
दो मुस्लिम भाजपाइयों की लड़ाई में अंजुमन बदनाम हो रहा है, दो मुस्लिम गुटों की लड़ाई में अंसार नगर मस्जिद सील हुई, पुरानी नई कमेटी विवाद में मोमिन ईदगाह समाज के हाथ से निकल गए और सुब्बाहनल्लाह शाह बाबा दरगाह अज़ीम बुज़ुर्गो की पाक ज़िन्दगी पर मुसलमानो के ही ज़रिये मेन स्ट्रीम मीडिया में कीचड़ उछाला गया— लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूरे समाज ने इस दौरान क्या किया?
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अगर आज जबलपुर के मुस्लिम समाज से पूछा जाए कि उसे सबसे ज्यादा नुकसान किससे पहुंच रहा है, तो शायद हर व्यक्ति अलग जवाब देगा। कोई राजनीति को जिम्मेदार बताएगा, कोई मीडिया को, कोई सरकार को और कोई सांप्रदायिक ताकतों को।
लेकिन अगर पिछले दो-तीन साल की घटनाओं को ईमानदारी से देखा जाए, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। यह सच्चाई सुनने में भले ही अच्छी न लगे, लेकिन उससे मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता।
हकीकत यह है कि हमारे समाज को नुकसान बाहर वालों ने नहीं पहुंचाया, उससे कहीं ज्यादा नुकसान हमारी आपसी लड़ाइयों, गुटबाजी, पद और प्रभाव की राजनीति और सबसे बढ़कर हमारी खामोशी ने पहुंचाया है।
मोमिन ईदगाह से शुरू हुई चिंता

मोमिन ईदगाह का मामला पूरे शहर ने देखा।
पुरानी कमेटी की कमियों और मनमानी को आधार बनाकर ऐसा माहौल बनाया गया कि आखिरकार ईदगाह समाज के हाथों से निकलकर वक्फ बोर्ड के जरिए सीधे सरकारी नियंत्रण में चली गई।
वर्षों से व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें थीं। सवाल उठते रहे, विरोध होता रहा, लेकिन समाधान नहीं निकला। धीरे-धीरे विवाद बढ़ता गया और एक दिन यह पूरे शहर की चर्चा का विषय बन गया।
सवाल यह नहीं है कि कौन सही था और कौन गलत।
सवाल यह है कि अगर शिकायतें 20-25 साल से थीं तो समाज के जिम्मेदार लोगों ने समय रहते बैठकर रास्ता क्यों नहीं निकाला?
जब मामला हाथ से निकल गया, तब हर कोई अपने-अपने पक्ष में खड़ा दिखाई दिया। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे थे जिन्होंने मामले को समझने और सुलझाने की कोशिश की।
अंजुमन का दर्द सिर्फ अंजुमन का नहीं

अंजुमन इस्लामिया सिर्फ एक संस्था नहीं है। यह जबलपुर के मुसलमानों की सवा सौ साल पुरानी तालीमी, सामाजिक और ऐतिहासिक विरासत है।
कितनी ही पीढ़ियां यहां पढ़ीं, कितने ही लोगों ने यहां से शिक्षा हासिल की और कितने ही परिवारों की यादें इस संस्था से जुड़ी हुई हैं।
लेकिन पिछले एक साल में अंजुमन जिस तरह सुर्खियों में रही, उसने हर दर्दमंद इंसान को परेशान किया।
कभी कहा गया कि यहां शरीया कानून चलता है। कभी इसे जिहादी सोच से जोड़ने की कोशिश हुई। कभी तालिबानी मानसिकता के आरोप लगे। कभी इसे संविधान विरोधी संस्था की तरह पेश किया गया।
सोचने वाली बात यह है कि इन खबरों का सबसे ज्यादा नुकसान किसे हुआ?
किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी संस्था को।
और जब कोई संस्था बदनाम होती है तो उसका असर सिर्फ आज पर नहीं पड़ता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक जाता है।
दुख की बात यह है कि इन विवादों की जड़ में भी समाज के अंदर की राजनीति और आपसी खींचतान साफ दिखाई देती है।
अंसार नगर मस्जिद और एक शर्मनाक स्थिति

अंसार नगर मस्जिद का मामला शायद सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला था।
एक मस्जिद, जहां लोग अल्लाह की इबादत के लिए आते हैं, जहां लोगों को भाईचारे और एकता का संदेश दिया जाता है, वही मस्जिद आपसी विवाद की वजह से सील हो गई और वहां नमाज तक रुक गई।
यह किसी बाहरी हमले का नतीजा नहीं था।
दोनों पक्ष हमारे अपने थे।
यह हमारे ही लोगों के बीच पैदा हुए विवाद का नतीजा था।
सोचिए, इससे बड़ी शर्मिंदगी किसी समाज के लिए क्या हो सकती है?
सुभानअल्लाह शाह बाबा रह. की दरगाह का विवाद
सुभानअल्लाह शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह से जुड़ा विवाद भी समाज के लिए चिंता का विषय बना।
यह सिर्फ जमीन, प्रबंधन या अधिकार का मामला नहीं था।
इस विवाद के दौरान ऐसी बातें कही और छपवाई गईं जिनसे समाज शर्मसार भी हुआ और दुखी भी। ऐसे बुजुर्गों और हस्तियों के नाम तक विवादों में घसीटे गए जो वर्षों पहले इस दुनिया से जा चुके हैं।
हमारी तहजीब हमेशा अपने बुजुर्गों के सम्मान की रही है। हम अपने बड़ों की कब्रों पर फातिहा पढ़ते हैं, उनसे मोहब्बत का इज़हार करते हैं।
ऐसे में जब किसी बुजुर्ग की विरासत विवादों में घिरती है तो दर्द सिर्फ एक परिवार या एक पक्ष को नहीं होता, बल्कि पूरे समाज को होता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल: समाज कहां था?
इन सभी घटनाओं में एक बात समान दिखाई देती है।
समाज की खामोशी।
जब अंजुमन बदनाम हो रही थी, समाज खामोश था।
जब मोमिन ईदगाह विवादों में घिरी, समाज खामोश था।
जब सुभानअल्लाह शाह बाबा रह. की दरगाह का विवाद बढ़ा, समाज खामोश था।
जब अंसार नगर मस्जिद सील हुई, समाज खामोश था।
हममें से ज्यादातर लोग सिर्फ तमाशबीन बने रहे।
व्हाट्सऐप ग्रुपों में बहस होती रही।
सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी जाती रहीं।
चाय की दुकानों पर अफसोस जताया जाता रहा।
लेकिन बहुत कम लोग ऐसे थे जो आगे बढ़कर समाधान की कोशिश करते।
खामोशी भी जिम्मेदार होती है
हम अक्सर सोचते हैं कि गलती सिर्फ लड़ने वालों की होती है।
लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है।
कई बार चुप रहने वाले भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं।
जब समझदार लोग खामोश हो जाते हैं, तब शोर मचाने वाले लोग समाज का चेहरा बन जाते हैं।
जब जिम्मेदार लोग पीछे हट जाते हैं, तब मुट्ठी भर लोग पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं।
और जब समाज समय पर दखल नहीं देता, तब दो लोगों की लड़ाई पूरे समाज की बदनामी का कारण बन जाती है।
अब आगे क्या?
सिर्फ अफसोस करने से हालात नहीं बदलेंगे।
उलेमा-ए-किराम को आगे आना होगा।
समाज के वरिष्ठ और सम्मानित लोगों को आगे आना होगा।
शिक्षाविदों, वकीलों, कारोबारियों और समझदार युवाओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
ऐसा माहौल बनाना होगा जहां विवाद अदालत, थाना और मीडिया की सुर्खियों तक पहुंचने से पहले समाज के भीतर ही बैठकर हल किए जा सकें।
आखिरी बात
जबलपुर का मुस्लिम समाज कमजोर नहीं है।
हमारे पास मस्जिदें हैं, मदरसे हैं, दरगाहें हैं, तालीमी इदारे हैं, कारोबार करने वाला तबका है, पढ़े-लिखे नौजवान हैं और अनुभवी लोग भी हैं।
अगर किसी चीज की कमी दिखाई देती है तो वह है सामूहिक जिम्मेदारी की भावना।
हमें यह समझना होगा कि अंजुमन, ईदगाह, मस्जिदें और दरगाहें किसी एक व्यक्ति, किसी कमेटी या किसी गुट की नहीं हैं।
ये पूरे समाज की अमानत हैं।
अगर हम खुद अपनी संस्थाओं और अपनी विरासत की हिफाजत नहीं करेंगे, तो फिर किसी और से इसकी उम्मीद करना भी बेकार है।
वक्त आ गया है कि हम तमाशबीन बनने के बजाय जिम्मेदार समाज बनने की कोशिश करें।
क्योंकि कुछ लोगों की लड़ाई का नुकसान आखिरकार पूरे समाज को ही उठाना पड़ता है।



