
दो मुस्लिम भाजपाइयों की लड़ाई में बदनाम होती शहर की सबसे बड़ी तालीमी संस्था
… अगर बीते एक साल की सुर्खियों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक दिखाई देती है। अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर लगातार ऐसी खबरें सामने आईं जिनमें अंजुमन इस्लामिया जबलपुर को विवादों के केंद्र में दिखाया गया। कभी कहा गया कि “अंजुमन में शरीया कानून चल रहा है”, कभी “इतवार की जगह जुमे की छुट्टी” को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया। कभी आरोप लगा कि “हिन्दू त्योहारों पर छुट्टी नहीं दी जाती”, तो कभी “बच्चों को तालीबानी सजा” देने जैसी बातें सुर्खियां बनीं। यहां तक कि यह तक प्रचारित किया गया कि “महापुरुषों की जयंती पर छुट्टी नहीं दी जाती” और संस्था संविधान से नहीं बल्कि वक्फ और शरीया कानून से संचालित होती है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि यह नैरेटिव किसी बाहरी संगठन या विरोधी विचारधारा ने नहीं गढ़ा। इन विवादों की जड़ में मुस्लिम समाज के ही दो मुस्लिम भाजपा नेताओं की निजी लड़ाई हैं । दो भाजपा नेताओं की निजी लड़ाई ने एक अजीम संस्था की 125 साल की पहचान को ही संकट में ला दिया हैं ।
जबलपुर के मुसलमानों के लिए अंजुमन इस्लामिया सिर्फ एक इदारा नहीं, बल्कि 125 साल की एक अमानत है। यह वह नाम है जिससे हजारों घरों की यादें, तालीम और पहचान जुड़ी हुई है। लेकिन आज पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि किसी बाहरी हमले से नहीं, बल्कि अपनों की लड़ाई से इस विरासत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है। दर्द विवादों का नहीं है, दर्द इस बात का है कि दो मुस्लिम भाजपा नेताओं की व्यक्तिगत और सियासी लड़ाई में 125 साल पुरानी इस संस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।
अगर आज भी इन दो मुस्लिम भाजपा नेताओं की निजी लड़ाई का हल नहीं निकला, तो कल अंजुमन की स्थाई पहचान क्या होगी, यह सोच कर भी दिल दर्द से भर आता है।
जबलपुर के मुसलमानों के लिए अंजुमन इस्लामिया महज़ एक संस्था नहीं है। यह एक तारीख़ है, एक विरासत है, एक पहचान है। इस शहर की न जाने कितनी नस्लों ने यहां तालीम हासिल की, अपने बच्चों का मुस्तकबिल संवारा और इसे अपनी सामूहिक धरोहर माना।
125 साल की इस लंबी यात्रा में अंजुमन ने अंग्रेज़ी हुकूमत देखी, मुल्क की आज़ादी देखी, बंटवारे का दर्द देखा और सियासी तूफान भी देखे। लेकिन शायद ऐसा दौर कभी नहीं देखा, जब उसकी पूरी पहचान को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया हो।
आखिर गुनाह क्या है अंजुमन का?
आज जबलपुर का मुसलमान यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर अंजुमन का कसूर क्या है?
क्या उसका कसूर यह है कि वह शहर की सबसे बड़ी मुस्लिम तालीमी और समाजी संस्था है?
क्या उसका कसूर यह है कि उसके पास 125 साल की गौरवशाली विरासत है?
या उसका कसूर सिर्फ इतना है कि दो मुस्लिम भाजपा नेताओं की सियासी और व्यक्तिगत लड़ाई में वह सबसे आसान निशाना बन गई है?
सबसे बड़ा विरोधाभास
इस पूरे मामले का सबसे हैरतअंगेज़ पहलू यह है कि अंजुमन इस्लामिया का मैनेजमेंट मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड नियुक्त करता है और वक्फ बोर्ड राज्य सरकार के अधीन काम करता है।
शहर में यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वर्तमान इंतजामिया से जुड़े अधिकांश चेहरे भाजपा से जुड़े रहे हैं।
फिर सवाल यह पैदा होता है कि अगर कोई भाजपा नेता ही अंजुमन पर “जिहादी”, “तालिबानी” या कट्टरपंथी होने का आरोप लगा रहा है तो वह सवाल आखिर किस पर उठा रहा है?
अंजुमन पर?
उसके मैनेजमेंट पर?
वक्फ बोर्ड पर?
या उस पूरी व्यवस्था पर जिसके तहत यह नियुक्तियां हुई हैं?
जब अध्यक्ष अपनी जिम्मेदारी भूल जाए
किसी भी इदारे का सदर सिर्फ एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि उसकी साख और पहचान का निगहबान होता है।
जब संस्था पर इल्ज़ाम लगें, उसे “जिहादी” या “तालिबानी” कहा जाए, तो सच सामने लाना और संस्था का बचाव करना उसकी पहली जिम्मेदारी होती है।
लेकिन अफसोस यह है कि आज वही जिम्मेदारी निभती दिखाई नहीं दे रही।
भले ही यह लड़ाई दो भाजपा नेताओं के बीच की हो, लेकिन आम आदमी नेताओं को नहीं, अंजुमन को जानता है।
जब अंजुमन के साथ ऐसे अल्फाज़ जोड़े जाते हैं तो लोग यह नहीं देखते कि अध्यक्ष कौन है या कमेटी में कौन बैठा है।
शहर की नजर में बदनाम अध्यक्ष नहीं होता, बदनाम अंजुमन इस्लामिया होती है।
दाग किसी व्यक्ति पर नहीं, 125 साल पुरानी विरासत पर लगता है।
इसलिए आज सवाल सिर्फ आरोप लगाने वालों से नहीं, बल्कि संस्था के नेतृत्व से भी है।
अगर आरोप झूठे हैं तो उनका जवाब कौन देगा?
अगर संस्था की साख पर हमला हो रहा है तो उसकी हिफाजत कौन करेगा?
क्योंकि कुर्सियां बदल जाती हैं, अध्यक्ष बदल जाते हैं, लेकिन संस्थाओं पर लगे दाग पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं।
मीडिया भी सोचे
मीडिया को सवाल पूछने का पूरा हक है। जांच करनी चाहिए और सच सामने लाना चाहिए।
लेकिन जब किसी संस्था पर “जिहादी” और “तालिबानी” जैसे बेहद गंभीर इल्ज़ाम लगाए जाएं तो पत्रकारिता का तकाज़ा यह भी है कि उन इल्ज़ामों की पड़ताल की जाए।
दुर्भाग्य से ऐसा महसूस होता है कि कुछ मीडिया संस्थान सवाल कम पूछ रहे हैं और आरोप ज्यादा दोहरा रहे हैं।
इसका असर ANJUMAN मैनेजमेंट पर नहीं पड़ता।
इसका असर हजारों छात्रों, अभिभावकों, पूर्व छात्रों और पूरे मुस्लिम समाज की भावनाओं पर पड़ता है।
दर्द विवादों का नहीं, बदनामी का है
अंजुमन में विवाद हो सकते हैं।
हर बड़ी संस्था में होते हैं।
मैनेजमेंट बदल सकते हैं।
कमेटियां बदल सकती हैं।
लेकिन 125 साल की विरासत को “जिहादी”, “तालिबानी” जैसे शब्दों से जोड़ देना केवल एक संस्था को नहीं, बल्कि उसके पूरे इतिहास को कटघरे में खड़ा करना है।
दर्द इस बात का नहीं है कि विवाद हैं।
दर्द इस बात का है कि जिस संस्था ने एक सदी से ज्यादा समय तक तालीम, समाजी खिदमत और भाईचारे का पैगाम दिया, आज उसकी असल पहचान को धुंधला किया जा रहा है।
शायद सबसे दर्दनाक दौर…..
अंग्रेज़ चले गए।
बंटवारे का दौर गुजर गया।
सियासी तूफान भी गुजर गए।
लेकिन शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि अंजुमन को अपने विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनों की लड़ाई से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है।
आज जो लोग कुर्सियों पर बैठे हैं, कल नहीं होंगे।
आज के विवाद भी खत्म हो जाएंगे।
लेकिन अगर 125 साल पुरानी इस विरासत की साख को नुकसान पहुंचा, तो उसका दर्द आने वाली नस्लें महसूस करेंगी।
और शायद इसी वजह से आज जबलपुर का मुसलमान भारी दिल के साथ यह सवाल पूछ रहा है—
क्या अंजुमन इस्लामिया अपनी 125 साल की तारीख़ के सबसे दर्दनाक दौर से गुजर रही है?



