Network (BNN) | BAZ Desk | Bazmedia.in
News in Short
- 2008 बेंगलुरु सीरियल ब्लास्ट केस के 31वें आरोपी अब्दुल खादर की जेल में मौत — 17 साल बाद भी फैसला नहीं आया था।
- 62 साल के खादर व्हीलचेयर पर थे, डायबिटीज और दूसरी बीमारियों से जूझ रहे थे — मेडिकल बेल बार-बार खारिज हुई।
- मौत से एक दिन पहले डॉक्टर ने लिखित चेतावनी दी थी, जेल अधिकारियों ने उसे रिसीव तक नहीं किया।
बेंगलुरु ब्लास्ट अंडरट्रायल अब्दुल खादर की शुक्रवार को पारप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल में मौत हो गई। 62 साल के खादर 2008 के बेंगलुरु सीरियल ब्लास्ट केस में 17 साल से जेल में बंद थे — और आखिरी फैसला आने से पहले ही दम तोड़ दिया।
बेंगलुरु ब्लास्ट अंडरट्रायल की मौत: कैसे गए 17 साल?
कर्नाटक के कोडागु जिले के रहने वाले अब्दुल खादर इस केस में 31वें आरोपी थे। उनके वकील एडवोकेट रहमान इरिक्कूर के मुताबिक ट्रायल पूरी हो चुकी थी, बहस भी खत्म हो गई थी — बस फैसले का इंतजार था। सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने पहले ट्रायल कोर्ट को 16 जुलाई तक फैसला सुनाने का निर्देश दिया था। अगर फैसला न आता तो खादर बेल के लिए अर्जी दे सकते थे। लेकिन 16 जुलाई से पहले ही उनकी मौत हो गई।
खादर डायबिटिक थे और कई बीमारियों से घिरे थे। पिछले कुछ महीनों में हालत इतनी बिगड़ी कि वे व्हीलचेयर पर आ गए। इसके बावजूद मेडिकल बेल की हर अर्जी रद्द होती रही। वकील का कहना है कि स्पेशलाइज्ड अस्पताल में इलाज की मांग की गई, लेकिन जेल अधिकारियों ने उन्हें जेल के अस्पताल में ही रखा।
डॉक्टर की चेतावनी, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं
एडवोकेट रहमान के मुताबिक खादर की मौत से एक दिन पहले एक डॉक्टर ने लिखित में जेल अधिकारियों को चेताया — कि मरीज की हालत बेहद गंभीर है, फौरी इलाज जरूरी है, और अगर कुछ हुआ तो जिम्मेदारी उन पर होगी। वकील का आरोप है कि वह चिट्ठी औपचारिक रूप से रिसीव तक नहीं की गई। मौत के बाद भी जेल अधिकारियों ने खादर को बाहरी अस्पताल भेजने में देरी की।
वकील ने कहा — “वे बस यह साबित करना चाहते थे कि वे बेकसूर हैं। वे हमेशा कहते थे कि 17 साल तो वापस नहीं आएंगे, लेकिन बरी होकर जाना चाहते हैं।”
SIO केरल के अध्यक्ष एडवोकेट अब्दुल वाहिद ने कहा कि खादर मीडिया ट्रायल की वजह से समाज में पूरी तरह अलग-थलग हो गए थे — और अब बिना तकनीकी रूप से बेगुनाही साबित किए कब्र में चले गए।
2008 ब्लास्ट केस: 17 साल बाद भी फैसला नहीं
25 जुलाई 2008 को बेंगलुरु में नौ कम तीव्रता के धमाके हुए थे। एक शख्स की मौत हुई, करीब 20 लोग जख्मी हुए। जांच एजेंसियों ने इंडियन मुजाहिदीन, SIMI और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया। अब करीब 18 साल बाद भी कई आरोपी बिना फैसले के जेल में हैं।
इस केस में केरल के नेता अब्दुल नासर मदनी भी आरोपी रहे — 2010 में गिरफ्तार हुए, फिर मेडिकल आधार पर बेल मिली। मदनी इससे पहले 1998 के कोयंबटूर ब्लास्ट केस में भी करीब एक दशक जेल में रहे थे और 2007 में बरी हुए थे।
खादर की मौत उन चिंताओं को फिर सामने लाती है जो UAPA और आतंकवाद से जुड़े मामलों में लंबे समय तक बंद रहने वाले अंडरट्रायल्स के बारे में उठती रही हैं। एक्टिविस्ट कंचन ननावरे और जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी — दोनों 2021 में जेल में मरे, दोनों की मेडिकल बेल बार-बार खारिज हुई थी।
अब्दुल खादर की मौत सिस्टम से एक सवाल छोड़ गई है — क्या बिना फैसले के सालों जेल में रखना खुद एक सजा नहीं है?
📌 Sources & References
- Maktoob Media
- Advocate Rahman Irikkur (Defense Lawyer)



